17 Tweets 8 reads Jul 12, 2022
Colonial era के Indologists के अजीबोगरीब कल्पनाओं को हम हिंदू इतना भाव क्यों दे देते हैं?
अगर कुछ लोगों को आजकल ऐसा लगता है पुराणों में इंद्र देव से संबन्धित कथाएं उनका अपमान करने हेतु बनाई गई हैं, तो वेदों में भी उसी प्रकार की कथाएं क्यों हैं?
पुराणों में देवराज इंद्र को विष्णुजी के बिना कुछ असुरों को मारने में असमर्थ दर्शाया गया है।
पर ऐसा वेदों में भी तो है।
कृष्ण-यजुर्वेद(तैत्तरीय-संहिता) के अनुसार इंद्रदेव विष्णुजी की शक्ति से ही वज्र को धारण करने में और वृत्रासुर को मारने में समर्थ हो सके।
ऋक परिशिष्ट ग्रंथ बृहद्देवता के अनुसार भी इंद्रदेव ने विष्णुजी से सहायता मांगी थी।
यदि कोई ये कहे कि कोई वेदों में इंद्रदेव ने कभी कोई छल नहीं किया तो ये भी असत्य है।
शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण के अनुसार-
ऋग्वेद के कौषितकी उपनिषद में स्वयं इंद्रदेव ने बताया कि उन्होंने अनेकों संधियों को तोड़कर असुरों को मारा था।
सामवेद के जैमिनीय ब्राह्मण में इंद्रदेव के ऐसे कार्यों को का उल्लेख किया गया है -
त्रिशिरा(विश्वरूप) को मारने से ब्रह्महत्या का पाप लगा था ये बात कृष्ण-यजुर्वेद(तैत्तरीय-संहिता) में वर्णित है -
ऋक् परिशिष्ट ग्रंथ बृहद्देवता में भी विश्वरूप को मारने से इंद्रदेव को ब्रह्महत्या का पाप लगने का उल्लेख है -
कृष्ण यजुर्वेद(तैत्तरीय संहिता) के अनुसार वृत्रासुर के वध से भी ऐसा ही हुआ
इंद्र अहिल्या की कथा वेदों में भी है।
सामवेद के जैमिनीय-ब्राह्मण के अनुसार -
वेदों में और जगह भी इंद्रदेव को अहिल्या का जार कहा गया है-
इंद्रदेव विलिस्तेंगा नामक असुरी को प्राप्त करना चाहते थे।
- कृष्ण-यजुर्वेद(काठक संहिता)
ऋक्-परिशिष्ट ग्रंथ बृहद्देवता के अनुसार इंद्र देव के व्यंस नामक दानव की बहन से भी संबंध थे।
तो ये स्पष्ट है कि इंद्रदेव का विष्णुजी के कारण वज्र धारण करने में समर्थ हो पाना, प्रजापति से शक्ति प्राप्त करना, स्त्रियों से संबंध, छल से असुरों को मारना, विश्वरूप वध से ब्रह्महत्या जैसी कथाएं वेद में भी हैं।
फिर पुराणों पर ही उनके चरित्र हनन का आरोप किसलिए?
वेदों में इंद्रदेव का वामदेव ऋषि द्वारा पराजित होना और ऋषि दधीचि द्वारा उनकी तुलना श्वान से किए जाने जैसी कथाएं भी हैं।
क्या वेदों को भी प्रक्षिप्त मानकर अपने मानसिक रूप से विक्षिप्त होने का परिचय दिया जाए?
यदि नहीं तो हर बात में पुराणों को दोष देने का चलन भी बंद होना चाहिए।
यदि वैदिक मंत्रों और आख्यानों के गूढ़ अर्थ संभव हैं, तो पुराणों में ऐसा होना कैसे और क्यों संभव नहीं है?
जबकि कई महान संतों और आचार्यों ने माना है कि पुराणों के भी अधिभौतिक अधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थ होते हैं।
इसीलिए हमें पश्चिमी इतिहासकारों के स्वामीभक्त श्वान बनकर पुराणों को दोष देने के स्थान पर प्राचीन सनातनी परंपरा अनुसार भगवान वेदव्यास द्वारा सभी सनातनियों के कल्याण के लिए रचित पुराणों के प्रति आस्था रखनी चाहिए।

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