आचार्य कन्फ़्यूशियस
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@AchryConfucious

7 Tweets 5 reads Feb 21, 2023
तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को हर मंच से "मौनमोहन सिंह" बोल कर उनके नाम का मखौल उड़ाने वाले मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पदासीन प्रधानमंत्री की सार्वजनिक आलोचना को इतने नीचे स्तर तक गिरने की परंपरा डाली थी।
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उस दौर की काँग्रेस सरकार ने लोकतंत्र के तकाजे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लिहाज करते हुए कोई दंडात्मक कार्यवाही उस बड़बोले मुख्यमंत्री पर नहीं की।
पर एक गलत परंपरा की शुरुवात तो हो ही गई।
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वही नरेंद्र मोदीजी अपने मुँहफट व्यक्तित्व और बड़बोलेपन को संसद में प्रचंड बहुमत का बल मिलने पर बेहिचक "काँग्रेस की विधवा", "जर्सी गाय", "शूर्पणखा जैसी हंसी" जैसे बेशर्म और बेहूदा शब्द लगातार उगलते रहे, और बेहया बहुमत टेबलें ठोकता रहा।
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यही गंदी मखौल उड़ाने वाली स्तरहीन भाषा जब बूमरैंग बैन कर वापस लौटना शुरू हुई तो संस्कारी दल सम्मान और सभ्यता की दुहाई देते हुए न सिर्फ छाती पीटना चालू कर देता है, वरन तानाशाही मानसिकता के साथ दंडात्मक कार्यवाही, एफआईआर, और अरेस्ट जैसी हरकतों पर उतारू हो जाता है।
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पिछले वर्षों में कितने ही कॉमेडियन,पत्रकार, विपक्षी नेता, लेखक और बुद्धिजीवी इस मानसिकता का शिकार बने हैं।
यहाँ मोदीजी के उस ट्वीट का जिक्र करना भी लाजिमी है जहां वे अपनी सरकार का क्रिटिसिज़म करने को लोकतंत्र के लिए सहायक मानते हैं।
दिखाने के दांत बड़े खूबसूरत होते हैं।
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इस सीरीज की अगली कड़ी में शिकार बने हैं काँग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा @Pawankhera, जिनके खिलाफ लखनऊ में एफआईआर दर्ज हुई हैं प्रधानमंत्री के लिए अभद्र भाषा इस्तेमाल करने के लिए। उन्होंने व्यंग्य में मोदीजी को नरेंद्र गौतम मोदी कहा था।
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livehindustan.com
@Pawankhera शायद @Pawankhera पवनजी अगर मोदीजी की ही तर्ज में "संघ का विधुर बैल" या "जर्सी साँड" जैसे शब्द इस्तेमाल करते तो अधिक संस्कारी अप्रोच होता, और सहजता से 303 टेबलें ठोंकी जा सकतीं।
😆
भाषा संस्कारों की परिचायक होती है। वही भाषा आसानी से हजम होती है, जिसके संस्कार मिले हों।
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