Vशुद्धि
Vशुद्धि

@V_Shuddhi

7 Tweets 14 reads Feb 03, 2023
हम इकबाल का लिखा गीत “सारे जहां से अच्छा” क्यों पढ़ते हैं?
कहते हैं अगर आप दुश्मन की मानसिकता को समझना चाहते हैं तो आपको दुश्मन के साहित्य का अध्ययन करना चाहिए।
“अल्लामा मुहम्मद इकबाल” दुनिया के जाने माने शायर जिसकी कलात्मकता, रचनात्मकता और संवेदनशीलता की प्रशंसा पूरी दुनिया
करती है। कोई भी अगर उनको पढ़ेगा तो उनकी तारीफ किए बना नहीं रह सकेगा।
लेकिन सच ये भी है कि अल्लामा इकबाल की शायरी से ‘जिहाद’ की गंध आती है।
उनका ऐसा ही एक जेहादी शेर पेश-ए-खिदमत है
“जो कबूतर पर झपटने में मज़ा है ए पिसर, वो मज़ा शायद कबूतर के लहू में भी नहीं।”
शेर का अर्थ-
ऐ बेटे
जो मज़ा कबूतर पर झपट्टा मारकर उसको दबोच लेने में है वो मज़ा कबूतर का खून पीने में भी नहीं है।
हमारे देश में आप किसी भी Muसलमान से बात कीजिएगा और उससे ये पूछिएगा कि ‘अल्लामा इकबाल’ के बारे में आपके क्या विचार हैं? तो वो अभिभूत हो जाएगा
वो इसी बात से खुश हो जाएगा कि किसी हिंदू के मुँह से अल्लामा इकबाल का नाम फूटा है।
वो अल्लामा इकबाल की तारीफ में पुल बाँध देगा। अगर शक हो तो कभी आज़मा कर देख लीजिएगा। और उसके बाद उसे वही शेर सुनाइएगा जिसका ज़िक्र यहाँ किया गया है। देखिए फिर उसके पास क्या जवाब होता है
वो आपको philosophy समझाएगा।
लेकिन जवाब नहीं दे पाएगा क्योंकि शायर की ज़ेहनियत उसके शेरों में ही झलकती है।
अब ज़रा सोचिए! इकबाल का कद पाकिस्तान में क्या है?
पाकिस्तान में वरिष्ठ पत्रकार इकबाल के शेर पढ़ते-पढ़ते इतने भावुक हो जाते हैं कि रोने लगते हैं।
इकबाल को पाकिस्तान में "Spiritual Father of Pakistan" यानी पाकिस्तान का आध्यात्मिक पिता कहा जाता है।
पाकिस्तान में ‘इकबाल डे’ मनाया जाता है उस दिन अवकाश होता है।
पाकिस्तान इकबाल को National Poet of Pakistan यानी पाकिस्तान का राष्ट्रकवि कहता है।
ये कबूतर के खून में भी मज़ा ढूँढ़ने वाली सभ्यता है जिसके बारे में हमें जागरूक होना चाहिए।
जिसको कबूतर का खून पीने से ज्यादा मज़ा कबूतर को दबोच कर उसकी हत्या करने में आता है।

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