वर्ष लगते हैं जबकि पाश्चात्य वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव सभ्यताओं का उदय लगभग पाँच से छह हजार वर्ष पहले ही हुआ था। फिर इतने समय पहले ऐसा लोहे का दीपक किसने बनाया जो कोयले के भीतर से निकला।
मित्रो, भारतीय संस्कृति के चतुर्युगी सिद्धांत को स्वीकार करने पर ही यह गुत्थी (2/32)
मित्रो, भारतीय संस्कृति के चतुर्युगी सिद्धांत को स्वीकार करने पर ही यह गुत्थी (2/32)
सुलझ सकती है।
अब समझते हैं सनातन दर्शन के अनुसार सृष्टि की काल गणना :
सृष्टि की वर्तमान आयु पर विचार करते हैं। वर्तमान में सृष्टि का वर्णन Friedmann Model के अनुसार किया जाता है। इसमें बिग बैंग के साथ ही आकाश-समय निरन्तरता का जन्म हो जाता है, अर्थात् समय की गणना बिग (3/32)
अब समझते हैं सनातन दर्शन के अनुसार सृष्टि की काल गणना :
सृष्टि की वर्तमान आयु पर विचार करते हैं। वर्तमान में सृष्टि का वर्णन Friedmann Model के अनुसार किया जाता है। इसमें बिग बैंग के साथ ही आकाश-समय निरन्तरता का जन्म हो जाता है, अर्थात् समय की गणना बिग (3/32)
बैंग के प्रारंभ होने के साथ ही शुरू हो जाती है।
एक अमेरिकन वैज्ञानिक Edwin Hubble ने 9 विभिन्न आकाश गंगाओं (Galaxies) की दूरी जानने का प्रयत्न किया। उसने बताया कि हमारी आकाश गंगा तो अत्यन्त छोटी है, ऐसी तो करोड़ों आकाश गंगाएँ हैं।
साथ ही उसने यह भी बताया कि जो आकाश (4/32)
एक अमेरिकन वैज्ञानिक Edwin Hubble ने 9 विभिन्न आकाश गंगाओं (Galaxies) की दूरी जानने का प्रयत्न किया। उसने बताया कि हमारी आकाश गंगा तो अत्यन्त छोटी है, ऐसी तो करोड़ों आकाश गंगाएँ हैं।
साथ ही उसने यह भी बताया कि जो आकाश (4/32)
गंगा (Galaxy) हमसे जितनी अधिक दूर है, उतनी ही अधिक तेजी से वह हम से दूर भागती जा रही है। उसने उनकी हमसे दूर होने की चाल की गति भी ज्ञात कर ली। फिर इस सिद्धान्त पर भी आकाश गंगाओं के समय तो सब एक ही स्थान पर थे। उन्हें इतना दूर जाने में कितना समय लगा, उसका एक नियम भी खोज (5/32)
लिया।
नियम है : V=HR. यहाँ V आकाश गंगा की हमसे दूर भागने की गति है, R आकाश गंगा की हमसे दूरी है और H Constant है।
Edwin Hubble ने यह भी ज्ञात किया कि कोई भी आकाश गंगा जो हमसे d दश लाख प्रकाश वर्ष की दूरी पर है, उसकी दूर हटने की गति 19d मील प्रति सैकण्ड है। अतः अब समय (6/32)
नियम है : V=HR. यहाँ V आकाश गंगा की हमसे दूर भागने की गति है, R आकाश गंगा की हमसे दूरी है और H Constant है।
Edwin Hubble ने यह भी ज्ञात किया कि कोई भी आकाश गंगा जो हमसे d दश लाख प्रकाश वर्ष की दूरी पर है, उसकी दूर हटने की गति 19d मील प्रति सैकण्ड है। अतः अब समय (6/32)
R=106 d प्रकाश वर्ष, T =106×365×24×3600×186000d वर्ष
19d×3600×24×365
=186×109=9.7×109वर्ष
19
Saint Augustine ने अपनी पुस्तक The City of God में बताया कि उत्पत्ति की पुस्तक के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति ईसा से 500 वर्ष पूर्व हुई है।
बिशप उशर का मानना है कि सृष्टि की (7/32)
19d×3600×24×365
=186×109=9.7×109वर्ष
19
Saint Augustine ने अपनी पुस्तक The City of God में बताया कि उत्पत्ति की पुस्तक के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति ईसा से 500 वर्ष पूर्व हुई है।
बिशप उशर का मानना है कि सृष्टि की (7/32)
