जन्मेजयशर्मा
जन्मेजयशर्मा

@Sharma9999999

164 Tweets 5 reads Jan 14, 2023
शब्द भी ईशावास्य बृहदारण्यक शब्दों के साथ उपनिषद् शब्द की सन्धि से बने हैं इस का यह अर्थ नहीं निकलता की ईशावास्य और बृहदारण्यक दो उपनिषद् इस का केवल इतना ही अर्थ है कि ईशावास्य बृहदारण्यकादि मन्त्र वेद के शिरोभागरूप वेदान्त या उपनिषत् कहे जाते हैं जैसा की पुरी के
शङ्कराचार्य ने इस चित्र में कहा और शब्दकल्पद्रुम् वाचस्पतयम् तथा शास्त्र में भी यही अर्थ है उपनिषद् का इस से यह सिद्ध नहीं हो जाता की काण्व शाखा तथा अन्य शाखाओं के एक से अधिक उपनिषद् भाग है उपरोक्त शास्त्रीय वचन दर्शन शास्त्र तथा आचार्य के मत का भी खण्डन करना पड़ेगा
जोकि कथमपि सम्भव नहीं है अब लोगों ने काण्ड शाखा के दो ईशावास्योपनिषद् बृहदारण्यकोपनिषद् नाम से दो ग्रन्थ बना दिए इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि काण्व शाखा के दो उपनिषद् है प्रत्येकशाखा का एक ही उपनिषद् भाग है जैसे पुरी शङ्कराचार्य ने कहा की महाभारत में श्रीमद्भगवद्गीता
को श्रीकृष्णगीत कहा गया है तो फिर गीता नाम क्यों पड़ा उपनिषत्सु उपनिषद् शब्द स्त्रीलिङ्ग है इसलिए गीता नाम पड़ा अब लोगों ने महाभारत में जो अमुक अध्याय से अमुक अध्याय में जो श्रीमद्भगवद्गीता कही जाती है महाभारत से निकालकर उसका एक पृथक् से
youtu.be
ग्रन्थ बना दिया तो इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता श्रीमद्भगवद्गीता नाम का कोई ग्रन्थ है क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता के अर्थ से तो विरोध है ही और इस का महाभारत से ही विरोध होगा क्योंकि महाभारत में इस को श्रीकृष्णगीत मात्र कहा गया है और आज भी श्रीमद्भगवद्गीता अर्थात्
महाभारत के अमुक अध्याय से अमुक अध्याय के बीच में जो श्रीकृष्णगीत है यही अर्थ होता है अब प्रश्न उठता है कि फिर भगवान् श्रीशङ्कराचार्य आदि का गीता पर भाष्यग्रन्थ है तो इसका केवल इतना ही तात्पर्य है की भगवान् श्रीशङ्कराचार्य ने महाभारत के जिस जिस भाग का भाष्य लिखा
उस भाग के भाष्य का ग्रन्थ है उस भाग का ग्रन्थ नहीं है इससे उस भाग का ग्रन्थ नहीं सिद्ध हो जाता यह अर्थ उपनिषद् भाष्य का भी समाधान है वैसे ही जिस अद्वितीय प्रत्यगात्मतत्व के बोध से कर्म अकर्म हो जाते हैं उसी के प्रतिपादक होने से ईशा वास्यं आदि मन्त्र वेद के शिरोभागरूप
वेदान्त या उपनिषत् कहे जाते हैं अतः काण्व शाखा में ईशावास्य बृहदारण्यकादि मन्त्र एक ही उपनिषद् भाग के अन्तर्गत आते हैं यही सिद्धान्त अन्यान्य शाखाओं में भी घटित होता है जहाँ काण्व शाखा जैसे एक से अधिक एक शाखा में उपनिषद् होने की बात लोग कहते हैं हर शाखा में
एक ही उपनिषद् भाग है किन्तु मुक्तिकोपनिषद् में ईशावास्य बृहदारण्यक का पृथक् से उल्लेख है इससे यह सिद्ध है की एक शाखा के एक से अधिक उपनिषद् हो सकते हैं परन्तु अभिनवशङ्कर हरिहरानन्दसरस्वती धर्मसम्राट् श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज की कालजई रचना वेदार्थपारिजात जो
आज के काल में वेद के स्वरूप को पूर्णरूप से प्रकट कर देती है उसमें यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है वेदों में जो कथा है वह इतिहास नहीं है किन्तु वह तत् तत् विषय को समझाने केलिए है उस विषय को समझाने केलिए वह कहानी वेदों में है यही वेद में कथा का अभिप्राय है अब
मुक्तिकोपनिषद् की क्या कथा है देखें भगवान् राम श्रीहनुमान् को ब्रह्मविद्या प्राप्त करने केलिए पहले एक फिर 10 32 और अन्त में 108 अष्टोत्तरशत उपनिषद् पढ़ो इस कथा का अभिप्राय केवल भगवान् के अभिमत उपनिषद् अर्थात् ज्ञानकाण्ड के प्रतिपादक जो मन्त्र वेद का शिरोभाग
वेदान्त उपनिषत् कहे जाते हैं उन को बताना है तथा यह गणना पहले तो ऋग्वेदादि वेद तथा शाखा निरपेक्ष है वेद में जहाँ जहाँ भी भगवान् के अभिमत उपनिषद् भाग है उसकी गणना है और जैसे नीचे के चित्र में पुरी शङ्कराचार्य ने ईशा वास्यं आदि मन्त्र कहा केवल उस उपनिषद् भाग की
जिस नामसे अनादि प्रसिद्धि है उसी को कहा समस्त मन्त्रों को नहीं कहा तथा अपौरुषेय मुक्तिकोपनिषद् द्वारा जिस उपनिषद् भाग का जो अनादि नाम सिद्ध है वही लिया है समस्त मन्त्रों का नहीं इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता 108 उपनिषद् ग्रन्थ है पहले कहा जा चुका है किन्तु उपनिषद् का
ऋग्वेदादि वेद तथा ब्राह्मण भाग से पृथक् अस्तित्व नहीं हो सकता तो इसलिए भगवान् ने उनके अभिमत उपनिषद् ऋगादि वेदमें से कहा है यह बताया वेदकी जाति सापेक्ष तथा शाखा निरपेक्ष कैसे ऐसे की प्रत्येक ऋग्वेदादि चारों वेदोंमें भगवान् ने स्वयं के अभिमत उपनिषद् का पृथक् वर्णन
करते हुए अन्त में मृग्वेदगतानां दशसङ्ख्यकानामुपनिषदां शुक्लयजुर्वेद गतानामेकोनविंशतिसङ्ख्यकानामुपनिषदां कृष्णयजुर्वेदगतानां द्वात्रिंशत्सङ्ख्यकानामुपनिषदां
सामवेदगतानां षोडशसङ्ख्यकानामुपनिषदाम्
अथर्ववेदगतानामेकत्रिंशत्संख्याकानामुपनिषदांकहा अर्थात् अष्टोत्तरशत उपनिषद्
10 19 32 16 31 ऋग्वेद शुक्लयजुर्वेद कृष्णयजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद से तत् तत् वेद के अन्तर्गत उपरोक्त भगवान् के अभिमत सङ्ख्या के उपनिषद् अर्थात् यह पहले कहा जा चुका है यहाँ शाखा की कोई चर्चा नहीं है कौनसा उपनिषद् किस शाखा का है मुक्तिकोपनिषद् को ही शब्दकल्पद्रुम् और वाचस्पतयम्
उद्धृत किया गया अब जो प्रश्न था कि मुक्तिकोपनिषद् में ईशावास्य बृहदारण्यक का पृथक् से उल्लेख है तो यह सिद्ध है की
काण्व शाखा के दो उपनिषद् है इससे भी यह सिद्ध नहीं होगा क्योंकि यदि चित्र में दी गई शुक्लयजुर्वेद की गणना शाखा के अनुरूप सङ्ख्यावाचक माने तो इस में ईशावास्य एकवचन में है इस से एक ही ईशावास्य उपनिषद् मानना पड़ेगा दो ईशावास्य उपनिषद् अर्थ नहीं निकलता अतः शुक्लयजुर्वेद् माध्यन्दिन
वेद के शिरोभागरूप वेदान्त या उपनिषत् कहे जाते हैं अर्थात् मुक्तिकोपनिषद् की गणना शाखा अनुरूप सङ्ख्यावाचक गणना नहीं है किन्तु ईशावास्य इस शब्द से उस में वेद में जहाँ भी है ईशावास्य नाम से प्रसिद्ध उपनिषद् है सब उस शब्द के अन्तर्गत आ जाते हैं यदि मुक्तिकोपनिषद् की गणना काण्ड शाखा
अर्थ निकलेगा क्योंकि गणना शाखा निरपेक्ष है यह पहले कहा जा चुका है यदि कहे की सामवेद की गणना के अन्तर्गत केन छान्दोग्यारुणि इसमें केन छाग्दोग्य जोकि एक ही शाखा के तलवकारब्राह्मण के अन्तर्गत आते हैं इससे यह सिद्ध है की उस शाखा के दो उपनिषद् है इससे भी है सिद्ध नहीं होगा क्योंकि
जिस नाम से अनादि प्रसिद्धि है ईशावास्य बृहदारण्यक इत्यादि नाम अष्टोत्तरशत उपनिषद् की गणना तथा पृथक् गणना में दे रखे हैं ईशावास्योपनिषद् बृहदारण्यकोपनिषद् आदि शब्द तो बाद में सन्धि से बनाए गए हैं यह पहले कहा जा चुका है तथा जिस प्रकार शुक्लयजुर्वेद वाजसनेयि माध्यन्दिन शाखा तथा
