पुराणों के अनुसार उनके सतित्व का प्रभाव इतना था कि यदि माता के आश्रम के ऊपर से कोई देवता भी जायें ,तो वह भी, सति अनुसुइया के सतित्व का प्रताप अनुभव करते थे । मान्यता के अनुसार एक बार नारद मुनि ने तीनो देवियो को माता के सतित्व की कथा सुनाई
जिसके पश्चात त्रिदेवियों के आग्रह पर त्रिदेव ॠषि मुनियों का वेश धारण कर सती अनुसुइया की सतित्व की परीक्षा हेतु स्वयं पृथ्वी लोक पर पधारे , आश्रम मे ॠषियो को देख माता ने उनका स्वागत सत्कार किया,
माता द्वारा भोजन करने को कहने पर ,त्रिदेव ने कहा,
'हे देवी!
हम आपका आतिथ्य अवश्य स्वीकार करेंगे परन्तु तभी, जब आप हमे निर्वस्त्र होकर भोजन परोसेंगी, मुनियो की यह बात सुन माता धर्म संकट मे पड़ गईं।
'हे देवी!
हम आपका आतिथ्य अवश्य स्वीकार करेंगे परन्तु तभी, जब आप हमे निर्वस्त्र होकर भोजन परोसेंगी, मुनियो की यह बात सुन माता धर्म संकट मे पड़ गईं।
जब लम्बे समय तक त्रिदेव अपने धाम नही लौटे तब तीनो देवियों ने माता अनुसुइया से क्षमा याचना करने तथा देवों को उनका रूप पुन: प्रदान करने के लिए कहने पर , माता ने कहा आप तीनो अपने अपने पतियों को उठा लिजिए।
हे प्रभु!
आप तीनो मेरी कोख से जन्म ले मुझे ऐसा वर दीजिये, अन्यथा कुछ नही । जिसके पश्चात कालांतर में दत्तात्रेय के रूप मे नारायण का, चंद्रमा के रूप मे ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप मे शिव का जन्म माता अनुसुइया के गर्भ से हुआ ,
आप तीनो मेरी कोख से जन्म ले मुझे ऐसा वर दीजिये, अन्यथा कुछ नही । जिसके पश्चात कालांतर में दत्तात्रेय के रूप मे नारायण का, चंद्रमा के रूप मे ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप मे शिव का जन्म माता अनुसुइया के गर्भ से हुआ ,
मन्वंतर से ब्रह्मा के अंश से चंद्र, विष्णु के अंश से दत्त तथा शिव के अंश से दुर्वासा का जन्म हुआ । कहते हैं जब श्रीराम वनवास के समय चित्रकूट आये थे तब माता अनुसुइया ने ही माता सीता को पत्नी धर्म का उपदेश तथा कभी ना मलिन होने वाला वस्त्र प्रदान किया था ।
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