उत्पत्ति ईसा से 4004 वर्ष पूर्व हुई है और केब्रीज विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. लाइटफुट ने सृष्टि उत्पत्ति का समय 23 अक्टूबर 4004 ईसा पूर्व प्रातः 9 बजे बताया है जो हास्यास्पद है।
अब हम वैदिक वाङ्मय के आधार पर सृष्टि की आयु पर विचार करते हैं... स्वामी दयानन्द सरस्वती ने (8/32)
अब हम वैदिक वाङ्मय के आधार पर सृष्टि की आयु पर विचार करते हैं... स्वामी दयानन्द सरस्वती ने (8/32)
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के दूसरे अध्याय अथ वेदोत्पत्ति विषय में इस पर विचार किया है कि वेद की उत्पत्ति कब हुई? इससे यह मानना चाहिए कि सृष्टि में मानव की उत्पत्ति कब हुई, क्योंकि मानव के उत्पन्न होने पर ही तो वेद का ज्ञान उसे प्राप्त हुआ है। इससे पूर्व की स्थिति अर्थात् (9/32)
सृष्टि उत्पन्न होने के प्रारम्भ से मानव के उत्पन्न होने के समय पर उन्होंने अपने विचार देना उचित नहीं समझा। वास्तव में मनुष्य ने तो अपने उत्पन्न होने के बाद ही समय की गणना प्रारमभ की है। सृष्टि के उस समय की गणना वह कैसे करता, जब बन ही रही थी? वह कैसे जानता कि सृष्टि (10/32)
उत्पन्न होने की क्रिया के प्रारम्भ होने से उसके पूर्ण होने तक सृष्टि निर्माण में कितना समय व्यतीत हुआ है? इस में मनुस्मृति के श्लोकों को ही मुख्य रूप से काम में लिया है:
अत्वार्याहुः सहस्त्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।
तस्य यावच्छतो सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथा विधः।।
(11/32)
अत्वार्याहुः सहस्त्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।
तस्य यावच्छतो सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथा विधः।।
(11/32)
(मनु. 1.69)
उन दैवीयुग में (जिनमें दिन-रात का वर्णन है) चार हजार दिव्य वर्ष का एक सतयुग कहा है। इस सतयुग की जितने दिव्य वर्ष की अर्थात् 400 वर्ष की सन्ध्या होती है और उतने ही वर्षों की अर्थात् 400 वर्षों का सन्ध्यांश का समय होता है।
(12/32)
उन दैवीयुग में (जिनमें दिन-रात का वर्णन है) चार हजार दिव्य वर्ष का एक सतयुग कहा है। इस सतयुग की जितने दिव्य वर्ष की अर्थात् 400 वर्ष की सन्ध्या होती है और उतने ही वर्षों की अर्थात् 400 वर्षों का सन्ध्यांश का समय होता है।
(12/32)
इतंरेषु ससन्ध्येषु ससध्यांशेषु च त्रिषु।
एकापायेन वर्त्तन्ते सहस्त्राणि शतानि च।।
(मनु. 1.70)
और अन्य तीन; त्रेता, द्वापर और कलियुग में सन्ध्या नामक कालों में तथा सन्ध्यांश नामक कालों में क्रमशः एक-एक हजार और एक-एक सौ कम कर ले तो उनका अपना-अपना काल परिणाम आ जाता है।
(13/32)
एकापायेन वर्त्तन्ते सहस्त्राणि शतानि च।।
(मनु. 1.70)
और अन्य तीन; त्रेता, द्वापर और कलियुग में सन्ध्या नामक कालों में तथा सन्ध्यांश नामक कालों में क्रमशः एक-एक हजार और एक-एक सौ कम कर ले तो उनका अपना-अपना काल परिणाम आ जाता है।
(13/32)
इस गणना के आधार पर सतयुग 4800 देव वर्ष, त्रेतायुग 3600 देव वर्ष, द्वापर 2400 वर्ष तथा कलियुग 1200 देव वर्ष के होते हैं। इस चारों का योग अर्थात् एक चतुर्युगी 12000 देव वर्ष का होता है।
दैविकानाम युगानां तु सहस्त्रं परि संखयया।
ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च।।
(14/32)
दैविकानाम युगानां तु सहस्त्रं परि संखयया।
ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च।।
(14/32)
(मनु. 1.72)