काण्ड शाखा दोनों के ब्राह्मण का नाम शतपथ ब्राह्मण ही है और अध्याय का भेद है काण्व शाखा में जिस प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद् है लेकिन माध्यन्दिन शाखा में नहीं है इससे यह भी सिद्ध है की आवश्यक नहीं कि हर शुक्लयजुर्वेद वाजसनेयि शाखा का 40वां अध्याय ईशावास्योपनिषद् हो यदि कहे की काण्व
शाखा के 40वें अध्याय जो ईशावास्योपनिषद् है और बृहदारण्यकोपनिषद् के मध्य दूरी है तथा एक मन्त्र भाग के अन्त में है और एक ब्राह्मण भाग के अन्त में है तो सिद्ध है कि काण्व शाखा के दो उपनिषद् है किन्तु इस से भी है सिद्ध नहीं होगा धर्मसम्राट् श्रीकरपात्री महाभाग ने अपने ग्रन्थ
वेद का स्वरूप और प्रामाण्य में यह कहा है की तैत्तिरीय कृष्णयजुर्वेद की 15 शाखाएँ मिश्रित है अर्थात् मन्त्र भाग ब्राह्मण भाग एक दूसरे के मध्य में है इस से तो उन शाखाओं में हर मन्त्र भाग हर ब्राह्मण भाग को यदि पृथक् माना जाए तो फिर उन एक एक शाखा में ही बहुत से मन्त्र भाग और
ब्राह्मण भाग होङ्गे जिसका नाही केवल मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् इस वचन से विरोध होगा अतः यह अशास्त्रीय है तथा ऐसा माना भी नहीं जाता उन शाखाओं में एक मन्त्र भाग एक ब्राह्मण भाग ही माना जाता है वह 15 शाखाएँ आज भी मन्त्रब्राह्मणात्मक है कई लोग कहेङ्गे की यदि उपनिषद् का अर्थ
ग्रन्थ नहीं होता है तो वेद ऋग्वेदादि रामायण महाभारत आदि का भी तो अर्थ ग्रन्थ नहीं होता किन्तु वेद ऋग्वेदादि रामायण महाभारतादि ग्रन्थ है बादरायणाचार्य कृष्णद्वैपायन महर्षि वेदव्यास ने वेद का व्यास अर्थात् विस्तार किया और एक वेद को जाति सापेक्ष ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद 4
भागों में बाटा तथा चार ग्रन्थों का निर्माण किया यह ऋषि कृत विभाजन है ऐसे ही बाद में शाखाओं का विभाग हुआ यह भी ऋषि कृत ग्रन्थ निर्माण है तथा अन्त में मन्त्र भाग ब्राह्मण भाग का भी विभाग हुआ यह भी ऋषि कृत ग्रन्थ निर्माण है किन्तु आज भी ऋग्वेद का अर्थ जो एक वेद था उस वेद में जो
ऋग्वेद नामक भाग था ऋग्वेद का अर्थ वही है उसी भाग को निकालकर ऋग्वेद नामक पृथक् विभाग किया गया और ग्रन्थ निर्माण किया यही अन्य वेदों केलिए समझना चाहिए आज तक किसी ने ऋषि ने आरण्यकः उपनिषद् का पृथक् विभाग नहीं किया और ग्रन्थ निर्माण किया तथा वेद की हर शाखा को मन्त्र ब्राह्मण आरण्यकः
उपनिषद् 4 भागों में विभक्त नहीं किया धर्मसम्राट् श्रीकरपात्री महाभाग ने भी उपनिषद् को ब्राह्मण भाग से पृथक् नहीं किया तब तक जब तक कोई उपनिषद् को ब्राह्मण भाग से पृथक् नहीं कर देता तब तक यह कहना की वेद कि कई शाखाओं के एक से ज्यादा उपनिषद् है अशास्त्रीय है जब कोई कर देगा तब यह मान
लेङ्गे की काण्ड शाखा के 2 उपनिषद् है तथा अन्य शाखाओं के भी एक से ज्यादा उपनिषद् हो सकते हैं किन्तु नाही इसका मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् इस कात्यायन के वचन से विरोध होगा और यदि किया भी जाएगा तो भी हर शाखा का एक ही उपनिषद् भाग का निर्माण हो सकता है इस सूत्र के अनुसार परन्तु
यह करना अशास्त्रीय ही है क्योंकि मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् इस वचन में आरण्यकः भाग उपनिषद् भाग को ब्राह्मण भाग के अन्तर्गत ही माना है पृथक् से उस का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं माना है पूर्वमीमांसा के अनुसार विधायक होने से और महर्षि वेदव्यास ने भी जो किया है वह भी कालक्रम से
मनुष्य की आयु तथा बुद्धि के ह्रास को देखकर किया ताकि मनुष्य वेदों को ग्रहण कर सके यह कोई वेद का दोष नहीं यह मनुष्य कृत दोष है और जब एक वेद को चार वेदों तथा उसके बाद शाखाओं में फिर मन्त्र भाग और ब्राह्मण भाग पृथक् किया गया तो इस के बाद वेद का विभाजन स्वयं वेद का अपमान है वेद
कोई ज्यादा सरल करने की वस्तु नहीं है। अब प्रश्न उठता है कि वाजसनेयि शुक्लयजुर्वेद माध्यन्दिन तथा काण्व शाखा का जो 40वां अध्याय ईशावास्योपनिपद् है वहा मन्त्र भाग में है तो ब्राह्मण भाग में कैसे उपनिषद् हुआ इसका उत्तर यह है की ब्राह्मण भाग क्या है मन्त्र से पृथक् कोई ब्राह्मण भाग
है क्या ऋषयो मन्त्र द्रष्टारः अर्थात् ऋषियों ने मन्त्रों का दर्शन किए तो क्या ब्राह्मण भाग का दर्शन नहीं किया धर्मसम्राट् श्रीकरपात्री महाभाग ने वेदार्थपारिजात में स्थापित किया है कि याज्ञवल्क्य ऋषि को बृहदारण्यक उपनिषद् का दर्शन हुआ इससे यह सिद्ध ब्राह्मण भाग मन्त्र ही है और
प्रमाण देता हूँ वेदार्थपारिजात में श्रीकरपात्रीजी महाराज ने तस्मादत्र ऋचां मन्त्राणां बाहुल्यं ऋचो वा पठितव्या विनियोज्या यस्मिन्‌ वेदे स ऋग्वेदः ऋक् यजुःसामपदैस्तु नियताक्षरपादावसाना ऋङ्मन्त्र गीतिविशिष्टाः साममन्त्रास्तदवशिष्टा यजुर्मन्त्रा एव विज्ञायन्ते न तेषां वेदत्वं
विज्ञायते वेदपदेन तु मन्त्रब्राह्मणसमुदायस्यैव ग्रहणात् ऋग्वेद शब्द से जहाँ ऋचाओ का बाहुल्य है अथवा ऋचाओं का जहाँ विनियोग किया गया है वह ऋग्वेद है इतना ही अर्थ निकलेगा केवल ऋक् यजुःसाम पद से तो नियताक्षर नियतपदवाले ऋङ् मन्त्र गीतिविशिष्ट साममन्त्र इन दोनों से बचे यजुर्मन्त्र ही
ज्ञात होते है इससे यह वेद है यह ज्ञात नहीं होता वेद पद के द्वारा तो मन्त्र ब्राह्मण भाग समुदाय का ही ग्रहण होता है यहाँ पर ऋङ् मन्त्रादि में मन्त्र शब्द ऋग्वेदादि में उपस्थित समग्र मन्त्रों का वाचक है चाहे वह मन्त्र भाग में हो चाहे ब्राह्मण भाग में अर्थात् ऋग्वेद ऋचा का जहाँ
बाहुल्य हो या जहाँ विनियोग हो अर्थात् ऋचा जिस समस्त मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों में है वह ऋग्वेद है इसलिए जो एक मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद था उसमें ऋचा का बाहुल्य या विनियोग चाहे मन्त्र भाग में हो चाहे ब्राह्मण भाग में हो वह ऋग्वेद कहा जाता है उसी को बाद में ग्रन्थरूप दिया गया ऋग्वेद
में ऋक् शब्द वेद पद का विशेषण है जैसे परब्रह्म ऋग्वेद अर्थात् ऋचा वेद अर्थात् मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् से ऋचा जिस वेद अर्थात् मन्त्र ब्राह्मण में व्याप्त है या है वह ऋग्वेद है यही सिद्धान्त अन्य वेदों केलिए भी समझना चाहिए तथा अथर्ववेद ऋक् यजुःसाम मन्त्र ही है अतः अथर्ववेद
अपने आप में त्रयी कहा जाता है वह स्वयं त्रयी है अथर्ववेद को अकेले भी त्रयी कहते हैं इसमें वेदार्थपारिजात प्रमाण है और भी प्रमाण देता हूँ 'छ‍‍‌‍न्दांसि वै देवा वयोनाधाः' इतीदं वाक्यं शतपथब्राह्मणेऽष्टमकाण्डे द्वितीयाध्याये प्रथमप्रपाठके षष्ठब्राह्मणेऽष्टमे मन्त्रे दृश्यते
यहाँ पर धर्मसम्राट् श्रीस्वामी करपात्री महाराज ने मन्त्रे शब्द का प्रयोग किया है आखिर ब्राह्मण में भी है तो मन्त्र ही ब्राह्मण भी मन्त्र ही है जिन मन्त्रों में विधि होने से पूर्वमीमांसा के अनुसार मन्त्र भाग के लक्षण घटित होते हैं वह मन्त्र मन्त्र भाग में आते हैं तथा जिन
मन्त्रों में विधायक होने से पूर्वमीमांसा के अनुसार ब्राह्मण भाग के लक्षण घटित होते हैं वह मन्त्र ब्राह्मण भाग में आते हैं वेदों में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य के गायत्री मन्त्र भिन्न भिन्न है इस में से क्षत्रिय का जो गायत्री मन्त्र है वह ब्राह्मण भाग में आता है जहाँ तक मुझे ज्ञात
