तो ये स्पष्ट है कि इंद्रदेव का विष्णुजी के कारण वज्र धारण करने में समर्थ हो पाना, प्रजापति से शक्ति प्राप्त करना, स्त्रियों से संबंध, छल से असुरों को मारना, विश्वरूप वध से ब्रह्महत्या जैसी कथाएं वेद में भी हैं।
फिर पुराणों पर ही उनके चरित्र हनन का आरोप किसलिए?
फिर पुराणों पर ही उनके चरित्र हनन का आरोप किसलिए?
वेदों में इंद्रदेव का वामदेव ऋषि द्वारा पराजित होना और ऋषि दधीचि द्वारा उनकी तुलना श्वान से किए जाने जैसी कथाएं भी हैं।
क्या वेदों को भी प्रक्षिप्त मानकर अपने मानसिक रूप से विक्षिप्त होने का परिचय दिया जाए?
यदि नहीं तो हर बात में पुराणों को दोष देने का चलन भी बंद होना चाहिए।
क्या वेदों को भी प्रक्षिप्त मानकर अपने मानसिक रूप से विक्षिप्त होने का परिचय दिया जाए?
यदि नहीं तो हर बात में पुराणों को दोष देने का चलन भी बंद होना चाहिए।
यदि वैदिक मंत्रों और आख्यानों के गूढ़ अर्थ संभव हैं, तो पुराणों में ऐसा होना कैसे और क्यों संभव नहीं है?
जबकि कई महान संतों और आचार्यों ने माना है कि पुराणों के भी अधिभौतिक अधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थ होते हैं।
जबकि कई महान संतों और आचार्यों ने माना है कि पुराणों के भी अधिभौतिक अधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थ होते हैं।
इसीलिए हमें पश्चिमी इतिहासकारों के स्वामीभक्त श्वान बनकर पुराणों को दोष देने के स्थान पर प्राचीन सनातनी परंपरा अनुसार भगवान वेदव्यास द्वारा सभी सनातनियों के कल्याण के लिए रचित पुराणों के प्रति आस्था रखनी चाहिए।
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