शाण्डिल्योऽस्मि
शाण्डिल्योऽस्मि

@Shandilyosmi

15 Tweets 1 reads Mar 21, 2022
१. हमारा ब्राह्मण शरीर है और हमारे पुर्वजों ने किसी का शोषण नही किया...शोषक और शोषित का राग तुम जैसे कुछ बुद्धिजीवियों ने इस समाज में स्वयं वैमनस्यता उत्पन्न करने के लिए अलापा है, तथा पीछले कुछ शताब्दियों में यत्र तत्र कहीं शोषण दिखाई पड़ता है तो उसका मूल भी समाज के कुछ लोगों +
का प्रमाद हो सकता है सार्वभौम नही...धर्म सम्राट जी के विचार में जो स्थूल दृष्टया कठोरता परिलक्षित होती है उसका मूल कारण अज्ञता है,उन्होंने स्वयं अंत्यज भाइयों के उत्कर्ष के लिए क्या कहा उसे पहले देख लेने की आवश्यकता है..
(रामराज्य परिषद का घोषणा पत्र निम्न है सबसे नीचे देंखे 👇)
२. स्मृतिग्रंथो में वर्णित तथा प्रतिष्ठापकाचार्यों के द्वारा अनुमोदित स्पृश्यास्पृश्यादि सम्बन्धी विधि निषेध भेदमूलक न होकर तत्तद क्रियाकलापों (पूजनादि, गर्भगृह प्रवेशादि) की शास्त्रसम्मत विधा से संसिद्धि के लिए बनाए गए हैं किसी से द्वेष के कारण नहीं... ध्यातव्य रहे की +
विधि निषेध उत्तरोत्तर अधिकाधिक ही होते हैं
जैसे :- सबसे कम विधि निषेध अंत्यज बंधुओं के लिए है, उससे अधिक वैश्य बंधुओं के लिए, उससे अधिक क्षत्रीय भाईयो के लिए है तथा सर्वाधिक ब्राह्मणों के लिए है, ब्राह्मणों से भी अधिक सन्यासी के लिए हैं।
जिसकी दृष्टि केवल स्थूल शब्दों पर होगी उसके पीछे के ध्येय पर नहीं वो उसको भेदमूलक समझेगा तथा अर्थ का अनर्थ करेगा... समस्या ये है की आप जैसे लोगो को फल शास्त्रसम्मत चाहिए पर विधि शास्त्रसम्मत नही चाहिए...सारी विडंबना का मूल ये है।
३. आप कह रहे हो की आप कौन हो तथा आपसे सम्बन्धित जितने प्रश्न हैं वो निरर्थक है, सत्य व्यक्ति केंद्रित नहीं होता आदि आदि...फिर हमारा प्रश्न है बार बार नाम ले ले कर धर्मसम्राट जी, पुरी पीठाधीश्वर जी पर वैयक्तिक आक्षेप क्यों करते हो ? उस समय क्या ये ज्ञान घास चरने गया होता है ? +
४. हर कोई तुम्हारे समान नहीं हो सकता जो कहे की मैं पुराणों को नहीं मानता, स्मृतियों को नही मानता, प्रतिष्ठापकाचार्यो को नही मानता, तो प्रश्न उठता है की आप मानते क्या हैं ? तब उत्तर आता है मैं वही मानता हूं जिसे मैं ठीक समझता हूं... तुम्हारे संपूर्ण तर्क का सार यही है...+
५. रही बात हमारे विचाराधारा की तो हमारी विचाराधारा किसी व्यक्ति पर केंद्रित न होकर शास्त्रनिष्ठ और शास्त्रों पर ही केंद्रित है इसमें भगवद् वाक्य प्रमाण है...👇 +
६. अब यहां तुम स्वयं स्वीकार कर गए की मैं विद्वान नही हूं (ये बात समझी जा सकती है) किन्तु स्वयं विद्वान न होकर भी तुम न केवल धर्मसम्राट जी को (जिनके वैदुष्य के सामने तुम्हारा अस्तित्व एक कण के सदृश भी नही है) अपितु हमारे आर्ष परम्परा के समस्त प्रतिष्ठापकाचार्यो को +
और यहां तक कि हमारे सनातन परम्परा प्राप्त ऋषि महर्षियों और स्मृतिकारों को भी ख़ारिज कर रहे हो, ऐसा स्वतंत्र विचारक हमने कभी नहीं देखा है जिसे खुद कुछ न आता हो पर वो सबका खंडन ही करता फिरता हो...इससे हास्यास्पद भी कुछ हो सकता है क्या ? +
७. तुमने हमसे पूछा की शूद्र को प्रणाम क्यों नहीं करना चाहिए हमे समझाइए ? हमारा उत्तर ये है की जाओ करो प्रणाम तुम्हे किसने मना किया है भाई ? हम तो कह रहे हैं की उदार हृदय दिखाओ और उनका पाद प्रक्षालन करके उस जल को भी पियो और समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत करो...हमे क्या आपत्ति होगी ?+
हमारा पक्ष तो बस ये है की यदि मै किसी शूद्र को प्रणाम नही करना चाहता ये मेरी स्वेच्छा है (वो शास्त्र सम्मत हो चाहे नही हो वो बाद की बात है) पर तुम मुझे बाधित नहीं कर सकते की मैं किस को प्रणाम करू या ना करू ये मेरी वैयक्तिक स्वतंत्रता है जिसमे तुम इदमित्थम नही कर सकते...+
आज इस देश के राष्ट्रपति शूद्र हैं आगे भी होंगे हमे क्या आपत्ति हो सकती है ? इसमें समझाने की क्या आवश्यकता है ? कोई यदि उनको प्रणाम कर रहा है वो धेमविरुद्ध है की नही है ये उसका प्रारब्ध और नियति तय करेगी हमारा दृढ़ विश्वास है की "अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्" +
किन्तु यदि कोई उन्हें प्रणाम नही करना चाहता तो उसके अभिव्यक्ति को कुचला नही जा सकता इसमें हमारी मति एकदम निश्चित है।
अंत में यही कहूंगा की हमारी जो अपेक्षाएं तुमसे है वो हम लिख चुके हैं...आगे तुम्हारी मति की तुम कौन से मार्ग का चयन करोगे...
जिन्हें जानना है की वर्ण जन्म से होता है या कर्म से उनके लिए हमने बहुत पूर्व में ही इसपर लिखा था...

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