है जिस प्रकार पाणिनि अष्टाध्यायी के सूत्र में तनादिकृञ्भ्य उः(३।१।७९) इस सूत्र में तनादि में कृञ् पाठ होने पर भी पुनः कृञ् पद का उपादान उसके वैशिष्ट्य के अवबोधन के लिए स्वीकार किया गया है उसी तरह मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् इसे सूत्र में मन्त्र में ब्राह्मण का पाठ होने पर भी
पुनः ब्राह्मण पद का उपादान उसके वैशिष्ट्य के अवबोधन केलिए स्वीकार किया गया है किन्तु यह सूत्र तो छन्दोब्राह्मणानि च तद्विषयाणि(४।२।६६) इस सूत्र के तात्पर्य को स्पष्ट करने तथा उत्तर पक्ष को स्थापित करने केलिए तनादिकृञ्भ्य उः(३।१।७९) सूत्र को यहाँ लाया गया है तथा
मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् इस सूत्र में मन्त्र शब्द पूर्वमीमांसा के अनुसार मन्त्र भाग का वाचक है तथा ब्राह्मण शब्द पूर्वमीमांसा के अनुसार ब्राह्मण भाग का वाचक है तो पूर्वमीमांसा से इसका विरोध है तो इस सूत्र के तीन अर्थ हो जाएङ्गे प्रथम तो जो मन्त्र होते हुए जिनका वैशिष्ट्य है
उनको ब्राह्मण शब्द से कहा गया है तथा उन मन्त्रों का वैशिष्ट्य बताने केलिए मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् में ब्राह्मण शब्द का पृथक् से उल्लेख किया गया है अब वह वैशिष्ट्य क्या है तो पूर्वमीमांसा की दृष्टि से विधायक होने से वह ब्राह्मण भाग है तथा उस से भिन्न विधि होने से मन्त्र भाग
है और द्वितीय पूर्वमीमांसा के अनुसार जो मन्त्र विधि होने से वह मन्त्र भाग नाम से कहे जाते हैं तथा जो मन्त्र विधायक हैं वह ब्राह्मण भाग नाम से कहे जाते हैं तृतीय जैसे ऋग्वेद अर्थात् ऋचा का जिस में बाहुल्य है या विनियोग है तथा वेद शब्द का अर्थ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् इस
सूत्र में ऋचा शब्द घटित होगा तो जिस ऋचा में मन्त्र भाग के लक्षण पूर्वमीमांसा के अनुसार घटित होङ्गे वह मन्त्र भाग के अन्तर्गत आएगी और जिस ऋचा में ब्राह्मण भाग का लक्षण पूर्वमीमांसा के अनुसार घटित होङ्गे वह ब्राह्मण भाग के अन्तर्गत आएगी इस तृतीय अर्थ में तनादिकृञ्भ्य उः(३।१।७९) इस
पाणिनीय सूत्र का तथा पूर्वमीमांसा का समन्वय हो जाएगा एक प्रकार से यह प्रथम अर्थ का उदाहरण भी है मेरे मत में तो यही अर्थ उचित है अब जो प्रश्न था कि वाजसनेयि शुक्लयजुर्वेद माध्यन्दिन तथा काण्व शाखा का जो 40वाँ अध्याय ईशावास्योपनिषद् है वह मन्त्र भाग में है तो ब्राह्मण भाग में कैसे
उपनिषद् हुआ उस का समाधान यह है कि मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् सूत्र से उपनिषद् भाग का ब्राह्मण भाग से पृथक् अस्तित्व नहीं माना है तथा अन्तर्गत ही आता है इसलिए शुक्लयजुर्वेद वाजसनेयि माध्यन्दिन तथा काण्ड शाखा का 40वाँ अध्याय मन्त्र भाग का होते हुए भी ब्राह्मण भाग के अन्तर्गत ही
आएगा क्योंकि वह उपनिषद् भाग है ब्राह्मण भी आखिर मन्त्र ही है यह पहले कहा जा चुका है जैसे कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीय 15 शाखाएँ आज भी उन की संहिता मन्त्रब्राह्मणात्मक है मिश्रित है दो प्रकार के मिश्रित होते हैं प्रथम मन्त्र भाग ब्राह्मण भाग एक दूसरे के मध्य में होना द्वितीय मन्त्र
भाग ब्राह्मण भाग का एक ही ग्रन्थ में होना यह आगे बताया जाएगा वैसे भी तैत्तिरीय कृष्णयजुर्वेद की 15 शाखाएँ मूलरूप से मिश्रित ही है किन्तु तो भी ऋषि याज्ञवल्क्य ने वाजसनेयि शुक्लयजुर्वेद की शाखाओं का मन्त्र और ब्राह्मण भाग पृथक् कर दिया पृथक् कैसे किया अपौरुषेय वेद को जिस की
आनुपूर्वी कभी परिवर्तित नहीं हुई उसकी शाखाओं का विभाग आनुपूर्वी सापेक्ष हुआ या निरपेक्ष हुआ सापेक्ष हुआ जो ईशावास्योपनिषद् वाजसनेयि माध्यन्दिन तथा काण्व शाखा के मन्त्र भाग में संलग्न है कर्मकाण्ड परकमन्त्र भी उसमें है तथा मुक्तिकोपनिषद् के द्वारा वह उपनिषद् भाग है जिस प्रकार
कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीय 15 शाखाओं की संहिता आज भी मन्त्रब्राह्मणात्मक क्यों है क्योंकि उस में मन्त्र भाग ब्राह्मण भाग एक दूसरे के मध्य है यदि उन्हें पृथक् किया जाए तो उन की आनुपूर्वी परिवर्तित हो जाएगी जोकि अभङ्ग आनुपूर्वी घटित शब्दराशि अपौरुषेय वेद में कथमपि सम्भव नहीं तथा
वाजसनेयि माध्यन्दिन तथा काण्व शाखा में मन्त्र और ब्राह्मण भाग को जो ऋषि याज्ञवल्क्य ने पृथक् किया उस शाखा में मन्त्र और ब्राह्मण भाग का एक ही संहिता में मन्त्र भाग तत्पश्चात ब्राह्मण भाग अनुपूर्वी सापेक्ष थे तथा मन्त्र भाग ब्राह्मण भाग का एक ही ग्रन्थ में होना यही यहँ पर मिश्रण
है और ब्राह्मण भाग पृथक् करने पर भी वह संहिता में ही आता है इसमें वेदार्थपारिजात प्रमाण है धर्मसम्राट् श्रीकरपात्री महाभाग ने वेदार्थपारिजात में यह सिद्धान्त स्थापित किया है यदि फिर भी ऋषि याज्ञवल्क्य शुक्लयजुर्वेद वाजसनेयि माध्यन्दिन तथा काण्व शाखाके 40वें अध्याय को मन्त्र भाग
से पृथक् कर ब्राह्मण भाग के साथ जोड़ देते तो लोगों को उसके उपनिषद् होने का तो ज्ञान होता किन्तु उसके कर्मपरक मन्त्रों के ज्ञान में भ्रम होता सकता था जैसा कि पूर्व पुरी शङ्कराचार्य निरञ्जनदेवतीर्थ ने भी कहा है इसलिए वह मन्त्र भाग होता हुआ भी ब्राह्मण भाग ही है यह बात पहले कही जा
चुकी है क्योंकि वह अपौरुषेय वेद कि वाजसनेयि माध्यन्दिन तथा काण्व शाखा के मन्त्र भाग में ही संलग्न है इसलिए उसे मन्त्र भाग से पृथक् कर ब्राह्मण भाग में जोड़ना उस शाखा के मन्त्र भाग को विखण्डित करना है जोकि अपौरुषेय वेद में कथमपि सम्भव नहीं यदि कहीं वेद में मन्त्र भाग ब्राह्मण भाग
में संलग्न हो तो उसे भी ब्राह्मण भाग से पृथक् करना उस शाखा के ब्राह्मण भाग को विखण्डित करना ही है अतः उन्होंने नहीं किया यदि सापेक्ष ना मानो तो फिर कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीय 15 शाखाओं का मन्त्र भाग ब्राह्मण भाग पृथक् क्यों नहीं किया धर्मसम्राट् श्रीस्वामी करपात्रिमहाराज ने अपने
ग्रन्थ वेद का स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 के वेदशाखाओं का शास्त्रीय विवेक नामक लेख में पृष्ठ सङ्ख्या ६५ में कहाँ है कि अवशिष्ट ८६ संहिताओं को तैत्तिरीया कहते हैं अर्थात् कृष्णयजुर्वेद की समस्त शाखाएँ तैत्तिरीया कहलायीं यही बात पृष्ठ सङ्ख्या ५९ पर इस तरह से लिखी है अतः वे शाखाएँ
‘तैत्तिरीय’ कहलायीं तथा पृष्ठ सङ्ख्या ६१ पर लिखा है कि तैत्तिरीय की पञ्चदश शाखाएँ मिश्रित है तैत्तिरीय कृष्णयजुर्वेद की 86 शाखाओं में से मात्र 15 शाखाएँ मिश्रित है अन्य शाखाओं में मन्त्र और ब्राह्मण भाग पृथक् है या फिर एक ही शाखा में मन्त्र भाग है पश्चात् ब्राह्मण भाग है तो इन
15 शाखाओं में आज भी कई विद्वान् मन्त्र और ब्राह्मण भाग को सरलता से पृथक् विभक्त कर सकते है तो महर्षि वेदव्यास जो प्रचण्ड ज्ञाता तथा सर्वज्ञ थे क्या वह नहीं कर सकते थे जब कि मन्त्र और ब्राह्मण भाग का पृथक् विभाग करने का प्रयोजन ही यही था कि कलियुग में लोग उस का अधिगम्य कर सके
