किन्तु नारदजी ! इस चतुर्थी में रात्रि समय चन्द्रमा का दर्शन न करे। क्योंकि उस दिन चन्द्र-दर्शन से मिथ्या अभियोग लग जाता है तथा अन्य अनिष्टों की भी सम्भावना रहती है। यदि भूल से चन्द्रमा का दर्शन हो जाये तो उसके दोष निवारणार्थ भगवान् गणेश्वर का चिन्तन करे।
निम्न श्लोक का पाठ चन्द्र-दर्शन के दोष निवारण में बहुत महत्त्वपूर्ण है
सिंहप्रसेनमधीत् सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥ हे नारदजी ! अब आश्विन मास की चतुर्थी के व्रत का फल कहता हूँ ।
सिंहप्रसेनमधीत् सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥ हे नारदजी ! अब आश्विन मास की चतुर्थी के व्रत का फल कहता हूँ ।
उस दिन भगवान् कपिर्दीश विनायक का षोड़शोपचार से पूजन करे तो सर्वप्राप्ति कराता है। कार्तिक मास की चतुर्थी करका चतुर्थी या 'करवा चौथ' कहलाती है। यह व्रत प्रायः महिलाएँ करती हैं। उन्हें शुद्ध जल से स्नान कर नवीन वस्त्र धारण करने चाहिए।
तदुपरान्त प्रसन्नचित्त से गणपति का पूजन करे और चौदह थालियों में स्वादिष्ट पकवान ब्राह्मणों को दे हे मुने ! सामर्थ्य के अनुसार ही दान करना चाहिए। कम देने की शक्ति हो तो चौदह स्थानों पर कुछ दे कुछ विद्वान् दस स्थानों पर देने का विधान बताते हैं।
इस प्रकार का दान ब्राह्मणों को अथवा गुरुजनों को या बड़ी-बूढ़ी महिलाओं को भी दे सकते हैं। रात्रि में चन्द्रमा के दर्शन कर विधिपूर्वक अर्घ्य देने के पश्चात् स्वयं भोजन करे। यह व्रत प्रतिवर्ष बारह या सोलह वर्ष तक निरन्तर करना चाहिए।
फिर उसका विधिवत् उद्यापन कार्य सम्पन्न करना उचित है। बाद में भी यदि पुनः आरम्भ करना चाहो तो कर सकते हैं।
मार्गशीर्ष मास की चतुर्थी 'वर व्रत' का आरम्भ किया जाता है। यह व्रत चार वर्ष तक निरन्तर करना चाहिए। इसमें प्रत्येक चतुर्थी को व्रत करने का विधान है।
मार्गशीर्ष मास की चतुर्थी 'वर व्रत' का आरम्भ किया जाता है। यह व्रत चार वर्ष तक निरन्तर करना चाहिए। इसमें प्रत्येक चतुर्थी को व्रत करने का विधान है।
उन दिन प्रथम वर्ष श्रीगणेशजी का पूजन कर एक बार दिन में ही भोजन करे। दूसरे वर्ष दिन में भोजन न कर रात्रि में ही भोजन करना चाहिए। तीसरे वर्ष प्रत्येक चतुर्थी बिना माँगे, बिना प्रयास किये जो कुछ भी मिल जाये वही एक बार खा ले।
चौथे वर्ष चतुर्थी में पूरे दिन रात्रि उपवास करे। इस प्रकार चार वर्ष निरन्तर व्रत करने के पश्चात् व्रत-स्नान करने का विधान है।
महर्षि को मौन देखकर नारदजी ने पूछा- 'प्रभो ! व्रत-स्नान की विधि भी बताने की कृपा कीजिये।' यह सुनकर महर्षि बोले- 'नारदजी वह भी कहता हूँ, सुनो !
महर्षि को मौन देखकर नारदजी ने पूछा- 'प्रभो ! व्रत-स्नान की विधि भी बताने की कृपा कीजिये।' यह सुनकर महर्षि बोले- 'नारदजी वह भी कहता हूँ, सुनो !
यदि सामर्थ्य हो तो उस दिन के लिए गणेशजी की स्वर्ण प्रतिमा बनवावे। यदि यह सम्भव न हो तो किसी काष्ठादि पवित्र पट पर हरिद्रा अथवा चन्दन से गणपति की प्रतिमा आलेखन करे। फिर धरती को लेपकर उसपर चौक पूरें और कलश स्थापित करे।
उस कलश में अक्षत और पुष्प डालकर उसे दो लाल वस्त्रों में ढककर गणेशजी की वह प्रतिमा स्थापित कर दे, तदुपरान्त गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप आदि के द्वारा विधिपूर्वक पूजन करके मोदकों का भोग लगाकर आचमन, ताम्बूल, पुष्पमाला आदि समर्पित करे ।
रात्रि के समय गायन, भजन, कीर्तन आदि करते हुए रात्रि में जागरण करे । फिर प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर शास्त्रोक्त विधि से सुगन्धित द्रव्यों के द्वारा हवन करना चाहिए।
हे मुने! गण, गणाधिप, ब्रह्मा, यम, वरुण, सोम, सूर्य, हुताशन, गन्धमादि और परमेष्ठी, इन सोलह नामों से आहुतियाँ देनी चाहिए। प्रत्येक नाम के प्रारम्भ में ओंकार और अन्त में चतुर्थी विभक्ति के साथ 'नमः' लगाकर प्रत्येक नाम से एक-एक आहुति दे ।
तदुपरान्त 'वक्रतुण्डाय हुम्' मन्त्र के साथ १०८ आहुतियाँ देकर शेष हव्य की पूर्णाहुति करे। फिर दिक्पालों को पूजन कर चौबीस ब्राह्मणों को केवल मोदक और खीर से भोजन कराकर दक्षिणा दे । यदि सामर्थ्य हो तो पुरोहित को बछड़े वाली दुग्धवती नीरोग गाय का दक्षिणा सहित दान करे ।
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