Rakesh Hindu {टीम JSK} 🙏🙏
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@modified_hindu

19 Tweets 8 reads Feb 08, 2022
विभाजन की त्रासदी
ज्योति जला निज प्राण की (पुस्तक का नाम)
पद्मिनी के जौहर की याद ताजा कर दी
झंग शाहजीवना सड़क पर झंग से 18 किलोमीटर दूर बसा है कस्बा चुंडभरवाना। शाहजीवना यहाँ से 10 किलोमीटर दूरी पर है। देश विभाजन के पूर्व इस कस्बे में हिंदुओं का ही प्रभाव था। अधिकांश (1/19)
दुकान व जमींदारियाँ भी उन्हीं की थी। आस-पास की खेती की जमीन भी हिंदू-सिक्खों ने मुसलमानों से खरीद ली थी। परंतु कस्बा मुस्लिम बहुल आबादी वाले गाँवों से घिरा था। क्षेत्र में मुस्लिम लीग हावी थी।
यहाँ एक भव्य गुरुद्वारा था, केशधारी व सहजधारी सब मिलकर यही पूजा भजन करते थे। (2/19)
इस कस्बे के बहुत से लोग पुलिस व रेलवे में अच्छे पदों पर थे। सहजधारियों का केशधारियों का आपस में रोटी-बेटी का संबंध था। सब एक दूसरे के रिश्तेदार थे। पहले मुसलमानों के साथ अच्छे संबंध थे पर विभाजन निकट आते-आते लीग के प्रभाव में मुसलमानों में हिंदुओं के प्रति घृणा भर गई।
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जब बँटवारा सुनिश्चित हो गया और चारों ओर से मुसलमानों के हमलों व मारकाट के समाचार आने लगे तो एक दिन सभी हिंदू गुरुद्वारे में एकत्रित हुए। उन्होंने गुरुग्रंथ साहेब की उपस्थिति में एक गुरुमत्ता संकल्प लिया कि सभी लोग साथ-साथ गाँव छोड़कर इज्जत के साथ भारत जाएंगे और यदि यह (4/19)
संभव ना हो सका तो सब लड़ते-लड़ते मर जाएंगे। 'जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल' आदि नारों के साथ अपने इस संकल्प को अपनी स्वीकृति दी।
अगस्त मास में हमला हुआ। बाहर से लूटपाट हेतु आए मुसलमानों के साथ कस्बे के मुसलमान भी मिल गए। दस हजार लोगों ने गुरुद्वारा घेर लिया। सभी हिंदू- (5/19)
सिख मय स्त्री- बच्चों के वहीं आ गए थे। गुरुद्वारा किलानुमा बना हुआ था। हिंदुओं के पास सामान्य तलवारें व कृपाणें आदि थी पर हमलावर तो बंदूकों आदि सभी हथियारों से सुसज्जित थे। फिर भी मोर्चा जमाया गया। छतों पर ईंट पत्थर एकत्रित कर लिए गए थे। इन्हीं के बल पर 4 दिन तक हमलावरों (6/19)
को रोके रखा गया। वे हमला करने आगे बढ़ते तो आबाल-वृद्ध ईटों की ऐसी बौछार करता कि वह घायल होकर खून बहाते उल्टे पाँव भागते। महिलाएं व बच्चे भी बड़ी दिलेरी से मुकाबला कर रहे थे। यदि कोई गोली का शिकार हो जाता है तो उसके शव को अलग रखकर दूसरा मोर्चे पर आ जाता। शहीद हुए के लिए (7/19)
आँसू बहाने का अवसर कहाँ था।
हमलावर निराश होने लगे। उन्हें इस प्रकार के तीव्र प्रतिरोध की आशा नहीं थी। जब वे निराश होकर वापस जाने की सोच रहे थे तभी हिंदुओं के दुर्भाग्य से क्षेत्र का विधायक सैयद मुबारक शाह उधर से निकला। वह अपने नगर शाहजीवना जा रहा था। हमलावरों के सरदार (8/19)
ने उसके सामने अपना दुखड़ा रोया। कहा कि हमारे सैकड़ों लोग व्यर्थ में घायल हो गए। पर चुण्ड भरवाना जीता नहीं जा सका। अब लोग निराश होने लगे हैं। उनका मनोबल टूट रहा है। उस लीगी जनप्रतिनिधि ने उनकी हौसला अफजाई करते हुए कहा कि चिंता मत करो चिनाब नदी के पुल पर बिलोच मिलिट्री की (9/19)