शुक्लयजुर्वेद से भिन्न अन्य वेदों के मन्त्र और ब्राह्मण भाग का विभाग महर्षि वेदव्यास ने ही किया तो यही कहना पड़ेगा कि प्रत्येक अभङ्ग आनुपूर्वी घटित शब्दराशि अपौरुषेय वेद की शाखाओं की संहिताओं का आनुपूर्वी सापेक्ष ही विभाग अर्थात् विस्तार हुआ किन्तु कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीय 15
शाखाओं में मन्त्र भाग ब्राह्मण भाग एक दूसरे के मध्य में होने से उनके पृथक् करने पर उस से शाखा की आनुपूर्वी का परिवर्तन हो जाता जोकि कथमपि सम्भव नहीं तथा वेद की आनुपूर्वी का परिवर्तन करने से अशास्त्रीय भी है अस्तु आनुपुर्वी सापेक्ष पृथक् विभाग की बात को आगे भी वेदार्थपारिजात तथा
वेद का स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 से ओर स्पष्ट किया जाएगा।
यजुर्वेद की दो प्रकार की शाखाएँ है कैसे जैसे आम्र(आम)की जितनी भी शाखाएँ हैं उन समस्त शाखाओं में आम्रशाखत्व के लक्षण समान रूप से घटित होते हैं वैसे ही ऋग्वेद की समस्त शाखाओं में ऋग्वेदत्व के लक्षण समान रूप से घटित होते हैं
ऐसे ही अन्य वेदों के लिए भी समझना चाहिए किन्तु यजुर्वेद की शाखाओं में लक्षण भेद होने से पद्यात्मक तथा गद्यात्मक आदि लक्षण भेद से दो प्रकार की शाखाएँ हैं अर्थात् दो लक्षणों वाली शाखाएँ है जिस में दो भिन्न लक्षण घटित होते है या है यद्यपि शाकल शाखा की दो अनुक्रमणिकाएँ प्राप्त होती
है एक मण्डल क्रम में तथा दूसरी अष्टक क्रम में परन्तु जो अष्टक क्रम में प्राप्त है वह शाकल शाखा है भी या नहीं यह पूर्ण ज्ञात नहीं क्योंकि दोनों की अनुक्रमणिकाओं में मन्त्र भेद है आजकल के वैदिक सिद्धान्त से अनभिज्ञ लोग दोनों को ऋग्वेद बताते हैं किन्तु सत्य तो यह है कि वह कोई दूसरी
शाखा होगी जिस का नाम न ज्ञात होने के कारण आर्य समाजादि पाश्चात्य म्लेच्छों ने उस का नाम भी शाकल शाखा रख दिया अस्तु किन्तु तत्र कृष्णशुक्लभेदेन यजुर्वेदद्वैविध्यम् में धर्मसम्राट् श्रीकरपात्री महाराज ने यजुर्वेद के दो प्रकार बताएँ तो ऐसी बात है आखिर शाखाओं से भिन्न तो यजुर्वेद है
नहीं तथा यजुर्वेद शब्द में समस्त शाखाएँ आ जाती है और समस्त शाखाएँ ही तो यजुर्वेद है अतः शाखाओं के दो प्रकार है का अर्थ यजुर्वेद के दो प्रकार है यही हो जाता है शुक्लयजुर्वेद और कृष्णयजुर्वेद धर्मसम्राट् श्रीकरपात्रिमहाराज ने वेदार्थपारिजात में लिखा है कि वेद में ब्रह्मा और आदित्य
दो प्रकार के सम्प्रदाय धर्मसम्राट् श्रीकरपात्रिमहाराज ने कहा है तो वेद में कहीं अवश्य होगी यह बात। विष्णु ने हयग्रीव को मार के जिस का कि दूसरा नाम शङ्खासुर था, मार कर उस के द्वारा छीने गये वेदों को लाकर ब्रह्मा को सौंप दिया ब्रह्मा च द्वेधा विभज्य तमेकं भागमादित्ये निहितवान्
प्रकार का इतिहास है एक नित्य और दूसरा जब वेद मन्त्र स्वयं इतिहास बनते है जिस का विधान अथर्ववेद के मन्त्र के द्वारा इतिहास पुराण नाम से कर दिया है अर्थात् जो पुराण भागवतादि है और रामायणादि इतिहास है उस में वेद मन्त्र इतिहास बनते हैं पुरी शङ्कराचार्य निश्चलानन्दसरस्वती इसी को अपने
शब्द में दर्शन इतिहास बनता है मन्त्र के स्थान पर दर्शन शब्द का प्रयोग करते हैं तथा कल्याण के एक लेख में धर्मसम्राट् श्रीकरपात्रीजी महाराज ने श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा बताते हुए वामन अवतार की कथा बताई है जहाँ ब्रह्मर्षि शुक्राचार्य इसी बात को ज्ञान अपने को बार-बार दोहराता है
मन्त्र शब्द के स्थान पर ज्ञान शब्द का प्रयोग करते हैं तो धर्मसम्राट् श्रीकरपात्रमहाभाग मन्त्र और पुरी शङ्कराचार्य दर्शन तथा ब्रह्मर्षि शुक्राचार्य ज्ञान शब्द का प्रयोग करते हैं इस में वेदार्थपारिजात प्रमाण है इस इतिहास बनने के सिद्धान्त को वेदार्थपारिजात में स्थापित किया गया
है और पुरी शङ्कराचार्य ने भी कहा है मन्त्र इतिहास बनते हैं तथा कल्याण के जिस लेख का मैंने कहा उस में भी यह तथ्य सिद्ध है ब्रह्मर्षि शुक्राचार्य के दृष्टान्त से तो जो उसी वेद के सिद्धान्त कि वेद के दो सम्प्रदाय है उसका इतिहास बनना मात्र है तो जो ब्रह्मा ने वेद के दो संस्करण बनाकर
एक आदित्य तथा दूसरा स्वयं के द्वारा प्रवर्तन किया यह उस वैदिक श्रुति का सत्य होना मात्र है जो की नित्य होने से अपौरुषेय है इस कथा से आदित्य तथा ब्रह्मा दो सम्प्रदाय से वेद का प्रवर्तन विश्व में हुआ तथा विभज्य जैसे मान लो वृक्ष को विभज्य किया तो फिर वृक्ष शब्द से पूरे वृक्ष का
विवेक नामक लेख में पृष्ठ सङ्ख्या ५९ पर कहा है कि याज्ञवल्क्य ने विचार किया की व्यास ने यजुर्वेद की १५ शाखाओं को मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग का विभाग बिना किये पण्डित रूप से श्रीवैशम्पायन को पढ़ाया है और पृष्ठ सङ्ख्या ६५ पर जिन शाखाओं में व्यास ने मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग का विभाग
नहीं किया था उसमें याज्ञवल्क्य ने उक्त विभाग किया उपरोक्त बातों से यह स्पष्ट है कि वेदव्यास के पास भी शुक्लयजुर्वेद की शाखाएँ थी तथा भगवान् सूर्य के पास भी वेद चारों विभाग सहित था जो बाद में ब्रह्मा की परम्परा से जिस के चार विभाग किए गए थे वह चारों विभाग सहित एक वेद भगवान् सूर्य
के पास था यदि दो विभाग किए होते वेद के तो वेदव्यास के पास शुक्लयजुर्वेद की शाखाएँ कैसे आई तथा भगवान् सूर्य के पास जो वेद की चार जाति के सहित वेद था वह कैसे आया तथा वेद का यदि विभाग कर दिया तो फिर वह वेद नहीं कहला सकता क्योंकि वेद शब्द में सम्पूर्ण वेद आ जाता है वैसे ही ऋग्वेद
कहने पर ऋग्वेद की समस्त शाखाएँ ऋग्वेद एक शब्द में आ गई फिर ऋग्वेद के भाग को ऋग्वेद नहीं कहा जा सकता शाखाओं में ऋग्वेदत्व शब्द शाखाओं की ऋग्वेद जाति बताने केलिए है किन्तु ऋग्वेद शब्द से उस जाति की समस्त वेद शाखाओं का ग्रहण हो जाता है अतः ऋग्वेद का भाग ऋग्वेद नहीं कहला सकता ऐसा ही
जो चार विभाग के पहले एक वेद था उसके विषय में समझना चाहिए तथा यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद के विषय में समझना चाहिए इस में वेदार्थपारिजात प्रमाण है तो विभज्य शब्द का यहाँ अर्थ विभाग ना होकर पृथक् करना है क्योंकि ब्रह्मा ने वेद के दो प्रकार के संस्करण बनाकर पृथक् किए और एक आदित्य
में स्थापित कर दिया और दूसरे का स्वयं ने प्रवर्तन किया ताकि फिर कोई असुर वेद चुरा के ले जाए तो सूर्य के पास जो वेद है उस से फिर वेद प्राप्त हो जाए वस्तुस्थिति तो वैदिक श्रुति का इतिहास बन ही इस इतिहास का मूल है इसलिए प्रसङ्गानुसार यहाँ विभज्य का अर्थ अलग करना है जो कि ब्रह्मा ने
किया वैसे भी किसी भी वस्तु का विभाग किया जाए तो वह पृथक् हो ही जाती है अतः विभज्य शब्द में पृथक् करने का भाव है ही तथा द्वेधा शब्द का प्रयोग किया कारण दो प्रकार के वेद के संस्करण ब्रह्मा ने प्रकाशित किए और पृथक् किए जैसे ब्रह्मा द्वारा प्रवर्तित वेद के संस्करण में शुक्लयजुर्वेद
