आज #धर्मसंसद मे भाई साहब ने प्रश्न लगताहै नही पूछा है व्यस्ततावश!अतः आज कुछ अन्य विमर्श कर लेते हैं।आजकल आधे अधूरे ज्ञान के साथ सुनी सुनाई बातों पर बहक कुछ लोग श्रीराम पर एक नागरिक के कहने पर सीतामाता के गर्भावस्था मे वनवास का आरोप लगा देतेहै!श्रीराम का समग्र चरित्र आचरण करुणा और
न्याय का प्रतिमान रहा है भला सब पर कृपालु अपने दुश्मनो पर भी सहृदय रहनेवाले क्या अपनी पतिगतप्राणा प्राणप्रिया को किसी झूठे अपवाद पर त्याग सकते थे?आइये वाल्मीकि ऋषि से ही पूछ लिया जाये!एक नागरिक के कहने पर राम द्वारा सीता त्याग कावर्णन वाल्मिकीरामायण सम्मत नहीहै!प्रसंग हैकि लंका
से अयोध्या आकर श्रीराम धर्मपूर्वक राज्य करते रहे।इसी बीच सीता के गर्भ के मंगलमय चिन्ह देखकर रामने सीता सेपूछा"अपत्यलाभो_वैदेही_त्वय्य्यं_समुपस्थित:।किमिच्छसि_वरारोहे_काम: किं क्रियतां तव!"
अर्थात हे विदेहनंदिनी!तुम्हारे गर्भका यह समय चल रहाहै।वरारोहे!बताओ तुम्हारी क्या इच्छा है?
मैं तुम्हारा कौन सा मनोरथ पूर्ण करूँ?
इस पर सीता उत्तर देती हैं"तपोवनानि पुण्यानि दृष्टुमिच्छामि राघव!गंगातीरोपविष्टानामृषीणामुग्रतेजसाम।।
फलमूलाशिनां देव पादमूलेषु वर्तितुम।
एष मे परम:कामो यन्मूलफलभोजीनाम।।"
हे रघुनन्दन!मेरी इच्छा एकबार उन पवित्र तपोवनों कोदेखने कीहो रहीहै।देव!
गंगा तट पर रहकर फल-मूल खाने वाले जो उग्र तेजस्वी महर्षि हैं, उनके समीप कुछ दिन रहना चाहती हूं।
अब इन प्रसंग को पढ़कर महान धर्म के वाहक और मर्यादा के आदर्श श्रीराम का स्त्री के प्रति सम्मानजनक व्यवहार का पता चलता है।अहिल्या शबरी को माँ का सम्मान देनेवाले राम!अपनी पत्नी सीताको वन
में त्याग सकते हैं वो भी एकनागरिक के मिथ्यादोषारोप पर?इसविषय पर रामायण यही प्रकटकरती हैकि गर्भावस्था मेंसुखदअनुभव हेतु सीताका मनोरथ पूर्ण करनेके लिएही उन्हें महर्षिवाल्मीकि केआश्रम लेजाया गयाथा।
सीता केविशुद्धआचरण केविषयमें रामायण काअन्यत्र प्रसंगभीहै जिन्हे कल विमर्श मे लेंगे!
20.3.23 कलसेआगे👉सीताके विशुद्धआचरण के विषयमें रामायण काअन्यत्र प्रसंग भीहै,लंका से लौटनेकेबाद स्वयं श्रीराम ने कहा"चन्द्रादित्यों च शंसते सुराणां सन्निधौ पुरा!ऋषीणां चैव सर्वेषां अपापां जनकात्मजाम्"अंतरात्मा चमे वेत्ति सीतां शुद्धाम् यशस्विनीम्।ततो गृहीत्वा वैदेहीमयोध्यामहमागत:
अर्थात आकाशचारी वायु, चन्द्रमा और सूर्य ने भी पहले देवताओं तथा समस्त ऋषियों के समीप जनकनन्दिनी को निष्पाप घोषित किया था। इस प्रकार विशुद्ध आचारवाली यशस्विनी सीता को मेरी अन्तर्रात्मा भी शुद्ध मानती है।
इन सब प्रसंगों को पढ़ने के बाद कौन मानेंगा किदेवता,ऋषि,गन्धर्वऔर स्वयं की
अन्तर्रात्मा द्वारा सीता को निष्पाप मानने वाले श्रीराम एक मिथ्यापवाद पर सीता का त्याग करेंगे?
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम प्रचारित लोकापवाद का कलंक लगानेवाले श्लोक विक्षेप नहीं तो और क्या हैं?
ग्रंथकार एक प्रसंग पर द्विअर्थी बात क्यों करेंगे और वोभी निष्पापिनी सीता के विषय में ?
अब समय आगयाहै,सदियों की दासता के दौरान,ग्रन्थों में डालेगए क्षेपकों को समझने का!वेद,स्मृतिऔरआचरण विरुद्धप्रसंगों में बहुत कुत्सित षड्यंत्र छिपेहैं जो जानबूझकर डाले गएहैं।युद्धकाण्ड मेंही राज्याभिषेक पश्चात श्रीराम द्वारा पुत्रों एवं बंधुओं केसाथ दसहजार वर्ष राज्यकरना बतायागयाहै
राघवश्चापि धर्मात्मा प्राप्य राज्यमनुत्तमम्!
ईजे बहुविधैर्यज्ञैःससुतभ्रातृबान्धवः
सीता परित्याग का कहींं उल्लेख नहीं! समापन तक!यदि ऐसा कुछ हुआ होता तो इतनी महत्वपूर्ण बात को पुत्रों सहित राज्य करना बताने से पूर्व अवश्य लिखा जाता। जय.श्रीराम!