Ajeet Bharti
Ajeet Bharti

@ajeetbharti

13 Tweets Mar 14, 2023
पोस्टमॉर्टम की हुई लाश और जल्दी जलाने के पीछे के कारण
हाथरस मामले में लगातार नई बातें सामने आती जा रही हैं। जल्दी जलाने की बात का तर्क यह है कि पोस्टमॉर्टम की हुई लाश बहुत ही हल्के टाँकों के साथ कपड़े में लपेटी हुई होती है। कई बार गाड़ी पर भी लाश कपड़े में ही फैल जाती है।
1/13
इसलिए जलाने वाले भी आमतौर पर उसे पूरी तरह से खोलना नहीं चाहते, चेहरा देख लेते हैं, दाह संस्कार कर देते हैं। सरकारी अस्पतालों में इस तरह की इतनी लाशें आती हैं कि ‘प्रोफेशनल’ तरह से ‘सिलाई’ असंभव ही है। कोई रसूखदार हो तो, हो जाता होगा लेकिन आम लोगों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं।
2/13
हाथरस मामले में पुलिस ने कई वजहों से लाश को सीधे जलाने पर जोर दिया होगा। पहली वजह यही है कि एक बार लाश उतारना, उसे परिवार को देना, वैसे मामले में जो पोलिटिकल हो चुका है, प्रशासन के लिए एक ऐसा सरदर्द है जो वो लेना नहीं चाहती।
3/13
लाश देने से, उस सिचुएशन में आहत परिवार कैसी प्रतिक्रिया देगा, रोते-रोते लाश पर हाथ मारना आदि पुलिस के नियंत्रण में नहीं हो सकते। दूसरी बात, पोस्टमॉर्टम के बाद कई अंग ठीक से नहीं लगाए जाते, फेंक दिए जाते हैं, सिलाई आड़ी-तिरछी होती है।
4/
आप सोचिए कि 24 घंटे कैमरा ले कर चलने वाले दौर में उस लाश को आप टीवी पर देखते तो कैसा लगता!
सवाल उठते कि पीड़िता की किडनी निकाल दी गई, गरीब का अंग बेच दिया गया, गरीबों के लाश की कोई कीमत नहीं, गरीबों के लाश की सिलाई भी उपेक्षा से होती है... जितने मुँह, उतनी बातें।
5/13
क्या पता लोग लाश ले कर प्रदर्शन पर बैठ जाते कि उनकी माँगें पूरी की जाएँ? क्या पता मामला वाकई ‘भीम आर्मी’ द्वारा पूर्वनियोजित आंदोलन में बदल जाता और 14 और लाशें गिर जातीं?
मैं इन पहलुओं से अनभिज्ञ था क्योंकि मैंने आज तक ऐसी लाश देखी ही नहीं।
6/
किसी जानकार ने बताया तो मैं आप तक पहुँचा रहा हूँ। ऐसे संवेदनशील मामले में पुलिस परिवार को सीधे नहीं कह सकती कि हम लाश देंगे तो तुम ये कर दोगे, इसलिए नहीं देंगे... टेक्निकली सही बात भी विकट परिस्थितियों में संदर्भहीन हो जाती है।
7/13
या फिर, यह बात भी हम सब जानते हैं कि स्थानीय पुलिस को केस की नस-नस मालूम होती है कि वाकई क्या हुआ और क्या दिखाया जा रहा है। इसलिए उनके लिए सीधे तौर पर, सत्य पता होने के बावजूद, एक रिपोर्ट को सही और दूसरे को गलत कहना विचित्र स्थिति होती है।
8/
सत्य बोलना परिवार और समाज (और अब तो देश) के लिए संवेदनहीनता माना जा सकता है। झूठ बोलेंगे तो एक भीड़ को, जिसमें भीम आर्मी जैसे संगठन आग लगाने के लिए तत्पर बैठे हों, दो मिनट में थाना फूँक देंगे, पुलिस वाले की जान चली जाएगी।
9/13
लाश अगर रात ही में न जलाई गई होती, या उस वक्त भी मीडिया के लिए बैरिकेडिंग न की गई होती तो हम और आप उस जलती लाश को देखते लाइव टीवी पर। क्योंकि दुर्भाग्य से हम उसी दौर में जी रहे हैं जहाँ वीभत्स कुछ भी बचा नहीं है।
10/
ऐसे भी सवाल पुलिस से पूछे जा रहे थे कि किसी और की लाश, या कुछ और तो नहीं जला दिए?
ये सवाल पत्रकार और छुटभैये नेता कर रहे थे। किडनी बेचने से ले कर, किसी और को जला देने की खबरें इलाके में फैला दी जाती, और अप्रैल 2018 के SC/ST आंदोलन की तर्ज पर क्षेत्र को फूँक दिया जाता।
11/13
आपने खबरें पढ़ी होंगी कि किस तरह से वामपंथी पार्टियों ने लाश को ले कर प्रदर्शन करने की हर संभव कोशिश की थी।
अंत में, मुखाग्नि परिजन ने ही दी, लकड़ी तो उसके पिता, दादा सब डाल रहे थे। क्या पुलिस ने उन्हें मजबूर किया होगा, या आपको लगता है पुलिस ने ही जला दिया?
12/13
फोरेंसिक रिपोर्ट जब आएगी, तो और भी बातें स्पष्ट हो जाएँगी लेकिन जिस तरह से पहले ही हमने, सीमित जानकारी के आधार पर, अपने निर्णय सुरक्षित कर लिए हैं, हमें उनसे बचना चाहिए। मैं स्वयं 3 बार में 3 बातें बोल रहा हूँ क्योंकि मेरे पास भी हर बात की हर संभव जानकारी उपलब्ध नहीं है।
13/13

Loading suggestions...