सुरेश पंत sureshpant
सुरेश पंत sureshpant

@drsureshpant

9 Tweets 22 reads May 03, 2023
अनेक हिंदी प्रेमी अनुसारकों ने मुझे टैग करके अनुरोध किया है कि मैं इस ट्वीट पर अपनी प्रतिक्रिया दूँ। अच्छा लगा कि मीडिया, सोशल मीडिया से जुड़े कुछ लोग अनुनासिक और चंद्रबिंदु को भूले नहीं हैं।
जानता हूँ कि मेरी बात से सब सहमत नहीं होंगे, किंतु विचार तो कर ही सकते हैं। 1/n
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आज हँसना भी कठिन हो गया है। लोगों को हँसी नहीं, हंसी आती है। सर्वत्र हंसी ही हंसी है, हँसी कहीं नहीं। अब अगर हँसना हंसी ही है तो वह हंस भी तो ढूँढिए, जिसकी हंसी है। वरना हँसी लिखिए, हंसी नहीं। इन्हें हँसी नहीं आती क्या?
हिंदी में अब अनुस्वार का ही साम्राज्य दिखाई देता है।
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अनुस्वार और अनुनासिक मूलतः भिन्न हैं। अनुस्वार पाँच नासिक्य व्यंजनों को अन्य व्यंजनों से संयुक्त करने पर ङ्, ञ्, ण्, न्, म् के लिए यथास्थान अपनाया जाने वाला लिपि संकेत है। अनुनासिकता इससे भिन्न है और स्वरों की विशेषता है। ह्रस्व हो या दीर्घ, प्रत्येक स्वर अनुनासिक हो सकता है।
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अनुस्वार पाँच नासिक्य व्यंजनों को अन्य व्यंजनों से संयुक्त करने पर ङ्, ञ्, ण्, न्, म् के लिए अपनाया जाने वाला लिपि संकेत है। अनुनासिकता इससे भिन्न है और स्वरों की विशेषता है। ह्रस्व हो या दीर्घ, प्रत्येक स्वर अनुनासिक हो सकता है। जैसे -सँपेरा, साँप; उँगली, ऊँट; सिंचाई, ईँट..।
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अब क्योंकि अनुस्वार मूलतः व्यंजन है, इसलिए स्वर के साथ अनुस्वार (बिंदी) के स्थान पर अनुनासिक (चाँद बिंदी) का प्रयोग होना चाहिए जो अब धीरे-धीरे भुलाया जा रहा है। दुख होता है और यह कहने के लिए मुझे क्षमा करें कि अनेक लेखक, मीडिया कर्मी इसके बारे में नहीं जानते।
गतानुगतिको लोक:।
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सिंचाई, नींबू आदि में जो अनुस्वार-सा लगने वाला बिंदु (ं ) दिखाई देता है, वह वस्तुत: अनुनासिक (ँ) का संकेत है। लिपि में नियम यह है कि यदि किसी अक्षर में शिरोरेखा के ऊपर कोई मात्रा हो, तो चाँद बिंदी के लिए स्थान कम होता है, इसलिए बिंदी का प्रयोग किया जाए। किंतु यह
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यह 1960 से पहले की संस्तुति थी क्योंकि तब टाइपराइटर में शिरोरेखा पर स्वर की मात्रा के साथ इसे टाइप करना संभव नहीं था, किंतु अब नए सॉफ्टवेयरों में शिरोरेखा पर मात्रा के साथ चाँद बिंदी को सरलता से टाइप किया जा सकता है जो उच्चारण के अनुसार ठीक है और परंपरा से अपनाया जा रहा है।
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दुर्भाग्य से अनुनासिक दुर्लभ प्रजाति होता जा रहा है। मुद्रण माध्यम इसे झंझट मानते हैं। केवल प्रारंभिक पाठ्यपुस्तकों में बचा है। चन्द्रबिंदु न रहने से कठिनाई उच्चारण सीखने-सिखाने में होती है। हिंदी जिनकी मातृभाषा है वे चला लेते हैं, किंतु अहिंदी भाषियों के लिए यह बड़ी बाधा है।
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असुविधा एक कारण था। पिछली सदी तक तर्क था कि टाइप में झंझट है। अब नए सॉफ्टवेयरों में कोई झंझट नहीं रहा तो नया तर्क है कि कैसे भी लिखें, पढ़ा तो वही जाएगा! भाई,जब दो भाषिक विशेषताओं के लिए दो चिह्न परंपरा से हैं तो अकारण उन्हें छोड़कर भाषा और लिपि को उलझाने का कोई औचित्य?
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