🔸छंद क्या और कितने प्रकार के होते है?🔸
🔸वेद में मुख्य छंद कौनसे है?
🔸मात्रिक छंद,
🔸रोला
🔸चौपाई
🔸सोरठा
🔸वर्णिक छंद
🔸वर्णवृत छंद
🔸मुक्त छंद में क्या अंतर है?
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🔸वेद में मुख्य छंद कौनसे है?
🔸मात्रिक छंद,
🔸रोला
🔸चौपाई
🔸सोरठा
🔸वर्णिक छंद
🔸वर्णवृत छंद
🔸मुक्त छंद में क्या अंतर है?
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साधना में छंद का महत्व;-
1-ऋषियों की कार्य पद्धति छन्द हैं ।इसे उनकी उपासना में प्रयुक्त होने वाले मंत्रों की उच्चारण विधि- स्वर संहिता कह सकते हैं ।छन्द को अनुभवी मार्ग दर्शक द्वारा किया गया इंगित कहा जा सकता है । साधना विधियों की एक ही प्रक्रिया का वर्णन अनेक प्रकार से हुआ है ।। उसमें से किस परिस्थिति में क्या उपयोग हो सकता है, इसकी बहुमुखी निर्धारण प्रज्ञा को 'छन्द' कह सकते हैं ।
2-सामवेद में मंत्र विद्या के महत्त्वपूर्ण आधार उच्चारण विधान- स्वर संकेतों का विस्तारपूर्वक विधान, निर्धारण मिलता है । प्रत्येक वेद मंत्र के साथ उदात्त- अनुदात्त के स्वर संकेत लिखे मिलते हैं ।। यह जप एवं पाठ प्रक्रिया का सामान्य विधान हुआ । वस्तुतः छन्द उस साधना प्रक्रिया को कहते हैं, जिसमें प्रगति के लिए समग्र विधि- विधानों का समावेश हो ।
3-साधना की विधियाँ वैदिकी भी हैं और तांत्रिकी भी। व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुरूप उनके क्रम- उपक्रम में अन्तर भी पड़ता है ।किस स्तर का व्यक्ति किस प्रयोजनों के लिए, किस स्थिति में क्या साधना करे, इसका एक स्वतंत्र शास्त्र है ।
4-वह छंद ही है जो कविताओं, दोहों, गीतों, मुक्तकों आदि में लय, प्रवाह, राग उत्पन्न करता है। लय न हो तो काव्य में सुंदरता का भान नहीं हो सकता। यही लय लाने के लिए कविता या गीत में वर्णों की संख्या और स्थान से सम्बंधित नियमों का निर्धारण किया जाता है, जो छंद के द्वारा होता है। छंद कोई नई नियमावली नहीं है। यह तो वेदों के समय भी प्रयुक्त होती थी, तभी
वेदों के सभी सूत्र भी छंदबद्ध हैं।
छंद के अवयव;-
सामान्यता एक छंद चार चरणों से बनता है। हर चरण में मात्राओं की संख्या निश्चित होती है। पहला और तीसरा चरण विषम व दूसरा और चौथा चरण सम होता है। छंद के मुख्य अंग या अवयव कुछ इस प्रकार हैं –
1-मात्रा;-
मात्रा, बोलने में लगने वाले समय के अनुसार लघु (ह्रस्व) या दीर्घ (गुरु) हो सकती है।
वर्ण छंदों में प्रयुक्त अक्षरों को कहते हैं।
2-यति;-
यति से छंद में विराम कहाँ लेना है, इसका पता चलता है। ‘,’ , ‘।’ , ‘॥’, ‘-‘ , ‘!’ , ‘?’ आदि कुछ यति चिन्ह हैं।
3-तुक;-
तुक चरणों के अंत में उपस्थित वर्णों में समानता होने के कारण उत्पन्न होने वाली लयबद्धता से बनता है।
4-गति;-
गति सही रहने से लय आती है, इसलिए छंद में इसका भी निर्धारण किया जाता है।
मंत्र विद्या में सर्वाधिक प्रयुक्त मुख्य छंद इस प्रकार है:-
1-गायत्री छंद
एक छंद है। इसमें कुल तीन पाद अथवा चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 8 वर्ण होते हैं। कुल मिलाकर 24 वर्ण होते हैं। उदाहरण - ऋग्वेद में मिलता है यथा गायत्री मंत्र ।
