गाँधी जी की “Expensive Poverty"
Expensive Poverty इसका मतलब होता है वो गरीबी जो आपको बहुत महँगे भाव में पड़े अर्थात जब गरीब दिखने के लिए आपको बहुत सारा खर्चा करना पड़ता है। गांधीजी की गरीबी कुछ ऐसी ही थी
Expensive Poverty इसका मतलब होता है वो गरीबी जो आपको बहुत महँगे भाव में पड़े अर्थात जब गरीब दिखने के लिए आपको बहुत सारा खर्चा करना पड़ता है। गांधीजी की गरीबी कुछ ऐसी ही थी
एक बार सरोजनी नायडू ने उनको मज़ाक में कहा भी था कि “आप को गरीब रखना हमें बहुत महंगा पड़ता है !!”
ऐसा क्यों ?
गांधी जी जब भी तीसरे दर्जे में रेल सफर करते थे तो वह सामान्य तीसरा दर्जा नहीं होता था।
ऐसा क्यों ?
गांधी जी जब भी तीसरे दर्जे में रेल सफर करते थे तो वह सामान्य तीसरा दर्जा नहीं होता था।
गाँधी जी जब भी रेल यात्रा करते थे तो उनको विशेष ट्रेन दी जाती थी जिसमें कुल 3 डिब्बे होते थे
जो केवल गांधी जी और उनके साथियों के लिए होते थे, क्योंकि हर स्टेशन पर लोग उनसे मिलने आते थे।
इस सब का खर्चा बाद में गांधीजी के ट्रस्ट की ओर से अंग्रेज सरकार को दे दिया जाता था।
जो केवल गांधी जी और उनके साथियों के लिए होते थे, क्योंकि हर स्टेशन पर लोग उनसे मिलने आते थे।
इस सब का खर्चा बाद में गांधीजी के ट्रस्ट की ओर से अंग्रेज सरकार को दे दिया जाता था।
इसीलिए एक बार मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था की
“जितने पैसो में मैं प्रथम श्रेणी यात्रा करता हूँ उस से कई गुना में गांधीजी तृतीय श्रेणी की यात्रा करते हैं।”
गांधीजी ने प्रण लिया था कि वे केवल बकरी का दूध पिएंगे। बकरी का दूध आज भी महंगा मिलता है, और तब भी महंगा ही था
“जितने पैसो में मैं प्रथम श्रेणी यात्रा करता हूँ उस से कई गुना में गांधीजी तृतीय श्रेणी की यात्रा करते हैं।”
गांधीजी ने प्रण लिया था कि वे केवल बकरी का दूध पिएंगे। बकरी का दूध आज भी महंगा मिलता है, और तब भी महंगा ही था
अपने आश्रम में तो बकरी पाल सकते थे, पर गांधी जी को देश-विदेश की बहुत यात्रायें करनी होती थी। ज़रूरी नही था की हर जगह बकरी का दूध आसानी से मिलता ही हो।
इस बात का वर्णन स्वयं गांधीजी की पुस्तकों में है, कैसे लंदन में बकरी का दूध ढूंढा जाता था, महंगे दामों में खरीदा जाता था
इस बात का वर्णन स्वयं गांधीजी की पुस्तकों में है, कैसे लंदन में बकरी का दूध ढूंढा जाता था, महंगे दामों में खरीदा जाता था
क्योंकि गांधी जी गरीब थे, इसलिए वो सिर्फ बकरी का दूध ही पीते थे
ये बात अलग है कि खुशवंत सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि
गांधी जी ने दूध के लिए जो बकरियां पाली थी उनको नित्य साबुन से नहलाया जाता था, उनको प्रोटीन खिलाया जाता था उस समय में उन पर 20 रुपये का खर्च प्रतिदिन होता था
ये बात अलग है कि खुशवंत सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि
गांधी जी ने दूध के लिए जो बकरियां पाली थी उनको नित्य साबुन से नहलाया जाता था, उनको प्रोटीन खिलाया जाता था उस समय में उन पर 20 रुपये का खर्च प्रतिदिन होता था
आज से 80- 90 साल पहले 20 रुपये मतलब आज के हज़ारों रुपये
बाकी खर्च का तो ऐसा है कि गांधीजी अपने साथ एक दानपात्र रखते थे जिसमें वह सभी से कुछ न कुछ धनराशि डालने का अनुरोध करते थे।
इसके अलावा कई उद्योगपति उनके मित्र उनको चंदा देते थे।
बाकी खर्च का तो ऐसा है कि गांधीजी अपने साथ एक दानपात्र रखते थे जिसमें वह सभी से कुछ न कुछ धनराशि डालने का अनुरोध करते थे।
इसके अलावा कई उद्योगपति उनके मित्र उनको चंदा देते थे।
उनका एक न्यास (ट्रस्ट) था जो गांधी के नाम पर चंदा एकत्र करता था।
उनके 75 वें जन्मदिन पर 75 लाख रुपए का चंदा जमा करने का लक्ष्य था, पर एक करोड़ से ज्यादा जमा हुए।
सोने के भाव के हिसाब से तुलना करें तो आज के 650 करोड़ रुपये हुए।
उनके 75 वें जन्मदिन पर 75 लाख रुपए का चंदा जमा करने का लक्ष्य था, पर एक करोड़ से ज्यादा जमा हुए।
सोने के भाव के हिसाब से तुलना करें तो आज के 650 करोड़ रुपये हुए।
इसका मतलब गांधी उतने गरीब भी नहीं थे, जितना हमको घुट्टी पिला पिलाकर रटाया गया है
credit- योगी 2.0 (fb)
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