43 Tweets 90 reads Feb 22, 2021
रावण के विषय में कुछ मुख्य प्रचलित भ्रांतियां-
इस thread में मैं वाल्मीकि रामायण का सन्दर्भ दे रहा हूँ.
1. रावण स्त्रियों का सम्मान करता था.😂
वह स्त्रियों का कितना सम्मान करता था, ये बात अरण्यकाण्ड में आए इन श्लोकों से स्पष्ट हो जाती है-
रावण ने सीताजी के हरण से पूर्व स्वयं ये बात उन्हीं के सामने स्वीकार की-
बलात्कारी रावण ने युद्धकाण्ड में कुम्भकर्ण को जगाने से पूर्व अपनी सभा में स्वयं ये बाते कहीं-
2. रावण एक विद्वान् ब्राह्मण था.
रावण इतना विद्वान ब्राह्मण था, कि वैदिक यज्ञों का विध्वंस करता था और ब्राह्मणों की ही हत्या कर देता था और वह अपने प्रजाजनों का भी अहित ही करने में लगा रहता था.
3. रावण ने केवल अपनी बहन का प्रतिशोध लेने के लिए सीताजी का अपहरण किया था.
यह तो स्पष्ट है कि रावण ने सीताजी से पहले भी कई स्त्रियों का अपहरण एवं दुष्कर्म किया थे.
अब क्या केवल सीताजी के साथ ही वह सहसा एक अच्छा व्यक्ति बन गया ?
देखते हैं-
तो सूर्पनखा ने रावण को श्रीराम से युद्ध करने के बाद सीताजी को अपने साथ रखने के लिए उकसाया.
उसने श्रीराम की शक्ति से भयभीत होकर उनसे युद्ध नहीं किया अपितु पहले अपहरण किया.
जबकि सूर्पनखा ने राम जी को मारने की बात कही थी और उसके बाद सीता को अपनी पत्नी बनाकर आनंद लेने की.
अब ये देखिए कि माता सीता ने रावण के कुकृत्यों पर क्या कहा-
माता सीता के अन्य वचन-
ये भी कहा माँ सीता ने-
हनुमानजी का रावण के बारे में कथन-
हनुमानजी के अन्य कथन-
हनुमानजी का रावण से श्रीराम एवं माँ सीता के बारे में समझाना-
आप किसका विश्वास करेंगे?
साक्षात माता लक्ष्मी का रूप माता सीता एवं श्रीराम के परमभक्त पवनपुत्र हनुमानजी का ?
आदिकवि वाल्मीकि जिन्होंने ये कथा लिखी उनका?
या रावण को सत्पुरुष सिद्ध करने का प्रयास करने वाले लोगों का ?
4. रावण ने सीता जी को अपना पति चुनने का अवसर दिया
पहले रावण ने सीताजी को इस प्रकार के अवैध सम्बन्ध को शास्त्रों के अनुसार उचित बताया.
माँ सीता को बहकाने का रावण द्वारा प्रयास-
इससे क्या ये नहीं प्रमाणित होता कि रावण केवल अपनी वासना के लिए ऐसी बातें कह रहा था?
रावण ने तो सीताजी को ऐसा विकल्प दिया-
रावण नरभक्षी था अर्थात् मनुष्यों का मांस खाने वाला.
यह उसके उपरोक्त कथन से सिद्ध हो जाता है.
सुन्दरकाण्ड में रावण ने पुनः सीताजी से यही बात कही.
महाभारत के रामोपाख्यान में भी यही है.
अब भी यदि किसी को ऐसा लगता है कि वह नरभक्षी नहीं था, तो वह ये भी जान ले की सूर्पनखा, त्रिशिरा, कुम्भकर्ण भी नरभक्षी थे.
सूर्पनखा ने सीताजी को अरण्यकाण्ड में खाने की बात कही थी.
सुन्दरकाण्ड में सीताजी की निगरानी करने वाली राक्षसियां भी उनके विभिन्न अंगों को खा जाने की बाते करने लगीं थीं.
राक्षसियों को भी यही लगता था कि रावण उन्हें सीताजी को खा जाने के लिए ही कहेगा.
एक और राक्षसी का कथन-
5. सीताजी की पवित्रता रावण ने इसलिए भंग नहीं की क्योंकि उसके मन में स्त्रियों के लिए बहुत आदर था
रावण ने स्वयं विस्तार से अपने मंत्री को बताया कि उसने सीताजी का बलात्कार क्यों नहीं किया.
रावण ने और स्त्रियों के साथ भी बिना संकोच ऐसे कुकर्म कर चुका था, तो क्या वह सीताजी के विषय में सहसा धर्मराज बन जाता?
कदापि नहीं.
ये केवल ब्रह्माजी के श्राप का भय था कि उसने सीताजी के साथ ऐसा कुछ नहीं किया.
6. श्रीराम ने लक्ष्मण जी को मरते हुए रावण के पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजा था.
रावण की मृत्यु उसी समय हो गई जब श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र से उसका ह्रदय भेद दिया.
लक्ष्मण जी को ये कथित उपदेश देने का समय रावण को मिला ही नहीं.
