सनातनी हिन्दू 100% Follow Back
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@Modified_Hindu8

13 Tweets 24 reads Aug 20, 2022
इस पोस्ट के बाद आप कहेंगे कि बदला लो तो ऐसे लो वरना मत लो, जब हिन्दुओं को क्रोध आता है तो ना बसें जलती हैं ना ही देश विरोधी नारे लगते हैं, बस ज्वालामुखी फटता है और उसका लावा सबकुछ जला डालता है। जब हिन्दू प्रतिशोध लेता है तो क्या होता है? एक झांकी देखिये।
बात 1761 की है, (1/11)
पानीपत का युद्ध समाप्त हो चुका था, एक लाख मराठे मारे गए थे। इस युद्ध में सबसे ज्यादा नुकसान पेशवा वंश का हुआ था क्योंकि उसके उत्तराधिकारी विश्वास राव वीरगति को प्राप्त हुए थे। मगर एक वंश और था जिसने अपने 4 हीरे खो दिए थे, ये थे सिंधिया। पानीपत के युद्ध में सिंधिया परिवार (2/11)
के 5 लोग लड़े थे जिसमें से 4 शहीद हुए, बस एक बच गए महादजी सिंधिया।
युद्ध में महादजी सिंधिया का पैर कट गया था और वे 2 साल तक चल फिर नहीं पाए। महादजी के भाइयो को बेरहमी से मारा गया था।
उत्तर भारत में अफगानी पठानों का भारी प्रभाव था। इनके सरदार नजीब खान ने ही अब्दाली को (3/11)
बुलवाया था और इन सभी पठानों ने इस्लाम के नाम पर अब्दाली को समर्थन दिया था तथा भारत से गद्दारी की थी। इसलिए महादजी ने प्रण लिया कि भारतभूमि पर अब कोई अफगान जिंदा नहीं बचेगा।
1766 में महादजी सिंधिया स्वस्थ होकर पुणे आये, सिंहासन पर बैठे पेशवा माधवराव के सामने अपनी तलवार (4/11)
निकाल कर रख दी और कहा आप बस इसे चलाने का आदेश दें, मैं अफगानों के सिर आपके कदमो में रख दूंगा। पेशवा ने उनकी छिपी प्रतिभा को जान लिया, उन्हें अपना सेनापति और ग्वालियर का शासक बनाया।
फिर तो क्या था 1767 में महादजी सिंधिया ने यमुना पार कर के मराठा साम्राज्य का विस्तार (5/11)
शुरू किया। 1771 में उन्होंने फिर से दिल्ली में लाल किले पर भगवा फहरा दिया। दिल्ली में महादजी ने अपनी तलवार हवा में लहरा दी, जिसका सीधा अर्थ था कि जहाँ जो अफगान दिखे उसे मारो। 1766 से ही पठानों की मौत का सिलसिला शुरू हुआ और 1773 तक जारी रहा।
मराठों ने चुनचुनकर पानीपत (6/11)
का बदला लिया और 5 लाख पठानों का कत्लेआम कर दिया। नजीब खां की किस्मत अच्छी थी कि वो पहले ही मर गया मगर उसका बेटा दर बदर ठोकर खाता रहा। मराठों का खौफ इतना था कि पठानों को कहीं शरण भी नहीं मिली।
इसके बाद मराठो ने रुहेलखंड पर हमला किया, हरिद्वार में पठानों ने मंदिर तोड़कर (7/11)
मस्जिदें बना दी थीं। मराठो ने फिर से मंदिरों को खड़ा कर दिया। यहाँ 1 लाख पठानों को और मारा गया। पठानों की मौत का समाचार अब्दाली को मिल गया था मगर इस बार वो इन्हें बचाने नहीं आया। पठानों में भागदौड़ मच रही थी। कुछ नेपाल भाग गए तो कुछ सिखों के क्षेत्र में।
महादजी ने सिखों (8/11)
को भी पत्र लिखा और पठानों को मराठो के हवाले करने को कहा। एक हिन्दू दूसरे हिन्दू से ना लड़े इसलिए सिखों ने नवरात्रि के समय कई पठान मराठो को सौप दिए। मराठो ने इन सबके सिर काटकर तुलजा भवानी को बलि चढ़ाई।
अंततः एक समय ऐसा आया कि अफगान भारत में बचे ही नहीं। इतिहास में पहली (9/11)
बार हिन्दुओं ने क्रोध किया था, ऐसा सर्वनाश किया कि पूरी कौम ही नक्शे से मिट गई थी। आज भी अगर आप उत्तर भारत में जाएंगे तो आपको अफरीदी और पठान मुट्ठी भर भी शायद ही मिले। जबकि इतिहास में उनकी यहाँ पर बस्ती हुआ करती थी।
ये होता है भारतीयों का गुस्सा। हिन्दू बहुत सहिष्णु समाज (10/11)
है उसे सहिष्णु बनाये रखें, जिस दिन सिर फिरा, रोहिल्लो की तरह अस्तित्व मिट जाएगा और फिर नरक में बोलते रहना "इंडिया इज एन इन्टॉलरेंट नेशन।"
#साभार
(11/11)
🙏🙏

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