किनको न देखें ? १. बिना किसी निमित्त (प्रयोजन) के उदय और अस्त होते समय तथा मध्याह्न के समय सूर्य को नहीं देखना चाहिये।
इसी प्रकार जल, दर्पण आदि में प्रतिबिम्बित और ग्रहण लगे हुए सूर्य तथा चन्द्रमा को भी नहीं देखना चाहिये ।
२. अस्त के समय सूर्य और चन्द्रमा को देखने से रोगों की उत्पत्ति
होती है । ३. कृष्णपक्ष में खण्डित चन्द्रमा को उदयकाल में देखने से रोग होता है। ४. सूर्य की ओर सर्वथा नहीं देखना चाहिये ।
५. जब आकाश में एक ही तारा हो, उस समय उधर नहीं देखना चाहिये अन्यथा रोगों का भय प्राप्त होता है।
यदि उस एक तारे को देख ले तो देवताओं के दर्शन और भगवान् का स्मरण करके सात बार नारदजी का नाम जपना चाहिये ।
६. जूठे मुँह अथवा अशुद्ध अवस्था में सूर्य,चन्द्रमा,ग्रह,नक्षत्र,तारे आदि को नहीं देखना चाहिये।
इसी तरह ब्राह्मण,गुरु,देवता, राजा,श्रेष्ठ संन्यासी,योगी,देवकार्य करने वाले तथा धर्म का उपदेश देनेवाले द्विज के पास भी जूठे मुँह अथवा अशुद्ध अवस्था में नहीं जाना चाहिये।
७. मल-मूत्र की ओर नहीं देखना चाहिये। ८. चमकीली, सूक्ष्म, अस्थिर, अपवित्र और अप्रिय वस्तुओं को
निरन्तर नहीं देखना चाहिये। ९. जल में और तेल में अपनी परछाई नहीं देखनी चाहिये।
१०. शव का स्पर्श किये हुए व्यक्ति को, क्रुद्ध गुरु के मुख को, तेल और जल में पड़नेवाली छाया को, भोजन करती हुई पत्नी को, खुले हुए अंगोंवाली स्त्री को, पागल एवं मतवाले व्यक्ति को नहीं देखना चाहिये.
११. पत्नी के साथ भोजन नहीं करना चाहिये और उसे भोजन करते हुए, छींकते हुए, जम्हाई लेते हुए तथा आसनपर स्वेच्छा से बैठे रहने की अवस्था में नहीं देखना चाहिये। १२. जल में अपना रूप, नदी आदि का किनारा और गहरे गड्ढे को
नहीं देखना चाहिये।
१३. जल में सूर्य और चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब देखने से मनुष्य को शोक की प्राप्ति होती है। १४. पराया मैथुन देखने से बन्धु का वियोग होता है। १५. नग्न परस्त्री अथवा परपुरुष की ओर कभी नहीं देखना चाहिये। १६. जो दूषित हृदयसे किसी नग्न स्त्रीकी ओर देखते हैं, वे रोग से पीड़ित होते हैं।