देव युगों को 1000 से गुण करने पर जो काल परिणाम निकलता है, वह ब्रह्म का एक दिन और उतने ही वर्षों की एक रात समझना चाहिए। यह ध्यान रहे कि एक देव वर्ष 360 मानव वर्षों के बराबर होता है।
तद्वै युग सहस्रान्तं ब्राह्मं पुण्यमहर्विदुः।
(15/32)
देव युगों को 1000 से गुण करने पर जो काल परिणाम निकलता है, वह ब्रह्म का एक दिन और उतने ही वर्षों की एक रात समझना चाहिए। यह ध्यान रहे कि एक देव वर्ष 360 मानव वर्षों के बराबर होता है।
तद्वै युग सहस्रान्तं ब्राह्मं पुण्यमहर्विदुः।
(15/32)
रात्रिं च तावतीमेव तेऽहोरात्रविदोजनाः।।
(मनु. 1.73)
जो लोग उस एक हजार दिव्य युगों के परमात्मा के पवित्र दिन को और उतने की युगों की परमात्मा की रात्रि समझते हैं, वे ही वास्तव में दिन-रात = सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय काल के विज्ञान के वेत्ता लोग हैं।
इस आधार की सृष्टि की (16/32)
(मनु. 1.73)
जो लोग उस एक हजार दिव्य युगों के परमात्मा के पवित्र दिन को और उतने की युगों की परमात्मा की रात्रि समझते हैं, वे ही वास्तव में दिन-रात = सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय काल के विज्ञान के वेत्ता लोग हैं।
इस आधार की सृष्टि की (16/32)
आयु = 12000×1000 देव वर्ष = 12000000 देव वर्ष
12000000×360 = 4320000000 देव वर्ष
12000000 देव वर्ष = 4320000000 मानव वर्ष
यत् प्राग्द्वादशसाहस्त्रमुदितं दैविक युगम्।
तदेक सप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते।।
(मनु. 1.79)
पहले श्लोकों में जो बारह हजार दिव्य वर्षों का एक दैव (17/32)
12000000×360 = 4320000000 देव वर्ष
12000000 देव वर्ष = 4320000000 मानव वर्ष
यत् प्राग्द्वादशसाहस्त्रमुदितं दैविक युगम्।
तदेक सप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते।।
(मनु. 1.79)
पहले श्लोकों में जो बारह हजार दिव्य वर्षों का एक दैव (17/32)
युग कहा है, इससे 71 (इकहत्तर) गुना समय अर्थात् 12000×71 = 852000 दिव्य वर्षों का अथवा 852000×360= 306720000 वर्षों का एक मन्वन्तर का काल परिणाम गिना गया है।
फिर अगले श्लोक में कहा गया है कि वह महान् परमात्मा असंखय मन्वन्तरों को, सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय को बार-बार करता (18/32)
फिर अगले श्लोक में कहा गया है कि वह महान् परमात्मा असंखय मन्वन्तरों को, सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय को बार-बार करता (18/32)
रहता है, अर्थात् सृष्टि प्रवाह से अनादि है।
संकल्प मन्त्र के आधार पर वेद का उत्पत्ति काल:
ओ3म् तत्सत् श्री ब्रह्मणः द्वितीये प्रहरोत्तरार्द्धे वैवस्वते मन्वन्तरेऽअष्टाविंशतितमे कलियुगे कलियुग प्रथम चरणेऽमुकसंवत्सरायमनर्तु मास पक्ष दिन नक्षत्र लग्न मुहूर्तेऽवेदं कृतं (19/32)
संकल्प मन्त्र के आधार पर वेद का उत्पत्ति काल:
ओ3म् तत्सत् श्री ब्रह्मणः द्वितीये प्रहरोत्तरार्द्धे वैवस्वते मन्वन्तरेऽअष्टाविंशतितमे कलियुगे कलियुग प्रथम चरणेऽमुकसंवत्सरायमनर्तु मास पक्ष दिन नक्षत्र लग्न मुहूर्तेऽवेदं कृतं (19/32)
क्रियते च।
यह जो वर्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें वैवस्वत मनु का वर्तमान है। इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं और सात मन्वन्तर आगे होवेंगे। ये सब मिलकर चौदह मन्वन्तर होते हैं।
इस आधार पर वेदोत्पत्ति की काल गणना इस प्रकार होगी...