ये वैसी ही बात है, जैसे महाभारत में अर्जुन के आन्जलिक अस्त्र द्वारा कर्ण का मस्तक कट जाने के उपरान्त भी समाज में ऐसी मूर्खतापूर्ण अफवाह है कि कर्ण ने मरते समय अपने सोने का दांत उखाड़कर श्रीकृष्ण को दान में दे दिया था जो कि उसके पास ब्राह्मण का वेश बनाकर आए थे.🤣
क्या रावण जैसा दुरात्मा,वेदों का विध्वंस करने वाला, ब्राह्मणों की हत्या करने वाला, मनुष्यों का मांस खाने वाला, परायी स्त्रियों का अपहरण एवं बलात्कार करने वाला, अपने धर्मात्मा भाई को राज्य से निकाल देने वाला, लक्ष्मण जी को ज्ञान देता?
रावण जैसा महामूर्ख जो सारे शास्त्रज्ञान की धज्जियां उड़ाकर अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में तीनों लोकों पर अपने अत्याचार से उनको रुला देता था, दूसरों की स्त्रियों का अपहरण एवं बलात्कार करता था, मनुष्यों का मांस खाता था, धर्म का नाश करता था, वह कब से महाज्ञानी हो गया?
लक्ष्मण जी जो कि यज्ञों एवं ब्राह्मणों की रक्षा करने वाले, अपने भाई के लिए राज्य के सुखों का त्याग करके उनके साथ वनवास जाने वाले, अपनी भाभी को माता समझने वाले थे, उनको रावण क्या ज्ञान दे देता?
7. रावण द्रविड़/कथित मूलनिवासी/कबीलेवाला-आदिवासी/नीची जाति का था.
इस प्रकार की आधारहीन बातें केवल ये लोग कर सकते हैं-
-मार्क्सवादी इतिहासकार(इनके मतानुसार कभी हिन्दू धर्मग्रन्थ कपोल-कल्पनाएँ होती हैं, तो कभी कुछ बातें उसमें सत्य होती हैं)
- अर्बन नक्सल-अम्बेडकरवादी(इन मार्क्स एवं अम्बेडकर के मानसपुत्रों के अनुसार हिन्दू धर्मशास्त्रों में वर्णित सभी दुष्ट खलनायक द्रविड़/आदिवासी/नीची जाति के थे. और इसके लिए इनके पास कोई प्रमाण है ही नहीं.)
मुख्य विषय पर आते हैं.
रावण किसका पुत्र था? किस कुल का था?
देखिए सुन्दरकाण्ड में राक्षसियों ने सीताजी से रावण केकुल के बारे में क्या कहा-
तो एक महर्षि (ब्राह्मण) का पुत्र नीची जाति का /आदिवासी कैसे हो गया?
रावण की स्त्रियाँ स्वयं उसे “आर्यपुत्र” कहकर पुकार रही थीं जब उसका वध हो जाने के पश्चात वे उसके शरीर के समीप गईं .
तो रावण DRAVIDIAN कैसे और कब से हो गया?
वह तो ARYAN हुआ न ARYAN INVASION THEORY वालों?😆
युद्धकाण्ड में रावण के दाह-संस्कार का विवरण –
राक्षसजातीय ब्राह्मण भी थे. मनुष्यों की भांति उनमें भी वर्ण-व्यवस्था थी.
वाल्मीकि रामायण में वर्णित इन सारे कथनों से ये स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो जाता है कि रावण में निम्नलिखित गुण थे -
-वैदिक यज्ञों का विध्वसं करना
-परायी स्त्रियों का अपहरण एवं बलात्कार करना
-ब्राह्मणों की हत्या करना
-मनुष्यों का मांस खाना
-तीनों लोकों को कष्ट पहुंचाकर रुलाना
-अपनी तुच्छ वासना की पूर्ति हेतु अपने राज्य को युद्ध में झोंकना
-अपने सच्चे हितैषियों के वचनों(जैसे विभीषण) को अनसुना करना
-अहंकार
-कपट
-क्रूरता
परन्तु यहाँ पर सबसे आवश्यक प्रश्न यह है-
यदि रावण सच में इतना दुष्ट,क्रूर और बलात्कारी था, तो उसके महिमामंडन के पीछे क्या उद्देश्य है?
उद्देश्य यह है- हिन्दू समाज का चारित्रिक पतन.
ऐसा निम्नलिखित कारणों से होता है-
-जब भी रावण जैसे असामाजिक तत्वों की तुलना कोई श्रीराम या लक्ष्मण जी से करता है एवं उसे भी इन्हीं के सामान दर्शाने का प्रयास करता है, तो हिन्दू समाज में धर्म और अधर्म में कोई अंतर नहीं रह जाता.
-उससे रावण जैसे परस्त्रीगामी लोगों को बढ़ावा मिलता है. ऐसे लोग रावण का उदाहरण देकर स्वयं को उचित सिद्ध करने का प्रयास करते हैं.
-रावण को सही एवं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को गलत सिद्ध करने के प्रयास से कुछ हिन्दुओं की आस्था और निर्बल हो जाती है. इससे धर्म में विश्वास घटता है और ऐसे व्यक्ति नास्तिक Liberals की सभी सामजिक एवं पारिवारिक बंधनों से मुक्त विचारधारा के प्रति आकर्षित होते हैं.
-जब एक हिन्दू अपने धर्म से दूर होता है, तो समझिये उसका पूरा परिवार भी होता है. उसके बच्चों पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ता है.
इस प्रकार धीरे-धीरे इससे सम्पूर्ण हिन्दू समाज सुदृढ़ होने के स्थान पर शक्तिहीन हो जाता है (अपने धर्म रुपी जड़ से ही कट जाता है).
धन्यवाद.🙏

Loading suggestions...