नाग पंचमी का इतिहास
1. सर्प यज्ञ का समाप्ति दिन
सर्पयज्ञ करनेवाले जनमेजय राजा को आस्तिक नामक ऋषि ने प्रसन्न कर लिया था । जनमेजय ने जब उनसे वर मांगने के लिए कहा, तो उन्होंने सर्पयज्ञ रोकने का वर मांगा एवं जिस दिन जनमेजय ने सर्पयज्ञ रोका, उस दिन पंचमी थी
#नागपंचमी
#NagPanchami
1. सर्प यज्ञ का समाप्ति दिन
सर्पयज्ञ करनेवाले जनमेजय राजा को आस्तिक नामक ऋषि ने प्रसन्न कर लिया था । जनमेजय ने जब उनसे वर मांगने के लिए कहा, तो उन्होंने सर्पयज्ञ रोकने का वर मांगा एवं जिस दिन जनमेजय ने सर्पयज्ञ रोका, उस दिन पंचमी थी
#नागपंचमी
#NagPanchami
3. पांच युगों से पूर्व सत्येश्वरी नामक एक कनिष्ठ देवी थी । सत्येश्वर उसका भाई था । सत्येश्वर की मृत्यु नागपंचमी से एक दिन पूर्व हो गई थी । सत्येश्वरी को उसका भाई नाग के रूप में दिखाई दिया । तब उसने उस नागरूप को अपना भाई माना ।
उस समय नागदेवता ने वचन दिया कि, जो बहन मेरी पूजा भाई के रूप में करेगी, मैं उसकी रक्षा करूंगा । इसलिए प्रत्येक स्त्री उस दिन नाग की पूजा कर नागपंचमी मनाती है ।
इसलिए नागपंचमी के दिन नाग का पूजन करना अर्थात नौ नागों के संघ के प्रतीक की पूजा करना है ।
ऐसा आशिर्वाद नागाें को दिया । तब से नौ नाग मानव को पूजनीय हुए । नौ नाग नौ प्रकार के पवित्रक (चैतन्य तरंगें) ग्रहण करनेवाले घटक है ।
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