छः मन्वन्तरों का समय = 4320000×71×6=
(20/32)
यह जो वर्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें वैवस्वत मनु का वर्तमान है। इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं और सात मन्वन्तर आगे होवेंगे। ये सब मिलकर चौदह मन्वन्तर होते हैं।
इस आधार पर वेदोत्पत्ति की काल गणना इस प्रकार होगी...
छः मन्वन्तरों का समय = 4320000×71×6=
(20/32)
1840320000 वर्ष
वर्तमान मन्वन्तर की 27 चतुर्युगी का काल= 4320000×27= 116640000 वर्ष
अट्ठाइसवीं चतुर्युगी के गत तीन युगों का काल= 3888000 वर्ष
कलियुग के प्रारभ से विक्रम सं. 2077 तक का काल= 3043 + 2077 वर्ष
= 5120 वर्ष
कुल योग = 1840320000 +116640000 + 3888000
(21/32)
वर्तमान मन्वन्तर की 27 चतुर्युगी का काल= 4320000×27= 116640000 वर्ष
अट्ठाइसवीं चतुर्युगी के गत तीन युगों का काल= 3888000 वर्ष
कलियुग के प्रारभ से विक्रम सं. 2077 तक का काल= 3043 + 2077 वर्ष
= 5120 वर्ष
कुल योग = 1840320000 +116640000 + 3888000
(21/32)
+5120 वर्ष
= 1960853120 वर्ष। चूंकि विक्रम संवत् के प्रारम्भ तक कलियुग के 3043 वर्ष व्यतीत हो चुके थे और 3044 वाँ वर्ष चल रहा था, इसलिए वर्तमान में 1960853121वाँ वर्ष चल रहा है।
अब कुछ विद्वान् कहते हैं कि सृष्टि की आयु जब मनु 1000 चतुर्युगी मानते हैं और दूसरी तरफ इसी (22/32)
= 1960853120 वर्ष। चूंकि विक्रम संवत् के प्रारम्भ तक कलियुग के 3043 वर्ष व्यतीत हो चुके थे और 3044 वाँ वर्ष चल रहा था, इसलिए वर्तमान में 1960853121वाँ वर्ष चल रहा है।
अब कुछ विद्वान् कहते हैं कि सृष्टि की आयु जब मनु 1000 चतुर्युगी मानते हैं और दूसरी तरफ इसी (22/32)
आयु को 14 मन्वन्तर अर्थात् 994 चतुर्युगी कहा जाता है, तो दोनों के अन्तर 6 चतुर्युगों का समन्वय कैसे होगा? इसका उत्तर यह है कि 994 चतुर्युग तो मानव भोग काल है और 6 चतुर्युगों का समय सृष्टि उत्पत्ति के प्रारमभ से लेकर मानव अथवा वेदों की उत्पत्ति तक का है। सृष्टि उत्पत्ति (23/32)
में जो समय लगा है, वह सृष्टि की आयु में माना जावेगा। इसी प्रकार भोग काल 994 चतुर्युगों के अन्त में प्रलय काल प्रारमभ होगा और वह प्रलय की आयु में जोड़ा जायेगा।
ऋग्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि काल लगे बिना कोई कार्य नहीं होता...
(24/32)
ऋग्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि काल लगे बिना कोई कार्य नहीं होता...
