2 Tweets 15 reads Mar 06, 2021
कर्ण के बारे में थोड़ी-सी कम ज्ञात बातें जो TV सीरियल देखने वाली जनता कम जानती है -
क्योंकि इन महोदय पर फिल्म भी आ रही है, तो सोचा सूतकुलशिरोमणि कर्ण जी महाराज के विषय में कुछ बातें साझा की जाएँ.😇
पर उससे पहले मेरे स्रोत-
गीता प्रेस महाभारत
भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टिट्यूट(BORI),पुणे द्वारा जारी की गई महाभारत की क्रिटिकल एडिशन (CE)
यदि किसी को ऐसा लगता है कि B.R. Chopra की महाभारत बहुत शोध के बाद बनाई गई थी, तो उनकी जानकारी के लिए मैं पहले ही स्पष्ट कर देता हूँ की वो महाभारत भी कथित तौर पर BORI के अनुसंधान पर आधारित थी.
भले ही कहानी को टीवी सीरियल द्वारा कितना भी बिगाड़ कर क्यों ना दिखाया गया हो.😂
ये तो हम सब जानते हैं कि कर्ण को अदीरथ सूत ने गोद लिया था.
सूत कौन थे?
इस विषय में कर्ण ने स्वयं भगवान् परशुराम से शान्ति पर्व में यह कहा-
केवल इतना ही नहीं, विष्णुगुप्त चाणक्य ने अपनी रचना अर्थशास्त्र में सूतों को ब्राह्मण एवं क्षत्रियों से उत्पन्न कहा है.
मूल स्रोत-शामशास्त्री द्वारा कौटिल्य अर्थशास्त्र का अंग्रेजी अनुवाद
महाभारत में सूत विभिन्न पदों पर आसीन थे. जैसे-
कथावाचक ( उग्रश्रवा सौती जी )
सेनापति ( कीचक जो कि मत्स्य राज्य की रानी सुदेष्णा का भाई था)
राजा जैसे -
अंग का राजा कर्ण
कैकय राज्य का राजा जो कि कीचक एवं सुदेष्णा का पिता था.
सूतराज्य चम्पापुरी का राजा.
भवन-निर्माता और वास्तुशास्त्र के पंडित ( राजा जन्मेजय के सर्प यज्ञ के समय)
तो सूत लोग शूद्र नहीं थे जैसा कि कई लोगों को भ्रम है.
खैर अब कर्ण जी महाराज पर आते हैं.
आदिपर्व में ही ये स्पष्ट कर दिया गया है कि कर्ण कैसा था -
कर्ण के जन्म के बारे में आदिपर्व में बताया गया है परन्तु उस घटना का विस्तृत वर्णन वनपर्व के कुंडल-हरण पर्व में मिलता है.
मैंने कई बार बहुत लोगों को कुंती को कर्ण के कथित दुखदायी जीवन के लिए दोषी ठहरा देते हैं परन्तु उन्हें पूरी घटना ज्ञात नहीं है
कुंती उस समय छोटी बच्ची थी जब उसने ऋषि दुर्वासा द्वारा दिए गए मंत्र को उत्सुकतावश परखा. जब उस समय सूर्यदेव प्रकट हो गए, तब कुंती ने उनसे वापस लौट जाने कि विनती की परन्तु सूर्यदेव ने ये कहा-
कुंती ने कहा-
और इस प्रकार सूर्यदेव के द्वारा अपने पिता कुन्तिभोज और ब्राह्मण ऋषि दुर्वासा को जब श्राप दिए जाने के भय से कुंती ने ये सोचा और सूर्यदेव से अपने परिवार कि रक्षा के लिए समागम करने को तैयार हो गयीं -
कुछ लोगों को लगता है कि कर्ण को उसके कवच- कुंडल उसके पूर्वजन्म के पुण्यों के कारण या फिर सूर्यपुत्र होने के कारण प्राप्त हुए थे. परन्तु सच्चाई बिलकुल अलग है .
अब ये देखिये कि कर्ण को कवच – कुंडल मिले क्यों और कैसे-
जब सूर्यदेव ने कुंती को श्राप देने का भय दिखाकर कुंती से समागम के लिए कहा, तब कुंती ने कहा कि वे उनसे पुत्र तभी उत्पन्न करेंगी जब उसके पास दिव्य कवच-कुंडल हों .(उसको सुरक्षा प्रदान करने के लिए. क्या यह उनका प्रेम नहीं था? )
तो कवच-कुंडल कर्ण को किसी पूर्वजन्म की तपस्या के कारण नहीं मिले और सूर्यपुत्र होने के कारण तो कदापि नहीं क्योंकि यदि ऐसा होता, तो रामायण में सुग्रीव के पास भी कवच-कुंडल होते.
