संसद में राहुल गांधी समेत कांग्रेस के कई नेताओं ने हालिया अडानी संकट को लेकर कई प्रकार के सवाल उठाये और सरकार पर आरोप लगाए।
यह सुनकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि संसद के सभापति ने उन आरोपों को सदन की कार्यवाही से यह कह कर निकाल दिया कि उसका कोई प्रूफ नहीं है। अजीब हालत है!
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यह सुनकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि संसद के सभापति ने उन आरोपों को सदन की कार्यवाही से यह कह कर निकाल दिया कि उसका कोई प्रूफ नहीं है। अजीब हालत है!
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अरे भई, संसद का अस्तित्व ही इसी चीज पर टिका हुआ है "गवर्नेंस बाय डिस्कशन"।
देश का हर मुद्दा जनता से संबंधित मुद्दा ही होता है, और इसीलिए संसद में खुले डिस्कशन की जरूरत होती है।
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देश का हर मुद्दा जनता से संबंधित मुद्दा ही होता है, और इसीलिए संसद में खुले डिस्कशन की जरूरत होती है।
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जब संसद में जनता के मत से चुने गए सत्ता पक्ष और विपक्ष के प्रतिनिधि आपस में खुली एवं स्वस्थ बहस करते हैं और मीडिया उन्हें लोक विमर्श के लिए जनता तक पहुंचाता है तभी जनता आपस में बातचीत कर सरकार और विपक्ष के प्रति अपनी राय बनाती है।
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संसद कोई कोर्ट नहीं है, जहां हर चीज पर सबूत पेश किया जाए।
संसद की चर्चा कोर्ट की कार्यवाही से अलग होती है। संसद में अगर हर आरोप लगाने वाले से सबूत मांगा जाने लगा तो संसदीय प्रजातंत्र का अस्तित्व ही नहीं बचेगा।
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संसद की चर्चा कोर्ट की कार्यवाही से अलग होती है। संसद में अगर हर आरोप लगाने वाले से सबूत मांगा जाने लगा तो संसदीय प्रजातंत्र का अस्तित्व ही नहीं बचेगा।
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जनता को पक्ष और विपक्ष की बातें सुनकर अपनी राय बनाने दीजिए।
अगर राय सत्ता पक्ष के विरोध में गई तो सरकार के खिलाफ वोटिंग किया जाएगा, यदि सत्ता पक्ष के समर्थन में जनता की राय बनी तो चुनाव में सत्तापक्ष को फिर वोट मिलेंगे।
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अगर राय सत्ता पक्ष के विरोध में गई तो सरकार के खिलाफ वोटिंग किया जाएगा, यदि सत्ता पक्ष के समर्थन में जनता की राय बनी तो चुनाव में सत्तापक्ष को फिर वोट मिलेंगे।
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लोकतंत्र का तकाजा यही है कि इस प्रकार के आरोपों के लिए आपसी वाद विवाद के लिए सदन में खुली चर्चा करें। सदन की कार्यवाही से प्रूफ नहीं होने के आरोप लगाकर कही गई बातों को कार्यवाही से हटा देना बहुत बुरी परिपाटी है। तानाशाही का प्रारंभ यहीं से होता है।
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आखिर संसद का अस्तित्व है क्यों?
यदि सरकार को यह लगता है कि एक बार 5 साल के लिए वोट के जरिए चुने जाने के बाद उन्हें किसी और राय की जरूरत ही नहीं है तो संसद के सत्र बुलाने की आवश्यकता क्या?
संसदीय प्रजातंत्र के अस्तित्व पर यही सबसे बड़ा हमला है।
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यदि सरकार को यह लगता है कि एक बार 5 साल के लिए वोट के जरिए चुने जाने के बाद उन्हें किसी और राय की जरूरत ही नहीं है तो संसद के सत्र बुलाने की आवश्यकता क्या?
संसदीय प्रजातंत्र के अस्तित्व पर यही सबसे बड़ा हमला है।
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सीधे बंद कीजिए संसद को और अपने अपने मंत्रालयों में घुसकर चैन से 5 साल बंसी बजाइए!
पीएम जी ने 70साल की परंपरा को तो पूरी तरह त्याग ही दिया है कि नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपने कामकाज पर प्रतिनिधि पत्रकारों से चर्चा करें।
अब आखिरी काम यही बचा है कि संसद पर ताला डाल दें।
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पीएम जी ने 70साल की परंपरा को तो पूरी तरह त्याग ही दिया है कि नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपने कामकाज पर प्रतिनिधि पत्रकारों से चर्चा करें।
अब आखिरी काम यही बचा है कि संसद पर ताला डाल दें।
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