वेदार्थपारिजात तथा वेद का स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 से तो ऊपरोक्त अर्थ ही निकलता है हिन्दी अनुवाद का अर्थ नहीं निकलता है मन्त्रब्राह्मणयोमिश्रत्वं कृष्णत्वं पार्थक्येनाभिधानं शुक्लत्वम् इस का हिन्दी अनुवाद दिया है मन्त्र और ब्राह्मण भाग का एक ही ग्रन्थ में मिश्रण होने से
कृष्णयजुर्वेद और इन का अलग-अलग ग्रन्थों में विभाग होने से शुक्लयजुर्वेद कहलाता है यहाँ कहा गया है कि मिश्रण का अर्थ मन्त्र और ब्राह्मण का एक ही ग्रन्थ में होना मिश्रण है मन्त्र और ब्राह्मण भाग का एक दूसरे के मध्य मे होने का नाम मिश्रण नहीं है यहाँ पर तथा धर्मसम्राट्
श्रीस्वामी करपात्रमहाभाग ने अपने ग्रन्थ वेद का स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 के वेदशाखाओं का शास्त्रीय विवेक नामक लेख में पृष्ठ सङ्ख्या ६१ पर लिखा है कि कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीय की पञ्चदश शाखाएँ मिश्रित है यहाँ पर मिश्रित का अर्थ मन्त्र ब्राह्मण एक दूसरे के मध्य में मिश्रित
होना है इस से सिद्ध है की वेद की शाखाओं में मन्त्र और ब्राह्मण भाग का विभाजन आनुपूर्वी सापेक्ष हुआ यदि ऐसा नहीं माने तो प्रथम तो वेदान्तपारिजात और वेद का स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 के मिश्रण अर्थ में भेद है उस का समन्वय नहीं हो सकता क्योंकि वेदार्थपारिजात समस्त
कृष्णयजुर्वेद की शाखाओं की बात कर रहा है इस से कृष्णयजुर्वेद की समस्त शाखाओं में जो मन्त्र और ब्राह्मण भाग एक ही ग्रन्थों में है उस की बात हो रही है तथा वेद का स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 में तैत्तिरीय कृष्णयजुर्वेद की जो 15 शाखाएँ एक ही ग्रन्थ में होने पर भी एक दूसरे के मध्य
मिश्रित है उस मिश्रण की बात हो रही है यदि नहीं माने तो वेदार्थपारिजात का ही खण्डन होगा क्योंकि वेद का स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 में लिखा है कि तैत्तिरीय कृष्णयजुर्वेद 86 शाखाओं में से केवल 15 शाखाएँ मिश्रित है तो इस से सिद्ध हुआ कि अन्य शाखाएँ मिश्रित नहीं है अतः
प्रसङ्गानुसार वेदार्थपारिजात में मिश्रण का अर्थ मन्त्र और ब्राह्मण भाग का आनुपूर्वी सापेक्ष एक ही ग्रन्थ में होना ही मिश्रण है यही बात हिन्दी अनुवाद में भी कही गई है तथा यदि नहीं माने तो इसी वेद का स्वरूप और प्रयोग भाग 2 में लिखा है की महर्षि वेदव्यास के पास शुक्लयजुर्वेद था
किन्तु मिश्रित था तो क्या यह मान लिया जाए कि वह पहले कृष्णयजुर्वेद था तथा याज्ञवल्क्य के पश्चात् उस को शुक्लयजुर्वेद नाम प्राप्त हो गया नहीं यह वैदिक सिद्धान्त के विरुद्ध है तथा ऋषि याज्ञवल्क्य का सूर्य से शुक्लयजुर्वेद प्राप्त करना मात्र वैदिक श्रुति का इतिहास बनना है यह भी
इतिहास बनने का विस्तृत विवरण पीछे किया जा चुका है मन्त्रब्राह्मणयोमिश्रत्वं क‌ष्णत्वं पार्थक्येनाभिधानं शुक्लत्वम् इस का हिन्दी अनुवाद दिया है कि मन्त्र और ब्राह्मण भाग का एक ही ग्रन्थ में मिश्रण होने से कृष्णयजुर्वेद और इस का भिन्न भिन्न ग्रन्थों में विभाग होने से
शुक्लयजुर्वेद कहलाता है यह हिन्दी अनुवाद गलत भी हो सकता है जैसा कि तुमने पहले बताया वैसे ही यह भी हो सकता है किन्तु इस हिन्दी अनुवाद में अनुवादक ने मन्त्रब्राह्मणायोमिश्रत्वं इस का अर्थ क्या होता है यह बताएँ ताकि लोग समझ सके जबकि ऊपर उन्होंने धर्मसम्राट् के शब्दों का
पूरा अर्थ नहीं किया तथा वेद का स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 के इसी पृष्ठ सङ्ख्या ६१ में लिखा है कि उन में मन्त्र-संहिता और ब्राह्मण-भाग पृथक्-पृथक् है। तैत्तिरीय की पञ्चदश शाखाएँ मिश्रित है इस से भी यह सिद्ध है कि जो विभाग के पहले जो मन्त्र और ब्राह्मण भाग मिश्रित था
वह आनुपूर्वी सापेक्ष एक ही ग्रन्थ में मन्त्र और ब्राह्मण भाग का होना ही वहाँ मिश्रण है अन्यथा कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीय की 15 शाखाओं का ही मिश्रण क्यों माना जाए उन्हें भी पृथक् किया जा सकता है यह पहले कहा जा चुका है जबकि मुख्य उद्देश्य ही मन्त्र और ब्राह्मण भाग को पृथक्
करना था वैसे भी वेदार्थपारिजात में कृष्णयजुर्वेद और शुक्लयजुर्वेद इन दो प्रकार के यजुर्वेद के जो कारण दिए हैं उस में से एक भी कारण का मन्त्र और ब्राह्मण भाग के मिश्रित से लेना देना नहीं चाहे वह सायणाचार्य का मत हो चरणव्यूह की बात हो या पुराण कि यास्क का निरुक्त हो या
फिर कात्यायन के ग्रन्थ का प्रमाण उन सब में शुक्लयजुर्वेद कृष्णयजुर्वेद का कारण मन्त्र और ब्राह्मण का मिश्रण है भी नहीं धर्मसम्राट् श्रीस्वामी करपात्रमहाभाग ने तो जो सामान्य कृष्णयजुर्वेद और शुक्लयजुर्वेद की जो बात सामान्य रूप से प्रचलित है उस को लिखा है क्योंकि
जैसा कि पहले कहा तैत्तिरीय कृष्णयजुर्वेद की 15 शाखाएँ आज भी मिश्रित है तथा उन की संहिताएँ आज भी मन्त्रब्राह्मणात्मक है इसलिए यह प्रचलित हो गया इस का कोई शास्त्र प्रमाण नहीं है मन्त्र और ब्राह्मण भाग के मिश्रित होने के कारण ही कृष्णयजुर्वेद नाम हैं पृष्ठ सङ्ख्या
५६ पर वेदशाखाओं के शास्त्रीय विवेक नामक लेख में धर्मसम्राट् श्रीकरपात्रिमहाराज ने कहाँ है कि वेदव्यास द्वारा एक ही वेद के 4 विभाग किए है तथा फिर शाखाओं के विभाग किए और पृष्ठ सङ्ख्या ६३ पर लिखा है कि महर्षि वेदव्यास ने वेद के चार भाग तथा फिर शाखाओं के और फिर मन्त्र
और ब्राह्मण भाग के विभाग किए तथा वेदार्थपारिजात के अनुसार शाखाओं के विभाग उन्होंने नहीं उन के शिष्यों ने किए और पृष्ठ सङ्ख्या ५६ और ५८ के अनुसार वेद के चार विभाग कर उन्होंने ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद की बह्वृच नामक ऋक्मन्त्र-संहिता निगद नामक यजुर्मन्त्र-संहिता
छन्दोग नामक साममन्त्र-संहिता तथा अथर्वाङ्गिरसी नामक अथर्व-संहिता निर्माण हुआ शाखाओं का विभाग जो महर्षि वेदव्यास ने ऋग्वेद 21 शाखाओं को 24 शाखाओं में विभाग किया यह बाद में हुआ ऐसे ही अन्य वेदों का मानना चाहिए पृष्ठ सङ्ख्या ६३ और ६४ पर महर्षि वेदव्यास ने वेद के चार विभाग कर
जो बह्वृच-संहिता निगद संहिता छन्दोग संहिता तथा अथर्वाङ्गिरसी संहिता नाम रखा उस में जो वेदव्यास ने ऋग्वेद की 21 शाखाओं को 24 किया वह इन संहिताओं में ही कर दिया इससे शब्दों से प्रतीत होता है कि उपरोक्त तीन घटना काल भेद से भिन्न भिन्न द्वापरयुग की है तथा पृष्ठ सङ्ख्या
६१ पर लिखा है कि ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेद अथर्ववेद इस रूपसे चार जाति के वेद है इससे भी यह सिद्ध हुआ की ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद यह वेद की चार जाति है केवल मन्त्र भाग कि नहीं क्योंकि वेद पद का अर्थ होता है मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् अर्थात् ऋचा का बाहुल्य या
