सूत्र
1. हर धर्म में उसके धर्मगुरु का स्थान सर्वोच्च होता है। धर्म का प्रसार करना, धार्मिक परंपरा का निर्वहन करना तथा धर्मावलंबियों में आध्यात्मिक बोध जागृत कराना धर्मगुरु का ही कार्य है।
ईसाई का जब भारत में आगमन हुआ तब वे धर्म परिवर्तन के कार्यों में जुट गए। +
1. हर धर्म में उसके धर्मगुरु का स्थान सर्वोच्च होता है। धर्म का प्रसार करना, धार्मिक परंपरा का निर्वहन करना तथा धर्मावलंबियों में आध्यात्मिक बोध जागृत कराना धर्मगुरु का ही कार्य है।
ईसाई का जब भारत में आगमन हुआ तब वे धर्म परिवर्तन के कार्यों में जुट गए। +
2. जब वे हिन्दू समाज के कुछ वर्ग के समक्ष धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से जाते तो उस वर्ग का व्यक्ति उनसे यह कहता कि “परंतु कोई भी निर्णय लेने से पूर्व में अपने ब्राह्मण पुरोहित से परामर्श लूंगा।”
इतना अटूट विश्वास था उसको अपने ब्राह्मण पुरोहित पर। +
इतना अटूट विश्वास था उसको अपने ब्राह्मण पुरोहित पर। +
3.तब ईसाई धर्म के प्रचारक यह बात समझ गए कि जब तक ब्राह्मण का सम्मान रहेगा तब तक हिंदुओं के किसी वर्ग का धर्म परिवर्तन कराना अत्यंत दुष्कर कार्य है।
उसके बाद उन्होंने एक युक्ति सोची तथा उसे क्रियान्वित किया जिससे ब्राह्मण का अपयश हुआ तथा हिन्दू समाज की दृष्टि में वे अमान्य हो गए।+
उसके बाद उन्होंने एक युक्ति सोची तथा उसे क्रियान्वित किया जिससे ब्राह्मण का अपयश हुआ तथा हिन्दू समाज की दृष्टि में वे अमान्य हो गए।+
4. उन्होंने आर्य के विदेशी होने के सिद्धांत तथा काल्पनिक उत्पीड़न साहित्य की रचना की।
ईसाइयों तथा आँग्लदेशियों ने इस उत्पीड़न भरे काल्पनिक साहित्य को मैकाले की शिक्षा प्रणाली में सम्मिलित कर लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मण वर्ग सर्वाधिक घृणित घोषित हो गया।+
ईसाइयों तथा आँग्लदेशियों ने इस उत्पीड़न भरे काल्पनिक साहित्य को मैकाले की शिक्षा प्रणाली में सम्मिलित कर लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मण वर्ग सर्वाधिक घृणित घोषित हो गया।+
5. हम किसी भी अन्य धर्म के धर्मगुरुओं की अपने ब्राह्मण धर्मगुरु अथवा पुरोहित से तुलना कर लें। केवल हमारे पुरोहित ही हैं जो बिना किसी अपेक्षा के निस्वार्थ भाव से आशीर्वाद देते हैं, जैसे सुखी रहो, दीर्घायु हो।+
6. जबकि इसी ब्राह्मण वर्ग का दानवीकरण हमारी मैकाले की शिक्षा प्रणाली और उसमें सम्मिलित उत्पीड़न साहित्य ने कर दिया है।
वे यह जानते थे तक पुरोहित वर्ग को अमान्य नही किया जाएगा तब तक हिन्दू धर्म का जड़ से नाश नही किया जा सकता, अतः यह पुरोहित विरोध वस्तुतः हिन्दू विरोध ही है।+
वे यह जानते थे तक पुरोहित वर्ग को अमान्य नही किया जाएगा तब तक हिन्दू धर्म का जड़ से नाश नही किया जा सकता, अतः यह पुरोहित विरोध वस्तुतः हिन्दू विरोध ही है।+
7. यह इसी काल्पनिक उत्पीड़न साहित्य का ही परिणाम है कि हिंदु मंदिर भेदभाव तथा पाखण्ड के केंद्र घोषित कर दिए गए और उन्हें राज्यों ने अपने नियंत्रण में ले लिया।
हिन्दू धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म में पुरोहित वर्ग का अपमान नही सुना जाता।+
हिन्दू धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म में पुरोहित वर्ग का अपमान नही सुना जाता।+
8. तिब्बती लोग वर्षों पहले अपने देश से विस्थापित हुए फिर भी उनका अपने दलाई लामा पर सम्पूर्ण श्रद्धाभाव है। मुस्लिम मौलाना भले ही कोई अप्रिय फतवा दे दे फिर मुस्लिम समाज उनका सार्वजनिक रूप से अपमान नही करता।+
9. ईसाई समाज भले ही किसी बात पर अपने पादरी की किसी बात या कृत्य से असंतुष्ट हो परंतु वह भी सार्वजनिक रूप से उनका अनादर नही करता। जैन, सिख, यहूदी सब क्रमशः अपने मुनि, ग्रंथि तथा रब्बी का सहृदय सम्मान करते हैं।+
10. अन्य धार्मिक समाज के विपरीत हिन्दू समाज तो अपने पुरोहित, धर्मगुरुओं का मुखर होकर विरोध करता है।
हिन्दू समाज की तो यह स्थिति है कि वह अपने शंकराचार्यों, अन्य सर्वोच्च धर्मगुरुओं का भी सम्मान नही करता क्योंकि उसका मन मस्तिष्क औपनिवेशिक दासता से ग्रस्त है।+
हिन्दू समाज की तो यह स्थिति है कि वह अपने शंकराचार्यों, अन्य सर्वोच्च धर्मगुरुओं का भी सम्मान नही करता क्योंकि उसका मन मस्तिष्क औपनिवेशिक दासता से ग्रस्त है।+
11. अन्य धर्मों के लोग उस प्रकार की मानसिक दासता से ग्रस्त नहीं है।
किसी भी धर्म के पुरोहित वर्ग की दशा उस धर्म की दशा की प्रतिबिम्ब है।
पुरोहित वर्ग के पतन से उसके धर्म का पतन होता है।+
किसी भी धर्म के पुरोहित वर्ग की दशा उस धर्म की दशा की प्रतिबिम्ब है।
पुरोहित वर्ग के पतन से उसके धर्म का पतन होता है।+
12. वर्तमान काल में पुरोहित वर्ग की दयनीय स्थिति, उनकी उपेक्षा यह दर्शाती है कि हम हिन्दू धर्म की कितनी उपेक्षा कर रहे हैं।
//समाप्त//
//समाप्त//
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