यदि अब भी लगता है कि सूर्यपुत्र होने के कारण उसे कवच-कुंडल मिलने चाहिए थे ,तो इन बातों को मत भूलिए –
1. श्रीराम को भी कोई विष्णुजी के अस्त्र ( सुदर्शन चक्र, कुमौदिकी गदा, सारंग धनुष,इत्यादि ) पैदा होने पर नहीं मिले थे.
उनको इन अस्त्रों का ज्ञान अपने गुरुओं ( ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि अगत्स्य) से शिक्षा प्राप्त करने पर मिला था.
2. अर्जुन( पूर्वजन्म में महर्षि नर) जो कि भगवान् विष्णु का ही अंशावतार थे, उनको भी गांडीव घनुष सभापर्व के खंडव दहन के समय मिला था.
वो भी तब, जब वे और श्रीकृष्ण ब्रह्माजी के आदेश पर खांडव दहन के लिए तैयार हो गए थे.
3. स्वयं श्रीकृष्ण को उनका सुदर्शन चक्र और कुमौदिकी गदा उसी समय प्राप्त हुए थे.
४.अतिकाय जो कि रावण का पुत्र और ब्रह्माजी का पडपोता था, उसे उसके अभेद्य ब्रह्म-कवच ब्रह्माजी की तपस्या करने पर ही प्राप्त हुए थे.
वाल्मीकि रामायण के क्रिटिकल एडिशन के स्क्रीनशॉट-
सूतपुत्र कर्ण स्वयं शक्ति अस्त्र लेने की इच्छा से इन्द्रदेव के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा था जब सूर्यदेव ने उसे सपने में चेतावनी दी थी .
और ऐसा भी नहीं है कि कर्ण ने तुरंत इन्द्रदेव को अपने कवच-कुंडल दे दिए.
तो यहाँ पर देखा जा सकता है कि कर्ण ने पहले इन्द्रदेव को भूमि, स्त्रियों,इत्यादि का लालच दिया और उनको कवच-कुंडल देने से मना कर दिया.
कर्ण ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया कि कवच-कुंडल के बिना वो वध्य हो जाएगा.
जब कर्ण के पास कवच-कुंडल थे-
1. तब भी महाभारत के सभापर्व में वो भीमसेन (जो युधिष्ठिर को चक्रवर्ती सम्राट बनाने के लिए और पूर्व दिशा के राज्यों को जीतने निकले थे।) द्वारा परास्त हो गया था और उसको युधिष्ठिर का करदाता राजा बना दिया गया था .
2.वनपर्व के घोष-यात्रा पर्व में कर्ण गन्धर्वों के हाथों मृत्यु के भय से विकर्ण के रथ पर कूदकर दुर्योधन को अकेला छोड़कर भाग गया था.
इन्द्रदेव का शक्ति अस्त्र उसे विजय दिलवाने में कवच-कुंडल से ज्यादा उपयोगी होता.
जो भी हो, कर्ण ने इन्द्रदेव से कहा कि यदि उनको उसका कवच-कुंडल चाहिए तो इसके बदले में उसे कोई अस्त्र प्रदान करें अन्यथा वे उनको कवच-कुंडल नहीं देगा.
इन्द्रदेव का उत्तर और कर्ण को शक्ति दान.
क्या यह शर्त थी या कथित दानवीर का दान ?
यदि इन्द्रदेव ने कर्ण को मरवाने कि ठान ली होती, तो उसे यह बात कदापि नहीं बताते –
यदि इन्द्रदेव उसे ये बात नहीं बताते, और कर्ण अर्जुन को मारने के उत्साह में मदमस्त होकर इस अस्त्र को चला देता (जब तक इसकी अत्यधिक आवश्यकता नहीं होती अर्थात उसके दूसरे अस्त्र ख़त्म नहीं हुए होते) , तो वो शक्ति उसकी पर आ पड़ती और उसका वहीँ पर अंत हो जाता.
क्या एक शक्तिशाली परन्तु अव्यावहारिक वस्तु के बदले किसी शक्तिशाली परन्तु उपयोगी वस्तु की अदला-बदली करना दान है?
यह आप पर है कि आप इस घटना को अदला-बदली के तौर पर देखते हैं या कर्ण के कथित दान के रूप में.