विनियोग किस वेद में है यह जो वेदार्थपारिजात में अर्थ है ऋग्वेद का इसमें ऊपर जो कहा गया है उस के अनुसार ऋचा मन्त्र और ब्राह्मण दोनों की जाति है और दोनों में है ऋचा का केवल मन्त्र में ही विनियुक्त नहीं होती तथा उस का बाहुल्य केवल मन्त्र में नहीं यह पहले के
उत्तरपक्ष में एक और प्रमाण है और इसी के अनुसार जो ऋग्वेदादि की बह्वृचसंहिता निगदसंहिता छन्दोगसंहिता अथर्वाङ्गिरसी संहिता नामक चार सहिताएँ बनाई वह वास्तव में ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद 4 जाति के वेद अर्थात् मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् की शाखाओं का सङ्ग्रह है
जोकि कल्पभेद से अनन्तानन्त वेदों द्वारा प्रतिपादित अनन्तानन्त चारों जातियों के वेदों की शाखाओं की जो अनन्तानन्त सङ्ख्या है इस कल्प में ऋग्वेदादि 4 जातियों के जितनी वेद अर्थात् मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् है जो पहले एक वेद था उस के जाति सापेक्ष वेद की शाखाओं के
चार विभाग कर जो उपरोक्त पर चार संहिताएँ बनाई वही ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद वास्तव में था जिस में तत् तत् जाति के कल्पानुसार समस्त वेद थे जिस का फिर शाखाओं में विभाजन हुआ तथा पृष्ठ सङ्ख्या ५८ पर ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद की बह्वृचसंहिता निगदसंहिता
छन्दोगसंहिता अथर्वाङ्गिरसी संहिता नामक संहिता को ऋक्मन्त्र-संहिता यजुर्मन्त्र-संहिता साममन्त्र-संहिता तथा अथर्व-संहिता कहाँ यहाँ मन्त्र संहिता कहाँ गया है इस का अर्थ यह नहीं कि इस में मन्त्रभाग ही है वेदार्थपारिजात में यह स्थापित किया गया है कि
ब्राह्मण भाग संहिता के अन्तर्गत ही आता है तथा शाखाओं के मन्त्र और ब्राह्मण भाग के विभाग से पहले मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग दोनों संहिता में ही थे तथा मन्त्रसंहिता कहने से भी मन्त्रभाग ब्राह्मणभाग का ग्रहण हो जाता है क्योंकि ब्राह्मण भी मन्त्र ही है यह पहले कहा जा चुका है।
अनन्ता वै वेदाः। इस श्रुति के तीन अर्थ होंगे तथा उन तीनमें से दो अर्थों के और तीन और दो अर्थ होङ्गे तथा जो प्रथम अर्थ है वह सर्वत्र लगेगा प्रथम धर्मसम्राट् श्रीस्वामी करपात्री महाराज के ग्रन्थ वेदका स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 के अनुसार मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार ऋग्वेद की 21 शाखाएँ
यजुर्वेद की 109 शाखाएँ सामवेद की 1000 शाखाएँ तथा अथर्ववेद की 50 शाखाएँ है धर्मसम्राट् श्रीकरपात्रिमहाराज ने वेदार्थपारिजात में लिखा है कि तप तथा अन्तःकरण की पूर्ण शुद्धि से मन्त्रों का दर्शन ऋषि मुनियों को हुआ और होता है एक मन्त्र के दर्शन में ही बहुत काल व्यतीत हो जाता है इस
प्रकार जो वेद की 1180 शाखाएँ मुक्तिकोपनिषद् में है उनके समस्त मन्त्रों के दर्शन करने में ही अनन्त काल लग जाएगा इस से कोई उन समस्त वेद मन्त्रों का दर्शन नहीं कर सकता इसलिए एककस्मिन् विज्ञातो सर्वमिदं विज्ञातं भवति इस उपनिषद् की श्रुति के अनुसार तथा तस्य वाचकः प्रणवः ॐकारस्य
ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता इस विनियोग के अनुसार ॐ अर्थात् प्रणव मन्त्र का दर्शन श्रीब्रह्मा ने किया जिस से उन को समस्त वेद मन्त्रों का ज्ञान हो गया और वह सर्वज्ञ हो गए ॐ मन्त्र के दर्शन से वह अनन्त वेदों के ज्ञाता हो गए जो अनन्त काल में भी सम्भव नहीं दूसरे अर्थ का
प्रथम पृष्ठ सङ्ख्या ६१ पर लिखा है कि मुक्तिकोपनिषद् कि जो चारों वेदों की शाखाओं की गणना है वह सिर्फ जीवग्राह्य वेदों की गणना है वास्तव में वेद अनन्त है क्योंकि नीचे लिखा है कि ईश्वर के अनन्त ज्ञानों में अनुविद्ध अनन्त शब्द समूह ही वेद हैं तो फिर अर्थ यह हुआ कि ऋग्वेदादि की
शाखाओं के जीव तथा देवता के भेद से दो भेद हैं और देवताओं के वेदों की शाखाएँ अनन्त है दूसरे अर्थ का द्वितीय अनन्तानन्त वेदों के अनुसार जिस वेद की चारों जाति के वेदों की शाखा सङ्ख्या के अनुसार जिस कल्प में किसी वेद द्वारा उसमें उक्त जिस सङ्ख्या की शाखाओं का उपदेश कर दिया जाए वह
जीवग्राह्य है जैसे मुक्तिकोपनिषद् के आधार पर कल्प में किया यहाँ भी वेद के अनन्त होने के कारण समस्त वेद अर्थात् मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद का अध्ययन अनन्त काल में भी नहीं हो सकता किन्तु ॐ इस मन्त्र के दर्शन से ब्रह्म को अनन्त वेद प्राप्त हो गया और वह
सर्वज्ञ हो गए मन्त्र दर्शन के विषय में भी यहाँ पर जो प्रथम मत है वही बात समझनी चाहिए दूसरे अर्थ का तृतीय अनन्तानन्त वेदों के अनुसार जीवग्राह्य ऋग्वेदादि जाति के वेदों की शाखाओं का कल्पभेद से किसी वेद के अनुसार चारों जाति के वेदों की कथित शाखाओं की सङ्ख्याओं का अनन्त वेदों की कोई
सी भी शाखाओं का उस वेद के द्वारा कथित चारों वेदों की शाखाओं की सङ्ख्या का उपदेश कर देना जैसे मुक्तिकोपनिषद् में ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद के क्रम से 21 109 1000 50 शाखाओं का अनन्त वेद की शाखाओं में से इस के द्वारा कथित सङ्ख्या के कोईसी भी 21 ऋग्वेद की जाति की शाखाओं का
उपदेश कर देना यही अन्य वेदों केलिए भी समझना चाहिए यहाँ पर भी ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद 4 जाति के वेद की समस्त शाखाओं का अध्ययन अनन्त काल में भी नहीं हो सकता किन्तु ॐ इस मन्त्र के दर्शन से श्रीब्रह्मा को ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद 4 जाति के वेदों की समस्त शाखाओं का
ज्ञान हो गया जिस का वह कल्पभेद से उपदेश कर देते हैं इस में श्रीमद्भागवत महापुराण का प्रथम पद्य प्रमाण है जिस में कहा है कि भगवान् ने ब्रह्मा के हृदय में वेद प्रदान किया।
जन्माद्यस्य यतोन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्
तेने ब्रह्म हृदा य आदि कवये मुह्यन्ति यत्सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि।।
और अनन्तानन्त मन्त्रों के दर्शन के विषय में वही समझना चाहिए जो प्रथम मत में कहा गया है तथा तीसरे अर्थ का प्रथम पृष्ठ सङ्ख्या ६१ और ६२ के अनुसार उपलक्षणमात्र माने तो तो इस के अनुसार
मुक्तिकोपनिषद् में ऋग्वेदादि 4 जाति के वेदों की शाखाओं की गणना है वह मुख्य गणना नहीं क्योंकि वेद अनन्त है अनन्ता वै वेदाः इस श्रुति के अनुसार तो फिर अर्थ यह हुआ कि आनन्तान्त वेद के अनुसार कल्पभेद से किसी वेद के अनुसार ऋग्वेदादि 4 जाति के वेदों की शाखाओं का उपदेश उस में कथित
सङ्ख्या के अनुसार कर देते हैं यहाँ पर भी मन्त्र के दर्शन के विषय में वही समझना चाहिए जो प्रथम मत में है तथा ॐ इस मन्त्र के दर्शन से श्रीब्रह्मा को अनन्त वेद का ज्ञान हो गया यह पहले कहा जा चुका है तीसरे अर्थ का द्वितीय उपलक्षणमात्र मानने पर अनन्त वेद की शाखाओं का कल्पभेद से किसी
वेद के द्वारा उक्त ऋग्वेदादि 4 जाति के वेदों की शाखाओं का उस में उक्त सङ्ख्या के अनुसार ऋग्वेदादि 4 जातियों के अनन्त वेदों की कोई सी भी शाखाओं का उस में उक्त सङ्ख्या के अनुसार उपदेश कर देते हैं दोनों का उदाहरण मुक्तिकोपनिषद् है ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद के क्रम से
