Manoj Singh™
Manoj Singh™

@ManojSDabas

16 Tweets 6 reads Sep 21, 2022
लम्पी/गुमड़ा रोग कारण, लक्षण व निवारण:-
गुमड़ा रोग मुख्यतः खून चूसने वाले जीवों से गौवंश में फैलता है, भैंस आदि में यह अभी तक बहुत कम देखने को मिला है अतः गौपालक निम्न बातों का विशेष ध्यान रखें👇
गायों को बांधने के स्थान पर सफाई का विशेष ध्यान रखें। #lumpy_virus
गौठान अगर कच्चा है तो रेत या मिट्टी में खारा चूना पाउडर व राख का छिड़काव कर उसे वहां अच्छे से मिला दें। यह करने से जमीन में रहने वाले जीव भाग जायेंगे तथा दूसरी जगह से भूंड, घू घू, चीचड़ व कलील आदि भी वहां प्रवेश नहीं करेंगे। मच्छर व मक्खी आदि भी ठान पर नहीं बैठ पायेंगे।
मच्छर व मक्खियों को भगाने के लिए गौठान में कड़वे धूएँ की धूमणी करते रहें। इसके लिए सूखा गोबर, नीम के पत्ते, आजवाइन, गिलोय व सूखे तुम्बे आदि का धूँआ करते रहे। धूँआ करने के लिए प्लास्टिक, रबड़ आदि ना जलायें क्योंकि इनका धूँआ जहरीला होता है।
कपूर आदि से गोबर को सुलगाकर बाद में उपरोक्त पदार्थ डालने हैं।आप मच्छर दानी भी लगा सकते हैं। पक्के फर्श वाले फर्श को खारे चूने के पानी से धो कर राख का छिड़काव कर सकते हैं। ईंटों से बने फर्श में ईंटों के बीच की दरार चीचड़ों के प्रजनन व सुरक्षा के लिए उपयोगी होते हैं।
अतः दरार ना रहने दें। वैसे गौवंश के लिए रेतीला ठाण सबसे आरामदायक होता है। गेंदें के पत्तों की चटनी बना कर भी उनके शरीर पर लगाने से मच्छर, मक्खियां उनके शरीर पर नहीं बैठती।
गुमड़ा रोग के प्रारंभिक लक्षण कई प्रकार के हो सकते हैं।
गौवंश में बेचैनी बढ़ जाती है। छोटी छोटी गुमड़ी शरीर पर कहीं भी दिखाई दे सकती हैं। हल्का बुखार आदि हो सकता है। द्वितीय अवस्था में गुमड़ा बड़ी व शरीर पर कहीं भी फैल जाती हैं व गौवंश खाना छोढ़ देता है पर पानी पीता रहता है। पैरों (टांगों) में सोजिश आ जाती है तथा उससे बैठा नहीं जाता।
तीसरी अवस्था में उसके नाक से रेशा बहना शुरू हो जाता है तथा बुखार भी हो जाता है। फेफड़ों में संक्रमण के कारण साँसें तेज चलने लगती हैं, उस अवस्था में पानी में नीम, गिलोय व हल्दी आदि डाल कर उसकी भाँप देना शुरू कर दें व तुरन्त विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करें।
सभी जीवों में जीवन का खेल रोगप्रतिरोधक क्षमता का ही होता है। मानव हो या कोई ओर जीव, जितना खुला घूमेंगा व चरेगा, उसकी रोगप्रतिरोधक क्षमता उतनी ही अच्छी होगी। जब मैं रोहतक से बीकानेर आया तो रास्ते में अनेक गाय जंगल में चरती दिखाई दी परन्तु उनमें से किसी के शरीर…
पर भी मुझे गुमड़ा दिखाई नहीं दिया। हो सकता है बीमार गाय कहीं एकांत में खड़ी हो। खैर .... प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही 100 ग्राम नीम के पत्ते, 50 ग्राम हल्दी व 20 ग्राम फिटकरी को अच्छे से कूट व रगड़ कर मुलायम चटनी बना लें फिर उस चटनी को आधा लीटर सरसों के तेल में भून लें।
इस मिश्रण को रुई से गाँठों पर लगा दें। जब तक गाँठ ठीक ना हों तब तक यह मिश्रण गाँठों पर प्रतिदिन लगाते रहें। खुरों के बीच में भी गाँठ हो सकती हैं अतः यह वहां पर भी लगा दें। इसके परिणाम बहुत ही अच्छे मिले हैं।
देशी गौवंश पानी से नहाना पसंद नहीं करता है अतः उसे इस अवस्था
में बिल्कुल भी ना नहालायें। मुझे लगता है कि नंदिनी को नहलाने के कारण ही उसका बुखार निमोनिया में बदल गया तथा वह हमें छोड़कर चली गयी।
पैरों की सोजिश उतारने के लिए नीम, हल्दी व सेंधा नमक के उबले पानी में सूती कपड़ा भीगोकर टांगों की सिकाई करें। जब गौवंश खाना छोढ़ देता है तो इसका..
अर्थ यह है कि वह अपनी उर्जा जुगाली करने व खाना पचाने में व्यर्थ नहीं करना चाहते। उस उर्जा का उपयोग वह स्वयं को स्वस्थ रखने में लगा देते हैं। इसलिए चारा आदि उन्हें जोर जबरदस्ती ना खिलायें। उन्हें बाजरे के रोट पर विषाणु रोधी व दर्द निवारक औषधियाँ जैसे कि 5 कली लहसुन,
एक फांक ग्वार पाठा, 50 ग्राम लूणी घी, 20 ग्राम हल्दी व गिलोय के पत्ते व हरी डंडी आदि खिला दें।
एक गाय आमतौर पर दस लीटर पानी पी लेती है इसलिए उनके पीने वाले दस लीटर पानी में 50 ग्राम नीम के पत्ते, 10 ग्राम हल्दी व 10 ग्राम फिटकरी उबालकर यह हल्का गर्म पानी पिलायें।
स्वस्थ गायों की खुराक में सूखा आंवला, गिलोय आदि भी देना शुरू कर देना चाहिए। बरसात का मौसम है तथा हमारे खेत व जंगल औषधीय पौधों से भरें खड़े हैं, सांठी, भांखड़ी, कोंधरा व चौलाई आदि भी विषाणु रोधी व दर्द निवारक होते हैं। दूब का रस भी औषधि का काम करता है।
अतः गायों को खेतों में चरने दें।
हमारे गाँवों में जो एल एस ए या वी एल डी आदि घूमते हैं उनको इस रोग का विशेषज्ञ समझने की भूल ना करें। अपने ब्लॉक के पशु चिकित्सा अधिकारी से व अन्य पशु रोग विशेषज्ञों से लगातार राम रमी करते रहें व संपर्क बनायें रखें।
अनावश्यक घबराहट हमारे से गलतियां करवा सकती है अतः चिंता नहीं चिंतन व मनन करें।
Cr. डॉ. शिव दर्शन मलिक

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