कर्ण के बारे में अन्य जानकारियाँ-
1.कर्ण के पिता अदीरथ सूत, राजा धृतराष्ट्र के मित्र और अंगदेश के निवासी थे –
अदीरथ सूत निर्धन कदापि नहीं थे.
कर्ण जिस पिटारी में बंद मिला था, उसे नदी में से लाने के लिए राधा ने सेवकों से उसे मंगवाया था.
कर्ण का अदीरथ के यहाँ पालन-
कर्ण द्रोणाचार्य एवं कृपाचार्य का भी शिष्य था.
2. कर्ण बाल्यकाल से ही दुर्योधन का मित्र था और पांडवों से जलता रहता था. शांतिपर्व.
3.आदि पर्व में भी ये बात स्पष्ट की गई है कि कर्ण द्रोणाचार्य के आश्रम में भी दुर्योधन का सहारा लेकर पांडवों का अपमान करता था.
4. कर्ण बचपन से ही पांडवों को मारने के षड्यंत्रों में सम्मिलित रहता था.
यही नहीं, कई लोग ये भी कहते हैं कि दुर्योधन इतना बड़े दिल वाला था कि उसने सूतपुत्र को अंग देश का राजा बना दिया पर उनको ये नहीं पता कि दुर्योधन ने बचपन में भीम से घृणा के कारण उसके प्रिय सारथि को मार दिया था. आदिपर्व.
वनपर्व में भी ये घटना द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को बताई थी-
5. कर्ण भी पांडवों को लाक्षागृह में जला देने के षड्यंत्रकारियों में से एक था.
6. लोगों के मन में ये भ्रम है कि द्रौपदी ने कर्ण को स्वयंवर में भाग लेने ही नहीं दिया था पर ये सत्य नहीं है. –
अब कर्ण को यदि स्वयंवर में बुलाया गया था, तो उसे विवाह के लायक तो समझा ही गया होगा.
नरकासुर के पुत्र भगदत्त ने भी स्वयंवर में अपना जितने का प्रयत्न किया था.
जब द्रौपदी ने एक असुर को नहीं रोका, तो कर्ण को ही क्यों रोकती ?
इसके बाद सब राजाओं ने प्रयत्न किया पर असफल रहे.
तो सारे राजाओं ने (कर्ण ने भी ) प्रयत्न किया परन्तु असफल रहे. फिर जब अर्जुन ने अंत में ये दुष्कर कार्य करने के लिए उठे, तब ब्राह्मणों ने ये कहा-
अर्थात कर्ण भी उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा ही नहीं पाया था.😂
कुछ लोग कहेंगे कि ये कर्ण सूतपुत्र नहीं अपितु गांधारी का पुत्र था.
यदि ऐसा है, तो कर्ण को बाकी धृतराष्ट्र पुत्रों से अलग क्यों कहा गया है ?
और कौन दूसरा कर्ण था जो अपने बल और धनुर्विद्या के लिए विख्यात था?
द्रौपदी द्वारा कर्ण के कथित तिरस्कार के बारे में गीता प्रेस का कथन-
द्रौपदी द्वारा कर्ण के कथित तिरस्कार के बारे में BORI का कथन-
(स्रोत –Annals of BORI LXXXII {2001})
तो यह तो स्पष्ट है कि कर्ण धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा ही नहीं पाया था शल्य की तरह बलवान होने पर भी.😆
6. उल्टा जब अर्जुन ने द्रौपदी को जीत लिया, तब कर्ण भी उन राजाओं में से था जो द्रौपदी को एक ब्राह्मण से विवाह करने के लिए आग में फेंकने वाले थे.
पर अर्जुन और भीम ने उन्हें युद्ध करके रोक दिया.
अर्जुन की शक्ति देखकर कर्ण उन्हें भगवान् परशुराम या इन्द्रदेव या भगवान् विष्णु तक समझने लगा था.(वैसे वो बात तो सही ही है क्योंकि अर्जुन भगवान् विष्णु का ही अंशावतार थे.)
7. अब द्रौपदी वस्त्रहरण के प्रकरण पर आते हैं.
देखिये कर्ण कितना प्रसन्न था जब द्रौपदी को दुशासन द्वारा केश से घसीटते हुए कुरु सभा में लाया था ( द्रौपदी ने केवल एक ही वस्त्र पहना था और उस समय वो रज:स्वला थी )
जब विकर्ण ने इसका विरोध किया, तब कर्ण ने उसे चुप करने के लिए ये कहा और अपनी 'उत्तम बात' कही–
कर्ण को ये बात ज्ञात थी कि द्रौपदी केवल एकवस्त्रा है.पांडवों ने तो एक उपरी और एक निचला वस्त्र पहना हुआ था. परन्तु कर्ण तो द्रौपदी को पूर्ण रूप से निर्वस्त्र करवाना चाहता था.