2-अनुष्टुप छंद
अनुष्टुप छन्द संस्कृत काव्य में सर्वाधिक प्रयुक्त छन्द है, इसका वेदों में भी प्रयोग हुआ है।। रामायण, महाभारत तथा गीता के अधिकांश श्लोक अनुष्टुप छन्द में ही हैं।इसमें कुल - 32 वर्ण होते हैं - आठ वर्णों के चार पाद। हिन्दी में जो लोकप्रियता और सरलता दोहा की है वही संस्कृत में अनुष्टुप की है। प्राचीन काल से ही सभी ने इसे बहुत आसानी के साथ प्रयोग किया है। गीता के श्लोक अनुष्टुप छन्द में हैं। आदि कवि वाल्मिकी द्वारा उच्चारित प्रथम श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठा) भी अनुष्टुप छन्द में है।
3-अष्टि छंद
वेदों में प्रयुक्त एक छंद है। इसमें कुल - ६४ वर्ण होते हैं। अक्षरों (मात्राओं) का विन्यास है।
आधुनिक समय में, छंद के चार प्रकार होते हैं; –
1-मात्रिक छंद
मात्रिक छंद में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है। इसके कुछ मुख्य प्रकार यहाँ वर्णित हैं –
दोहा – इसमें 2 सम चरण (11-11 मात्राएँ) और 2 विषम चरण (13-13 मात्राएँ ), कुल मिलाकर चार चरण होते हैं। उदाहरण –
श्रीगुरू चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
1-रोला – यह 24 मात्राओं वाला सम वर्णिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रोला रखकर छः चरण वाले कुण्डलिया का निर्माण होता है।
1-ऋषियों की कार्य पद्धति छन्द हैं ।इसे उनकी उपासना में प्रयुक्त होने वाले मंत्रों की उच्चारण विधि- स्वर संहिता कह सकते हैं ।छन्द को अनुभवी मार्ग दर्शक द्वारा किया गया इंगित कहा जा सकता है । साधना विधियों की एक ही प्रक्रिया का वर्णन अनेक प्रकार से हुआ है ।। उसमें से किस परिस्थिति में क्या उपयोग हो सकता है, इसकी बहुमुखी निर्धारण प्रज्ञा को 'छन्द' कह सकते हैं ।
2-सामवेद में मंत्र विद्या के महत्त्वपूर्ण आधार उच्चारण विधान- स्वर संकेतों का विस्तारपूर्वक विधान, निर्धारण मिलता है । प्रत्येक वेद मंत्र के साथ उदात्त- अनुदात्त के स्वर संकेत लिखे मिलते हैं ।। यह जप एवं पाठ प्रक्रिया का सामान्य विधान हुआ । वस्तुतः छन्द उस साधना प्रक्रिया को कहते हैं, जिसमें प्रगति के लिए समग्र विधि- विधानों का समावेश हो ।
3-साधना की विधियाँ वैदिकी भी हैं और तांत्रिकी भी। व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुरूप उनके क्रम- उपक्रम में अन्तर भी पड़ता है ।किस स्तर का व्यक्ति किस प्रयोजनों के लिए, किस स्थिति में क्या साधना करे, इसका एक स्वतंत्र शास्त्र है ।
4-वह छंद ही है जो कविताओं, दोहों, गीतों, मुक्तकों आदि में लय, प्रवाह, राग उत्पन्न करता है। लय न हो तो काव्य में सुंदरता का भान नहीं हो सकता। यही लय लाने के लिए कविता या गीत में वर्णों की संख्या और स्थान से सम्बंधित नियमों का निर्धारण किया जाता है, जो छंद के द्वारा होता है। छंद कोई नई नियमावली नहीं है। यह तो वेदों के समय भी प्रयुक्त होती थी, तभी
वेदों के सभी सूत्र भी छंदबद्ध हैं।
छंद के अवयव;-
सामान्यता एक छंद चार चरणों से बनता है। हर चरण में मात्राओं की संख्या निश्चित होती है। पहला और तीसरा चरण विषम व दूसरा और चौथा चरण सम होता है। छंद के मुख्य अंग या अवयव कुछ इस प्रकार हैं –
