࿗ हिरण्या ࿗
࿗ हिरण्या ࿗

@Hiranyaa_

9 Tweets 5 reads Nov 07, 2022
दूसरे की वस्तु
१. दूसरों के पहने हुए वस्त्र और जूते नहीं पहनने चाहिये ।
२. दूसरों के उपयोग में आये हुए यज्ञोपवीत,आभूषण,माला,छाता, वस्त्र और कमण्डलु का त्याग करे।
३. दूसरों की सवारी, शय्या, आसन, कुआँ, उद्यान और घर को बिना कुछ दिये उपभोग करनेवाला उनके स्वामी के चतुर्थांश पाप का भागी होता है ।
४. दूसरे का अन्न, वस्त्र,धन,शय्या, गाड़ी,स्त्री का सेवन और दूसरे के घरमें वास - ये इन्द्र के भी ऐश्वर्य को नष्ट कर देते हैं।
५. जो मनुष्य अमावस्या को दूसरे का अन्न खाता है, उसका महीनेभर का किया हुआ पुण्य दूसरे को मिल जाता है।
अयनारम्भ के दिन दूसरे का अन्न खाये तो छ: महीनों का और विषुवकाल (जब सूर्य मेष अथवा तुला राशिपर आये) में दूसरे का अन्न खाने से तीन महीनों का पुण्य चला जाता है।
चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाये तो बारह वर्षों से एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। संक्रान्ति के दिन दूसरे का अन्न खानेसे महीनेभर से अधिक समय का पुण्य चला जाता है।
६. दूसरे का अन्न खानेसे जिसकी जीभ जल चुकी है, दूसरे से दान लेने से जिसके हाथ जल चुके हैं और दूसरे की स्त्री का चिन्तन करने से जिसका मन जल चुका है, उसे (जप, तप आदि करनेसे) सिद्धि कैसे मिल सकती है?
७. व्रत, तीर्थ, अध्ययन तथा श्राद्ध में दूसरे का अन्न नहीं खाना चाहिये; क्योंकि जिसका अन्न खायगा, उसी को फल मिलेगा।
८. अनिन्द्य निमन्त्रण के बिना दूसरे के पकाये अन्नमें रुचि नहीं रखनी चाहिये ।
९. किसी के घर का अन्न या तो प्रेम के कारण खाना चाहिये या आपत्ति में पड़नेपर (भूखों मरनेपर ) !
१०. जो निर्बुद्धि गृहस्थ अतिथि सत्कार के लोभसे दूसरे के घर जाकर उसका अन्न खाता है, वह मरने के बाद उस अन्नदाता के यहाँ पशु बनता है।
११. दूसरों की कोई भी वस्तु, चाहे वह सरसों के बराबर भी छोटी क्यों न हो, अपहरण करनेपर मनुष्य पापी और नरकगामी होता है। . इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ।
११. दूसरों की कोई भी वस्तु, चाहे वह सरसों के बराबर भी छोटी क्यों न हो, अपहरण करनेपर मनुष्य पापी और नरकगामी होता है। . इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ।

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