टुकड़ी तैनात है। मेरा पत्र ले जाओ और वहाँ के कमांडर को देना। वे फ़तेह पाने हेतु तुम्हारी मदद करने आ जाएंगे। वे लोग पत्र लेकर गए और मिलिट्री की टुकड़ी आ गई और उसने आते ही अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी।
बिलोच सेना के आ जाने से स्थिति एकदम बदल गयी। उसका मुकाबला ईट पत्थरों से (10/19)
करना असंभव था। दूसरी बात यह थी कि 4 दिन के उस संघर्ष में अनेक नौजवान हमलावरों की गोलियों का शिकार हो गए थे। इसलिए प्रमुख लोगों ने फिर बैठक बुलाई। तय यह हुआ कि माँ-बहनों की इज्जत बचाने हेतु उनकी जीवनलीला अपने हाथों समाप्त कर दी जाए। महिलाएं उसके लिए खुशी-खुशी राजी थी। (11/19)
उन्होंने भी कहा कि मुसलमानों के हाथ पड़कर अपनी इज्जत लुटवाने की अपेक्षा वे अपने लोगों के हाथों मरना पसंद करेंगी। फिर क्या था जौहर की तैयारी शुरू हो गई। गुरुद्वारे का सारा सामान बड़े कक्ष में एकत्रित कर उसके ऊपर पवित्र गुरुग्रंथ साहब की बीड़ रख दी गई। उस कक्ष में अरदास (12/19)
करके आग लगा दी गई। महिलाएं एक-एक कर आगे आती गई और चिता पर आरोहण करती गई। गुरुद्वारे के अंदर एक कुआँ था। अनेक देवियों ने अपने बच्चों समेत उसमें छलाँग लगाकर वह कुआँ पाट दिया। जब यह सब हो गया तो शेष बचे नौजवान जो भी हथियार उनके पास थे उसे लेकर बाहर निकल पड़े और लड़ते-लड़ते (13/19)
शहीद हो गए। महिलाओं की बात क्या कोई छोटा बालक भी गुंडों के हाथ ना आया। जब बिलोच सेना की पोशाक में दानवों ने गुरुद्वारे में प्रवेश किया तो तौबा-तौबा करने लगे। उन्होंने वहाँ जली और अधजली लाशों के अलावा और कुछ भी नहीं पाया। निश्चिंत ही उन्हें उसी प्रकार की निराशा हुई होगी, (14/19)
जैसी चित्तोड़ के जौहर के बाद अलाउद्दीन वह उसके सैनिकों को चित्तौड़ के दुर्ग में प्रवेश करते समय हुई होगी। कहते हैं अलाउद्दीन खिलजी ने तो उस बलिदान के आगे अपना मस्तक श्रद्धा से झुका दिया था। यदि उन लुटेरों में भी कहीं मानवता का उद्रेक उस बलिदान की आभा के कारण हुआ होगा (15/19)
तो उन्होंने भी उन बलिदानियों के रज से पावन हुई धूलि को अपने मस्तक पर लगा लिया होगा।
चुण्ड भरवाना के कुछ घायल प्रत्यक्षदर्शी ही इस अनूठी बलिदान गाथा को सुनाने के लिए बचे रहे। वे भी शीघ्र ही चल बसे। परंतु उस समय वहाँ के जो परिवार विभिन्न कारणों से वहाँ नहीं थे वे ही बच गए (16/19)
हैं। उनके लिए ही नहीं, सभी भारतीयों के लिए यह बलिदान गाथा अमित यादगार बन गई। सभी की यह तीव्र अभिलाषा होना स्वाभाविक है कि एकबार वहाँ जाकर उस धूलि को मस्तक पर लगाकर अपने जीवन को प्रेरणा से भर ले। पिछले दिनों चुंड के कुछ नौजवान वहाँ गए थे। उन्होंने उस कुएं के दर्शन किए थे। (17/19)
वह कुआँ तो पाट दिया गया था, इस कारण वे उसके अंदर झाँककर बलिदानी माँ बहनों के संदेश को सुन तो नहीं पाए, पर वहाँ की धूलि को पाकर कृत-कृत्य हो गए। इस धूलि को भारत लाकर उन्होंने अपने साथियों को भी दिया जिसे चंदन से भी पावन मानकर सबने मस्तक पर धारण किया।
चुण्ड के बचे लोगों (18/19)
ने उन शहीदों की याद में सतनाम पार्क दिल्ली में गुरुद्वारा शहीदा बनवाया है। यहाँ प्रतिवर्ष अगस्त मास में बड़े भावपूर्ण वातावरण में तीन दिनी शहीदी समारोह मनाकर उन बलिदानियों की स्मृति को ताजा किया जाता है।
#साभार
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