8. जब वस्त्रहरण असफल रहा, तब भी कर्ण ने द्रौपदी को आपत्तिजनक बातें कहीं. उसने उसे यहाँ तक सुझाव दे डाला कि वो उसके स्वामियों ( दुर्योधन,अन्य कौरव) के साथ चाहे तो शारीरिक सम्बन्ध भी बना सकती है क्योंकि दासियों के लिए ये वर्जित नहीं है.
स्वयं श्रीकृष्ण पांडवों के साथ हुए इस पापकर्म पर इतने क्रोधित हो गए थे कि उन्होंने कहा –
अर्जुन ने श्रीकृष्ण को शांत किया.
तब द्रौपदी ने भी उनसे ये बात कही और श्रीकृष्ण ने उन्हें ये वचन दिया –
9. वनपर्व के आरम्भ में सूतपुत्र कर्ण ने पांडवों को मारने का षड्यंत्र किया जब वे वनवास चले गए थे परन्तु श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास ने कौरवों को ऐसा दुस्साहस करने से रोक दिया –
व्यास जी का इन मूढ़ों को रोकना-
जब पांडव द्वैतवन में जाने वाले थे तो प्रजाजनों ने भी कर्ण को पापी कहा था-
10. परन्तु कर्ण ने दुबारा वन पर्व के ही घोषयात्रा पर्व में एक अलग योजना बनाई.
कर्ण की योजना-
दुष्टबुद्धि कर्ण की planning-
पांडव उस समय द्वैतवन में झील के पास के क्षेत्र में थे.
उसी झील पर कौरवों और गन्धर्वों में विवाद हो गया.
10. गन्धर्वों और कौरवों में जब युद्ध हुआ, तो कर्ण अपने प्राण बचाने के लिए दुर्योधन को अकेला लड़ते छोड़ विकर्ण के रथ पर कूदकर भाग गया था और फिर गन्धर्वों ने दुर्योधन को (उन सब की स्त्रियों समेत) बंदी बना लिया था-
अर्जुन,भीमसेन , नकुल और सहदेव ने दुर्योधन को बचाने के लिए गन्धर्वों से युद्ध किया और अर्जुन ने गन्धर्वों के राजा चित्रसेन को पराजित करके उसे छुडवा लिया.
इस घटना के बाद दुर्योधन अवसादग्रस्त हो गया था और अपने प्राण त्यागने की सोच रहा था.
शकुनि जिसे कर्ण से बुरा दिखाया जाता है TV serials में, उसने दुर्योधन से कहा कि शोक करने की कोई बात ही नहीं है. पांडवों को उनका राज्य लौटा दिया दो और धर्म कमाओ.
11. अब कोई भी अपने मित्र का अच्छा और भला चाहने वाला दुर्योधन को इसी तरह शत्रुता छोड़ने का ही सुझाव देता. है ना?
परन्तु कर्ण का सुझाव देखिए -
तो कर्ण ने ऐसी स्थिति में भी दुर्योधन को पांडवों के साथ युद्ध के लिए भड़काया केवल अपनी अर्जुन और पांडवों के प्रति ईर्ष्या के चलते.
जो व्यक्ति कर्ण जैसे दुष्ट को दानवीर कहते हैं, वे यह भी देख लें कि कर्ण ने ये कथित दानवीर बनने का संकल्प घोषयात्रा के पश्चात लिया और वह भी बहुत सीमित अवधि के लिए.
(अर्थात् घोषयात्रा में अपनी पराजय के बाद से लेकर अर्जुन को मारने तक)
12. जब श्रीकृष्ण हस्तिनापुर में कौरवो के समक्ष शांति प्रस्ताव लेकर आये थे, तो केवल दुर्योधन ने ही नहीं, कर्ण ने भी उनको वहीँ बंदी बनाने की कपटपूर्ण योजना बनाई थी.
एक प्रश्न जो मुझसे किसी व्यक्ति ने पूछा था-
किसी को कितने पाप/अधर्मी कृत्य करने चाहिए कि उसे बुरा या दुष्ट की संज्ञा दी जाए?
यदि किसी ने ऐसे कर्म कम किए हों, और किसी ने अधिक, तो किसे बुरा कहा जाएगा?
