तीर्थ १. जिसकी तीर्थों में श्रद्धा नहीं है, जो पापी है,
नास्तिक है,
संशय करनेवाला तथा तर्कवादी है- ये पाँच प्रकार के मनुष्य तीर्थफल के भागी नहीं होते। २. पैदल चलनेकी सामर्थ्य होने पर भी गोयान (बैलगाड़ी आदि) पर तीर्थ में जाने से गोवध का पाप लगता है।
अश्वयान (घोड़े, ताँगे आदि) पर जानेसे तीर्थयात्रा निष्फल होती है। नस्थान (पालकी, रिक्शा आदि) पर जाने से तीर्थ का आधा फल मिलता है। पैदल चलकर जाने से चौगुने फल की प्राप्ति होती है।
३. तीर्थक्षेत्र में जाने पर मनुष्य को सदा स्नान, दान, जप आदि करना चाहिये, अन्यथा वह रोग, दरिद्रता, मूकता आदि दोषों का भागी होता है। ४. अन्य जगह किया हुआ पाप तीर्थ में जानेसे नष्ट हो जाता है,
पर तीर्थ में किया हुआ पाप वज्रलेप हो जाता है।
५. जब कोई अपने माता, पिता, भाई, सुहृद् अथवा गुरु को फल मिलने के उद्देश्य से तीर्थ में स्नान करता है, तब उसे स्नान के फल का बारहवाँ भाग प्राप्त हो जाता है।
६. जो दूसरे के धनसे तीर्थयात्रा करता है, उसे पुण्य का सोलहवाँ अंश प्राप्त होता है तथा जो दूसरे कार्य के प्रसंग से तीर्थ में जाता है, उसे उसका आधा फल प्राप्त होता है।