मुक्तिकोपनिषद् में उक्त 21 109 1000 50 शाखाओं का उपदेश करना या अनन्त वेदों में से कोई सी भी 21 1000 109 50 ऋग्वेदादि के क्रम से जाति के वेदों का उक्त सङ्ख्या अनुसार शाखाओं का उपदेश करना पृष्ठ सङ्ख्या ५९ के अनुसार याज्ञवल्क्य ने उन 15 शाखाओं में से १५ संहिता और १५ ब्राह्मण
विभागकर अपने शिष्य काण्व माध्यन्दिन आदि को पढ़ाया तो क्या विभाग से पूर्व शाखाओं के नाम नहीं थे इस के दो अर्थ होङ्गे प्रथम तो जो एक वेद था स्वाध्यायोध्येतव्यः इस वेद की श्रुति तथा मनुस्मृति के वचन के अनुसार जिस ब्राह्मण की कल्प मन्वन्तर या सतयुग के आदि में जब भी नई सृष्टि होती है
तो उनके आदि में जिसके कुल की जो शाखा है वह प्रथम पड़ता है स्मरण शक्ति पुष्ट होने से वह सरलता से अपनी शाखा को कण्ठस्थ कर लेता है और जानता है मेरी शाखा कौनसी है इसलिए नाम की आवश्यकता नहीं द्वितीय मत शाखाओं के नाम जब वेद एक था तब से है तथा जो ब्रह्मा के सम्प्रदाय में शुक्लयजुर्वेद
था उसकी शाखाओं के भी नाम थे किन्तु जो माध्यन्दिन काण्वादि नाम है यह सूर्य सम्प्रदाय से प्राप्त जो शुक्लयजुर्वेद है वही शाखा सूर्य सम्प्रदाय से प्राप्त होने से जिसने आदि में उन्हीं शाखाओं को पढ़ा उनके नामों से प्रचलित हो गई स्वाध्यायोध्येतव्यः इस श्रुति के अनुसार जिस की वह शाखाएँ
है वही रही केवल नए नाम से प्रचलित हो गई यह द्वितीय मत ही उचित है शुक्लयजुर्वेद कृष्णयजुर्वेद की समस्त शाखाओं को जो वाजसनेयि तथा तैत्तिरीय कहाँ गया यह उन शाखाओं का अपौरुषेय नाम है क्योंकि इस का श्रुति में वर्णन है उन श्रुतियों का इतिहास बनना मात्र है वाजसनेयि तथा तैत्तिरीय इन
नामों को सत्य करना है यह इतिहास बनने का विस्तृत विवेचन पीछे किया जा चुका है पृष्ठ सङ्ख्या ६३ पर लिखा है कि यह क्रम यह समझना चाहिए प्रथम अविभक्त एक वेद था। व्यास ने उसके ‘ऋग्वेद’ आदि नामों से चार विभाग किये और पैल को ऋग्वेद, वैशम्पायन को यजुर्वेद, जैमिनि को सामवेद, और सुमन्तु को
अथर्ववेद पढ़ाया। उसके अनन्तर शाखाओं का विभाग हुआ यह दूसरा विभाग हुआ। प्रत्येक शाखा में मन्त्रभाग एवं ब्राह्मणभाग पृथक्-पृथक् एकत्रित नहीं किये गए थे। किन्तु प्रथम कुछ मन्त्र, किर ब्राह्मण, फिर मन्त्र, फिर ब्राह्मण, इस तरह मन्त्र-ब्राह्मण मिले-जुले थे इस से यह सिद्ध है की
आनुपूर्वी सापेक्ष शाखाओं का मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग का विभाग नहीं हुआ इस से भी यह सिद्ध नहीं होगा क्योंकि प्रथम तो शब्द का प्रयोग किया है अर्थात् द्वितीय विभाग में नहीं प्रथम विभाग में और नीचे जो शाखाओं का विवरण दिया है यह भी प्रथम चार विभाग का विवरण है तथा जो पृष्ठ सङ्ख्या ६४
पर लिखा है कि वेद के चार विभाग कर ऋग्वेद की 24 संहिताओं का एक ही बह्वृच-संहिता यजुर्वेदी की 101 संहिताओं यहाँ आठ संहिता गलती से छप गया है का निगद सामवेद की छन्दोग तथा अथर्ववेद की अथर्वाङ्गिरसी संहिता उसमें ऋग्वेद की समस्त शाखाएँ एक साथ थी इसीलिए श्रीकरपात्रिमहाराज ने उस
अवस्था केलिए प्रथम तो शब्द का प्रयोग किया और बताएँ कि उसमें मन्त्र-ब्राह्मण मिले-जुले थे क्योंकि जो आनुपूर्वी सापेक्ष ऋग्वेद की समस्त शाखाएँ मन्त्र और ब्राह्मण भाग सहित बह्वृचसंहिता में थी उसमें एक के बाद एक शाखा होने से आनुपूर्वी सापेक्ष मन्त्रभाग फिर ब्राह्मणभाग फिर मन्त्रभाग
किर ब्राह्मण इस प्रकार से मिले-जुले थे यही अर्थ अन्य वेदों केलिए भी समझना चाहिए तथा कुछ शब्द से भी कुछ माने तो एक ओर अर्थ निकलता है वह ये कि बह्वृचसंहिता में प्रथम कुछ आनुपूर्वी सापेक्ष शाखाओं के मन्त्र भाग फिर ब्राह्मण फिर मन्त्र फिर ब्राह्मण इस प्रकार से मिले-जुले थे यदि कुछ
शब्द का कुछ अभिप्राय यहाँ हुआ तो जोकि प्रतीत नहीं होता यदि उपरोक्त अर्थ को नहीं माने तो सर्वप्रथम इसी ग्रन्थ से विरोध होगा क्योंकि इसी ग्रन्थ में लिखा है की कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीय पञ्चदश शाखाएँ मिश्रित है उनके भी मन्त्र और ब्राह्मण भाग पृथक् किए जा सकते हैं यह पहले कहा जा चुका
है पृष्ठ सङ्ख्या ६३ पर लिखा है कि शाखाओं की सङ्ख्या भी व्यास ने अन्य प्रकार से व्यवस्थित की मुक्तिकोपनिषद् में ऋग्वेद की २१ शाखाओं में से कुछ-कुछ मन्त्र और ब्राह्मण के भागों को निकालकर शिष्यबोध सौकयार्थ तीन शाखाएँ और बड़ाकर २४ शाखाओं का सङ्कलन किया। शाखाओं शब्द का प्रयोग किया है
धर्मसम्राट् ने यहाँ पर अर्थात् एक शाखा में से निकालकर नहीं बनाई तीन और शाखाएँ या तो तीन शाखा में से निकाल कर बनाई या अनेक शाखाओं में से निकाल कर बनाई द्वितीय मत को पहले ले तो 21 शाखाओं में से आनुपूर्वी सापेक्ष कुछ मन्त्र और ब्राह्मण भाग निकालकर तीन शाखाएँ और बनाई किन्तु फिर भी
स्वाध्यायोध्येतव्यः इस श्रुति के अनुसार वह मन्त्र और ब्राह्मण भाग जिस भी शाखा में से निकाले गए वह जिस के कुल की शाखा है उसी शाखा के अन्तर्गत यह निकले गए मन्त्र और ब्राह्मण भाग है तथा उसकी शाखा के साथ इसका अध्ययन भी उसको अनिवार्य है क्योंकि उसकी ही शाखा के यह मन्त्र और ब्राह्मण
भाग है इसके बिना उसकी स्वयं के कुल की शाखा का अध्ययन पूर्ण नहीं माना जाएगा क्योंकि महर्षि वेदव्यास ने जो यह तीन शाखा ओर बनाई यह पौरषेय है अपौरुषेय नहीं अर्थात् वेद नहीं यह ईश्वर निर्मित शाखा है अपौरुषेय शाखा नहीं है महर्षि वेदव्यास ने सरलता की दृष्टि से इनकी रचना की किन्तु
फिर भी स्वयं ईश्वर भी वेद के रचयिता नहीं वैदिक मत में अतः यह निर्माण वेद का दोष नहीं भगवान् वेदव्यास का दोष है तथा वैदिक सिद्धान्त में तो जो पूर्व स्थिति थी वही मानी जाएगी भले ही महर्षि वेदव्यास ने अलग से तीन और संहिताओं की रचना कर दी पढ़ने की दृष्टि से ठीक है पर सैद्धान्तिक
दृष्टि से तो ऋग्वेद की 21 शाखाएँ ही रहेगी क्योंकि स्वाध्यायोध्येतव्यः इस श्रुति का विरोध होगा क्योंकि जिन की शाखाओं में से निकली है यह तीन संहिताएँ उसी का भाग यह मानी जाएङ्गी तथा द्वितीय मत ले तो 21 शाखाओं में से कोईसी तीन शाखाओं के आनुपूर्वी सापेक्ष प्रकरण अनुसार कुछ-कुछ
मन्त्र और ब्राह्मण भाग को पृथक् कर 3 और शाखाओं का निर्माण किया किन्तु फिर भी जिस शाखा का निर्माण जिस शाखा से हुआ स्वाध्यायोध्येतव्यः इस श्रुति के अनुसार जो महर्षि वेदव्यास कृत शाखाओं का जिस शाखा में से निर्माण हुआ उसी के कुल कि यह शाखा भी मानी जाएगी तथा उस शाखा को भी पढ़े बिना
उस की स्वयं की शाखा का अध्ययन पूरा नहीं माना जाएगा यही बात अन्य दो वेदव्यास निर्मित शाखाओं के विषय में समझनी चाहिए तथा यह भी महर्षि वेदव्यास कृत् निर्माण है वेद का दोष नहीं जो पहले वेदव्यास के तीन शाखा निर्माण के विषय में जो कहा वही यहा भी माना जाएगा यही मत उचित है पृष्ठ सङ्ख्या