(24/32)
त्वेषं रूपं कृणुत उत्तरं यत्संपृञ्चानः सदने गोभिरद्भि।
कविबुध्नं परि मर्मृज्यते धीः सा देवताता समिति र्बभूवः।।
(ऋ. 1.95.8)
अर्थ: मनुष्य को चाहिए कि (यत्) जो (संपृञ्चानः) अच्छा परिचय करता कराता हुआ (कविः) जिसका क्रम से दर्शन होता है, वह समय (सादने) सदन में (गोभिः) सूर्य (25/32)
कविबुध्नं परि मर्मृज्यते धीः सा देवताता समिति र्बभूवः।।
(ऋ. 1.95.8)
अर्थ: मनुष्य को चाहिए कि (यत्) जो (संपृञ्चानः) अच्छा परिचय करता कराता हुआ (कविः) जिसका क्रम से दर्शन होता है, वह समय (सादने) सदन में (गोभिः) सूर्य (25/32)
की किरणों वा (अद्भिः) प्राण आदि पवनों से (उत्तरम्) उत्पन्न होने वाले (त्वेषम्) मनोहर (बुध्नम्) प्राण और बल सबन्धी विज्ञान और (रूपम्) स्वरूप को (कृणुते) करता है तथा जो (धीः) उत्पन्न बुद्धि वा क्रिया (परि) (मर्मृज्यते) सब प्रकार से शुद्ध होती है (सा) वह (देवताता) ईश्वर (26/32)
और विद्वानों के साथ (समितिः) विशेष ज्ञान की मर्यादा (बभूव) होती है, इस समस्त उक्त व्यवहार को जानकर बुद्धि को उत्पन्न करें।
भावार्थ: मनुष्यों को जानना चाहिये कि काल के बिना कार्य स्वरूप उत्पन्न होकर और नष्ट हो जाये, यह होता ही नहीं है और न ब्रह्मचर्य आदि उत्तम समय के सेवन (27/32)
भावार्थ: मनुष्यों को जानना चाहिये कि काल के बिना कार्य स्वरूप उत्पन्न होकर और नष्ट हो जाये, यह होता ही नहीं है और न ब्रह्मचर्य आदि उत्तम समय के सेवन (27/32)
के बिना शास्त्र बोध कराने वाली बुद्धि होती है, इस कारण काल के परम सूक्ष्म स्वरूप को जानकर थोड़ा-सा भी समय व्यर्थ न खोवें, किन्तु आलस्य छोड़कर समय के अनुसार व्यवहार और परमार्थ के कामों का सदा अनुष्ठान करें।
यह भी ध्यान रखें कि जिस क्रिया में जो समय लगे, वह उसी का होगा। (28/32)
यह भी ध्यान रखें कि जिस क्रिया में जो समय लगे, वह उसी का होगा। (28/32)
स्वामी जी ने इस प्रकरण में वेद का उत्पत्ति काल बताया है, सृष्टि की आयु नहीं बताई है। यदि सृष्टि की आयु जानना चाहें तो इसमें सृष्टि का उत्पत्ति काल जोड़ दें, तब सृष्टि की आयु होगी...
= 1960853116+25920000= 1986773116 वर्ष
साथ ही सृष्टि की शेष आयु होगी = 4320000000-
(29/32)
= 1960853116+25920000= 1986773116 वर्ष
साथ ही सृष्टि की शेष आयु होगी = 4320000000-
(29/32)
1986773121= 2333226889 वर्ष सन्धि और सन्ध्यांश काल तो युगों की आयु में पहिले ही जोड़ लिए हैं, फिर मन्वन्तर के प्रारमभ और अन्त में एक सतयुग का जोड़ना व्यर्थ है। स्वामी जी ने ही नहीं, मनु ने भी इसका उल्लेख नहीं किया है। ज्ञान के अभाव में सृष्टि उत्पत्ति काल को न समझ कर (30/32)
25920000 वर्षों को 15 भागों में व्यर्थ विभाजित कर क्षति पूर्ति करने का प्रयत्न किया गया है। इससे तो यहूदी ही अच्छे हैं, जो सृष्टि की उत्पत्ति 6 दिनों में स्वीकार करते हैं। यदि उनके दिन का मान एक चतुर्युगी मान लें तो उनकी सृष्टि उत्पत्ति की गणना ठीक वेदों के अनुरूप हो (31/32)
जाती है।
पुरातात्विक, खगोलीय और अन्य वैज्ञानिक प्रमाण सनातन के काल गणना को सही सिद्ध करते हैं। मानव का इतिहास लाखों नहीं बल्कि करोड़ों वर्ष प्राचीन है...
#ॐ_स्वस्ति
#साभार
(32/32)
पुरातात्विक, खगोलीय और अन्य वैज्ञानिक प्रमाण सनातन के काल गणना को सही सिद्ध करते हैं। मानव का इतिहास लाखों नहीं बल्कि करोड़ों वर्ष प्राचीन है...
#ॐ_स्वस्ति
#साभार
(32/32)
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