पांडवों ने बहुत कम अधर्म किए थे. दुर्योधन और कर्ण ने बहुत.
कर्ण ने चीरहरण के लिए दुशासन को उकसाया और युधिष्ठिर ने दांव पर लगाया (जो शायद उनके जीवन का पहला अधर्म होगा).
तो क्या युधिष्ठिर बुरे नहीं थे?
मेरा उत्तर-
ये तो इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह व्यक्ति कैसा है.
मैं 2 उदाहरणों के माध्यम से समझाता हूँ -
मान लीजिए राहुल नाम का एक व्यक्ति है जो रमेश से जलता है.
राहुल ने रमेश के विरुद्ध कई कुकर्म करने की योजनाएँ बनाई हैं. वो संतुष्टि पाने के लिए रमेश को जान से भी मार सकता है.
यदि उसे मौका मिले और रोकने वाला कोई न हो वो अपने तुच्छ सम्मान के लिए निर्दोष व्यक्तियों को भी मार सकता है.
वो दिन रात इसी के बारे में सोचता है कि मैं रमेश को किस तरह से नीचा दिखाऊं या जान से मार दूं .
वैसे जान से मारने के विषय में वो अधिक सोचता है.
राहुल को लगता है कि वो सही कर रहा है या फिर वो जानता है कि ये गलत है परन्तु उसे अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने में इतना इतना आनंद मिलता है कि उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसके कृत्य सही हैं या गलत.
उसे ऐसा करके प्रसन्नता इसलिए होती है क्योंकि वो रमेश को अपने से अधिक मेधावी,धनी,लोकप्रिय,आदरणीय नहीं देख सकता.
राहुल सोचता है, “वृद्ध व्यक्ति भी रमेश का सम्मान करते हैं.
ये कैसे संभव है ?” भले ही राहुल स्वयं उनका सम्मान नहीं करता हो.
राहुल रमेश को दुखी देखकर आनंदित होता है.
वो रमेश को प्रताड़ित करने के लिए उसके परिवारवालों और प्रियजनों को अपना निशाना बनाने में भी नहीं चूकता.
रमेश, उसके परिवार और मित्रों को दुख,चिंता,निराशा,अवसाद और विपत्तियों से त्रस्त देख वो मन ही मन या कभी-कभी प्रत्यक्ष रूप से भी प्रसन्न हो जाता है.
क्या ऐसा चरित्र कर्ण का नहीं था?
क्या राहुल कर्ण जैसा नहीं?
भगवान् वेद व्यास जी का कर्ण के विषय में कथन. पुत्रदर्शन पर्व, आश्रमवासिक पर्व.
"कर्ण केवल वैर बढ़ानेके लिये उत्पन्न हुआ था"
उपरोक्त सभी धटनाओं एवं कर्ण के वचनों, कर्मों से ऐसा ही प्रतीत होता है कि कर्ण ने ये सारे कुकर्म अनजाने में नहीं अपितु अपने स्वभाववश और पांडवों (विशेषकर अर्जुन) के प्रति अपनी ईर्ष्या एवं द्वेष के कारण किए.
कर्ण ने अपने बाल्यकाल से ही पांडवों के विरुद्ध षड्यंत्र किए जैसे-
1.लाक्षागृह षड्यंत्र दुर्योधन एवं शकुनि के साथ मिलकर किया.
2.अर्जुन के द्रौपदी के स्वयंवर में सफल हो जाने पर द्रौपदी एवं द्रुपद की हत्या करने लिए राजाओं के समूह का नेतृत्व किया.
3. यह ज्ञात हो जाने पर कि पांडवों का विवाह द्रौपदी से हो गया है,धृतराष्ट्र को पांडवों से युद्ध के लिए प्रोत्साहित किया.
4.द्रौपदी को सभा में घसीटकर लाए जाने पर कर्ण ने हँसकर प्रसन्नता प्रकट की.
5.द्रौपदी वस्त्रहरण का सुझाव/आदेश दिया.
6. वस्त्रहरण असफल हो जाने के पश्चात भी अपना दुष्ट स्वभाव पुनः प्रकट करते हुए द्रौपदी से आपत्तिजनक बातें कहीं.
7.वनवास के समय भी पांडवों को मारने का षड्यंत्र स्वयं बनाया.
8.घोषयात्रा के बहाने पांडवों एवं द्रौपदी को अपमानित करने की योजना स्वयं बनाई.