६३ में लिखा है यजुर्वेद की १०९ शाखाओं में से ८ शाखाओं को अवशिष्ट शाखाओं में ही प्रकरण के अनुसार मिला दिया शाखाओं में शब्द का प्रयोग किया है यहाँ पर धर्मसम्राट् ने अर्थात् 8 शाखाओं को एक शाखा में नहीं जोड़ा किन्तु 8 अवशिष्ट शाखाओं में जोड़ा या 101 शाखाओं में 8 शाखाओं को जोड़ दिया
द्वितीय मत के अनुसार आनुपूर्वी सापेक्ष 8 शाखाओं को प्रकरणानुसार या तो परिशिष्ट या खेल भाग के रूप में जोड़ दिया या मन्त्र और ब्राह्मण भाग में सीधे जोड़ दिया प्रकरणानुसार प्रथम मत के अनुसार किसी 8 शाखाओं में जोड़ा प्रथम मत को देखते हैं किन्ही 8 शाखाओं में आनुपूर्वी सापेक्ष 8 शाखाओं
को प्रकरणानुसार उन्हें शाखाओं के मन्त्र और ब्राह्मण भाग में खिल भाग परिशिष्ट के रूप में या मन्त्र और ब्राह्मण भाग को सीधे मन्त्र और ब्राह्मण भाग में आनुपूर्वी सापेक्ष प्रकरणानुसार जोड़ दिया दोनों मत में यहाँ भी स्वाध्यायोध्येतव्यः के अनुसार वह 8 शाखाएँ जिन ब्राह्मणों के कुल की
शाखाएँ थी उन की ही शाखाएँ मानी जाएगी तथा प्रथम उन शाखाओं का जो मिला दी गई है पड़ने पर ही उस की स्वयं की शाखा का अध्ययन पूर्ण माना जाएगा उस के बाद दूसरी शाखाओं का और वह शाखा जिस की थी उसी की रहेगी तथा महर्षि वेदव्यास ने जो यह किया यह भी पौरूषेय है तथा भगवान् का दोष है वेद का दोष
नहीं वैदिक सिद्धान्त में तो वह 8 शाखाएँ सर्वदा पृथक् मानी जाएगी अपौरुषेय होने से तथा स्वाध्यायोध्येतव्यः श्रुति के अनुसार पृष्ठ सङ्ख्या ६३ पर लिखा है कि सामवेद की सहस्र शाखाएँ है उन्हें उतना ही रखा, क्योंकि साम अक्षररूप नहीं, केवल गान-रूप ही है इससे कई लोग सिद्ध करना चाहते हैं
की सामवेद की सहस्र शाखाओं की सहस्र संहिता नहीं है इस से भी यह सिद्ध नहीं होगा क्योंकि आगे इसी पृष्ठ पर इसी के आगे लिखा है की केवल साम मन्त्रों से पृथक् ब्राह्मण को भिन्न कर दिया इससे यह सिद्ध की शाखाओं की सहस्र संहिताएँ है वैसे भी साम भले ही गान रूप हो किन्तु आखिर गान भी तो
अक्षरों का ही होता है सा रे गा मा आदि भी अक्षर ही है तथा वाद्ययन्त्र का जो बिना अक्षरों के होता है जो मात्र अक्षय विहीन ध्वनि है और सामवेद की संहिता है भी अक्षरों में अतः जो कहते हैं कि शाखाओं की सहस्र संहिता नहीं है वह वैदिक सिद्धान्त से बिल्कुल अपरिचित है ना ही श्रीकरपात्रीजी
ने निषेध किया है इसका यहाँ पर अतः उन का नाम व्यर्थ न ले पृष्ठ सङ्ख्या ६३ पर लिखा है कि अथर्ववेद की ५० शाखाओं में प्रकरणानुसार अन्योन्य योजनाकर बारह शाखाओं के रूप में सङ्कलित किया आनुपूर्वी सापेक्ष शाखाओं को प्रकरणानुसार जोड़कर शाखाओं के मूल नाम वाली 12 शाखाओं को सङ्कलित किया यहा
भी स्वाध्यायोध्येतव्यः इस श्रुति के अनुसार जिसकी जो मूल रूप से कुल की शाखा थी वही मानी जाएगी और उन्हीं शाखाओं को प्रथम पढ़ने से उस की स्वयं की शाखा का अध्ययन पूर्ण माना जाएगा तथा जिन शाखाओं में जोड़ा वह जिस के कुल की है वह तो वैसे भी प्रथम अपनी ही शाखा का अध्ययन कर रहा है यही बात
अन्य वेदों के शाखा निर्माण की भी समझनी चाहिए तथा यह भी पौरूषेय है और महर्षि वेदव्यास के शाखाओं निर्माण के विषय में जो ऊपर कहा है वह यहाँ भी लगेगा
शाकल शाखायाः उपनिषद्द्वयं संहितोपनिषद् ऐतरेयोपनिषद् मतखण्डनम्। वेद का स्वरूप और प्रामाण्य भाग 2 के पृष्ठ सङ्ख्या ६७ पर धर्मसम्राट्
श्रीकरपात्री महाराज ने लिखा है कि ऐतरेयब्राह्मण आश्वलायन शाखा का है ऐतरेय आरण्यकः ऐतरेय उपनिषद् उसी के अन्तर्गत आते हैं तथा संहितोपनिषद् क्या है कौनसी शाखा की है इस का पूरा परिचय देना पड़ेगा करपात्री महाराज ने बोला की शाकल शाखा का ब्राह्मण लुप्त है अधिकतर उपनिषद् ब्राह्मण भाग के
अन्तर्गत आती है तथा सैद्धान्तिक रूप से मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् सूत्र के अनुसार यह तथ्य तो सिद्ध है ही कि उपनिषद् भाग ब्राह्मण भाग के अन्तर्गत ही है यह पहले कहा जा चुका है तो यह कहना कि शाकल शाखा के दो उपनिषद् है ऐतरेयोपनिषद् संहितोपनिषद् यह वही कह सकता है जिस को औपनिषद
सिद्धान्त का कुछ भी ज्ञान नहीं है।
कौथुमी शाखायाः अष्ट सङ्ख्याकाः ब्राह्मणमतखण्डनम्।
कौथुमी शाखा के आठ ब्राह्मण है पृष्ठ सङ्ख्या ६८ पर श्रीकरपात्री महाराज ने लिखा है कि सामवेद के ताण्ड्य, पञ्चविंश, षड्विंश, छान्दोग्य, आर्ष, वंश, सामविधान, देवताध्याय यह आठ ब्राह्मण उपलब्ध है अन्य
लुप्त ही हो गए हैं इसमें भी श्रीकरपात्री महाराज ने यह लिखा है कि सामवेद के 8 ब्राह्मण शेष है न की कौथुमी शाखा के आठ ब्राह्मण तथा किसी एक शाखा के आठ ब्राह्मण इससे भी इस बात का खण्डन हो जाता है की कौथुमी शाखा के आठ ब्राह्मण नहीं है जिस ने यह बात कही है उसने यह कहाँ से लिया क्योंकि
सायणाचार्य के उपलब्ध 8 ब्राह्मण पर भाष्य है इसलिए उस ने यह कह दिया किन्तु उसको नहीं ज्ञात कि सायणाचार्य ने चारों वेदों पर भाष्य नहीं लिखा वेद की शाखाओं पर भाष्य लिखा उसमें भी केवल वाजसनेयि शुक्लयजुर्वेद काण्व शाखा पर पूरा भाष्य लिखा अर्थात् उस के मन्त्र और ब्राह्मण भाग दोनों पर
भाष्य लिखा और तैतरीय कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीय शाखा पर पूरा भाष्य लिखा अर्थात् उस के मन्त्र और ब्राह्मण भाग दोनों पर भाष्य लिखा यहाँ दो बार तैत्तिरीय शब्द का क्यों प्रयोग किया क्योंकि यह पहले कहा जा चुका है की कृष्णयजुर्वेद की समस्त शाखाओं को तैत्तिरीया कहते हैं तो फिर इस शाखा का
जिस के कुल की यह शाखा होगी उस ब्राह्मण ने सर्वप्रथम अध्ययन किया होगा कल्प मन्वन्तर तथा सतयुग के आदि में तो उस ऋषि का नाम अपने आप में तैत्तिरीय होगा इसलिए इस शाखा का स्वयं का नाम तैत्तिरीय पड़ गया ऋग्वेद की शाकल शाखा के मन्त्र भाग पर भाष्य लिखा और आश्वलायन शाखा के ब्राह्मण भाग
ऐतरेयब्राह्मण पर भाष्य लिखा सामवेद की जैमिनी कौथुमी राणायनी इन में से किसी एक शाखा के मन्त्र भाग पर भाष्य लिखा और चित्र में उक्त 8 ब्राह्मणों पर तथा जैसा कि पृष्ठ सङ्ख्या ६८ पर लिखा है कि राणायनी शाखा का ब्राह्मण लुप्त है तथा यहाँ पर जो 8 ब्राह्मण उपलब्ध है वह किस शाखा के हैं यह
धर्मसम्राट् श्रीकरपात्रमहाभाग ने नहीं लिखा है जबकि यहाँ पर बताया ही एक-एक शाखा के बारे में जा रहा है इस से भी इस बात का खण्डन हो जाता है कि कौथुमी शाखा के 8 ब्राह्मण हैं यदि होते तो करपात्री महाराज सरलता से लिख देते उन का नाम तथा अथर्ववेद की पैप्पलाद या शौनक शाखा के मन्त्र
भाग पर भाष्य लिखा
कौथुमी शाखायाः उपनिषद्त्रयं आर्षेय छान्दोग्य केन च मतखण्डनम्। कौथुमी शाखा के आर्षेय छान्दोग्य केन तीन उपनिषद् है प्रथम तो आर्षेय नाम का उपरोक्त ब्राह्मण है उपनिषद् नहीं यदि है तो पूरा विवरण देना पड़ेगा तथा छान्दोग्य और केन उपनिषद् तलवकारब्राह्मण के अन्तर्गत आता
है जो कि जहाँ तक मुझे ज्ञात है जैमिनी शाखा का है तथा उपरोक्त पृष्ठ सङ्ख्या पर कथित आठ ब्राह्मणों में से यह ब्राह्मण नहीं है इस से भी इस का खण्डन हो जाता है कि कौथुमी शाखा के तीन उपनिषद् हैं अस्तु इति औपनिषदः सिद्धान्त तथा वेदभाग विमर्शः शाखामीमांसा च।

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