विवाह १. विवाह और विवाद सदा समान व्यक्तियों से ही होना चाहिये। २. बुद्धिमान् मनुष्य श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न कुरूप कन्या के साथ भी विवाह कर ले, पर नीच कुलमें उत्पन्न रूपवती सुलक्षणा कन्या के साथ भी विवाह न करे ।
विवाह समान कुल में ही होता है ।
३. मातृपक्ष से पाँचवीं पीढ़ी तक और पितृपक्ष से सातवीं पीढ़ी तक जिस कन्या का सम्बन्ध न हो, उसी से पुरुष को विवाह करना चाहिये ।
४. यदि अज्ञानवश अपने गोत्र की अथवा सपिण्ड की कन्या से विवाह हो जाय तो उसका भोग त्यागकर माता के समान उसका पालन करना चाहिये।
यदि पुरुष उस कन्या के साथ गमन करता है तो उसकी शुद्धि उस व्रत (प्रायश्चित्त) -
के करने से होती है, जो गुरुपत्नीगमन करने पर किया जाता है और उससे उत्पन्न हुई सन्तान चाण्डाल होती है । ५. द्विजातियों के लिये अपनी जाति की कन्या से विवाह करना ही श्रेष्ठ माना गया है।
अपनी जाति की स्त्री ही पति की शारीरिक और नित्य धर्मकार्यको करे, अन्य जातिकी स्त्री कदापि न करे।
६. यदि मनुष्य काम के वशीभूत होकर दूसरा विवाह करना चाहे तो अनुलोम-क्रम से कर सकता है। तात्पर्य है कि 'ब्राह्मण' ब्राह्मणी, क्षत्रिया तथा वैश्या के साथ, 'क्षत्रिय' क्षत्रिया तथा वैश्य के साथ और 'वैश्य' वैश्य के साथ विवाह कर सकता है। 'शूद्र' शूद्रा के साथ ही विवाह कर सकता है।
७. धन देकर खरीदी गयी स्त्री 'पत्नी' नहीं कहलाती, अपितु 'दासी' कहलाती है। ऐसी स्त्री का तथा उस से उत्पन्न हुए पुत्र का देवकार्य अथवा पितृकार्य में अधिकार नहीं होता।
८. स्वयंवर - विधि से जिन कन्याओं का विवाह हुआ है, वे सभी (सीता, दमयन्ती, द्रौपदी आदि) जीवनभर दुःखी रही हैं। अतः स्वयंवर - विधि शास्त्रोक्त होते हुए भी सुखप्रद नहीं है ।
९. एक मंगलकार्य करनेके बाद छः मास के भीतर दूसरा मंगलकार्य नहीं करना चाहिये ।
पुत्र का विवाह करने के बाद छ: मास के भीतर पुत्री का विवाह नहीं करना चाहिये। एक गर्भ से उत्पन्न दो कन्याओं का विवाह यदि छः मास के भीतर हो तो तीन वर्ष के भीतर उनमें से एक विधवा होती है।
१०. अपने पुत्र के साथ जिस की पुत्री का विवाह हो, फिर उसके पुत्र के साथ अपनी पुत्री का विवाह नहीं करना चाहिये। एक ही वर के लिये दो कन्याएँ नहीं देनी चाहिये। दो सहोदर वरों को दो सहोदरा कन्याएँ नहीं देनी चाहिये। दो सहोदरों का एक ही दिन विवाह या मुण्डन कर्म नहीं करना चाहिये ।
११. ज्येष्ठ लड़के तथा ज्येष्ठ लड़की का विवाह परस्पर नहीं करना चाहिये। ज्येष्ठमास में उत्पन्न सन्तान का विवाह ज्येष्ठमास में नहीं करना चाहिये । १२. प्रथम गर्भोत्पन्न लड़के या लड़की का विवाह उसके जन्म मास, जन्म नक्षत्र और जन्म दिन को नहीं करना चाहिये ।
१३. जन्म से सम वर्षों में स्त्री का तथा विषम वर्षों में पुरुष का विवाह शुभ होता है। इसके विपरीत होने से दोनों का नाश होता है।