9. दुर्योधन को युद्ध के लिए उकसाया जबकि शकुनि ने उसे पांडवों का राज्य लौटा देने एवं शत्रुता का अंत करने की बातें कहीं थीं.
10. श्रीकृष्ण के शान्ति प्रस्ताव के समय उन्हें बंदी बना लेने के मूर्खतापूर्ण षड्यंत्र में भागीदार हुआ.
इन सब बातों से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि टीवी सीरियल वालों, हिन्दू धर्म के कथित विद्वानों और कुछ साहित्यकारों के कारण हिन्दू जनमानस में कितनी भ्रांतियां भर चुकी हैं.
कोई भी सत्य जानने के पश्चात यही सोचेगा कि कर्ण के बारे में ऐसी मिथ्या बातें फैलाने से एवं उसके वास्तविक दुष्टता से परिपूर्ण चरित्र को छिपाने से किसी को क्या लाभ होगा?
लाभ ये होगा- कर्ण को बेचारा,भला सत्पुरुष, कथित दानवीर, सूतों को उच्च-वर्ण के लोगों द्वारा तिरस्कृत दिखाने से होता ये है कि दर्शक कर्ण के तथाकथित दुखदायी जीवन के लिए कुंती, भीष्म, द्रोण,कृप,व्यास, पांडव, स्वयं श्रीकृष्ण को भी दोषी मानने लगते हैं.
और जब कोई श्रीकृष्ण को दोषी मानता है, तब वो सनातन धर्म को भी मानने लगता है.
परन्तु क्या इस प्रकार की भ्रांतियों के लिए केवल साहित्यकार, टीवी सीरियल वाले निर्देशक ही उत्तरदायी हैं?
कदापि नहीं.
क्या कभी किसी सनातन धर्मी ने इन धारावाहिकों एवं साहित्यों पर कोई आपत्ति प्रकट की है?
नहीं.
परन्तु क्यों नहीं ?
क्योंकि अधिकतम लोगों ने स्वयं व्यास महाभारत एवं वाल्मीकि रामायण पढ़ा ही नहीं है.
कई लोग कहते हैं कि ये ग्रथ बड़े लम्बे हैं और उनके पास इन्हें पढने का कोई समय ही नहीं है.
पर वे टीवी पर 95 घंटे बी.आर.चोपड़ा की झूठी महाभारत, 94 घंटे स्टार प्लस की महानौटंकी महाभारत, 108 घंटे सिया के राम जैसी मानसिक प्रताड़ना, 200 घंटे राधाकृष्ण जैसा अत्याचार अवश्य देखते हैं.
इन टीवी सीरियल वालों ने रचनात्मक स्वतन्त्रता(Creative Liberty) का इतना लाभ उठाकर इतना बदलाव किया कि मूल महाभारत को ही इन्होने लगभग बदल दिया.
धर्मग्रंथों के अंतर्गत वाल्मीकि रामायण एवं व्यास महाभारत जैसे इतिहास एवं साहित्य में अंतर होता है - ये बात कई व्यक्ति समझते ही नहीं हैं .
इन धर्मग्रंथों में वर्णित पात्रों से सम्बंधित जानकारियों का मूल स्रोत ये ग्रन्थ स्वयं हैं.
अर्थात- अमीश त्रिपाठी का Scion of Ikshvaku, चित्रा बनर्जी की Palace of Illusions, शिवाजी सावंत की मृत्युंजय को पढ़कर कोई भी क्रमशः श्रीराम, द्रौपदी, कर्ण का वास्तविक चरित्र नहीं जान सकता.
उसके लिए वाल्मीकि रामायण एवं व्यास महाभारत को ही गंभीरता से पढ़ना पड़ेगा.
ऐसी समस्याएं क्यों उत्पन्न होती हैं?
क्योंकि हिन्दू स्वयं अपने इतिहास(रामायण-महाभारत) जिनको पंचम वेद की संज्ञा दी गई है- उन्हें पढ़ते ही नहीं हैं.
यहीं सनातन धर्म के अनुयायी हार जाते हैं और विकृतियाँ करने वाले जीत जाते हैं.
हमारे अज्ञान से इनका व्यापार फलता-फूलता है.
इन समस्याओं का समाधान केवल एक है - वास्तविक धर्मग्रंथों का अध्ययन.
धन्यवाद.🙏
@king_p_g क्योंकि मैंने केवल उनके द्वारा बनाया गया रामायण TV serial देखा है, इसलिए मैं उनके बाकी serials के बारे में कुछ नहीं कह सकता।

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