1-मात्रा;-
मात्रा, बोलने में लगने वाले समय के अनुसार लघु (ह्रस्व) या दीर्घ (गुरु) हो सकती है।
वर्ण छंदों में प्रयुक्त अक्षरों को कहते हैं।
2-यति;-
यति से छंद में विराम कहाँ लेना है, इसका पता चलता है। ‘,’ , ‘।’ , ‘॥’, ‘-‘ , ‘!’ , ‘?’ आदि कुछ यति चिन्ह हैं।
3-तुक;-
तुक चरणों के अंत में उपस्थित वर्णों में समानता होने के कारण उत्पन्न होने वाली लयबद्धता से बनता है।
4-गति;-
गति सही रहने से लय आती है, इसलिए छंद में इसका भी निर्धारण किया जाता है।
मंत्र विद्या में सर्वाधिक प्रयुक्त मुख्य छंद इस प्रकार है:-
1-गायत्री छंद
एक छंद है। इसमें कुल तीन पाद अथवा चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 8 वर्ण होते हैं। कुल मिलाकर 24 वर्ण होते हैं। उदाहरण - ऋग्वेद में मिलता है यथा गायत्री मंत्र ।
2-अनुष्टुप छंद
अनुष्टुप छन्द संस्कृत काव्य में सर्वाधिक प्रयुक्त छन्द है, इसका वेदों में भी प्रयोग हुआ है।। रामायण, महाभारत तथा गीता के अधिकांश श्लोक अनुष्टुप छन्द में ही हैं।इसमें कुल - 32 वर्ण होते हैं - आठ वर्णों के चार पाद। हिन्दी में जो लोकप्रियता और सरलता दोहा की है वही संस्कृत में अनुष्टुप की है। प्राचीन काल से ही सभी ने इसे बहुत आसानी के साथ प्रयोग किया है। गीता के श्लोक अनुष्टुप छन्द में हैं। आदि कवि वाल्मिकी द्वारा उच्चारित प्रथम श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठा) भी अनुष्टुप छन्द में है।
3-अष्टि छंद
वेदों में प्रयुक्त एक छंद है। इसमें कुल - ६४ वर्ण होते हैं। अक्षरों (मात्राओं) का विन्यास है।
आधुनिक समय में, छंद के चार प्रकार होते हैं; –
1-मात्रिक छंद
मात्रिक छंद में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है। इसके कुछ मुख्य प्रकार यहाँ वर्णित हैं –
दोहा – इसमें 2 सम चरण (11-11 मात्राएँ) और 2 विषम चरण (13-13 मात्राएँ ), कुल मिलाकर चार चरण होते हैं। उदाहरण –
श्रीगुरू चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
1-रोला – यह 24 मात्राओं वाला सम वर्णिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रोला रखकर छः चरण वाले कुण्डलिया का निर्माण होता है।
2. चौपाई :- यह 16 मात्राओं वाला सम वर्णिक छंद है। उदाहरण के लिए – तुलसीकृत राम चरित मानस में अधिकतर छंद चौपाइयों में लिखे गए हैं।
-3-सोरठा; – दोहे के उलट, सोरठे में 2 सम चरण (13-13 मात्राएँ) और 2 विषम चरण (11-11 मात्राएँ) होते हैं। इसमें विषम चरण का अंत दीर्घ और सम चरण का अंत हृस्व मात्रा से होना अनिवार्य है।
2--वर्णिक छंद
इस छंद में इस्तेमाल वर्णों की संख्या निश्चित होती है। उदाहरण के लिए, घनाक्षरी वर्णिक छंद के प्रत्येक चरण में 31 (8, 8, 8, 7) वर्ण और विरामों का प्रयोग होता है। दूसरी ओर, दण्डक वर्णिक छंद में 26 से अधिक वर्ण होते हैं।
3-वर्णवृत छंद
इसमें छंद के चारों चरण समान रहते हैं और हृस्व-दीर्घ मात्राओं का क्रम निश्चित रहता है।
4-मुक्त छंद
मुक्त छंदों में मात्राओं या वर्णों की संख्या अनिश्चित रहती है। इनमें सिर्फ यति और गति का ध्यान रखा जाता है, जिससे रचना लयपूर्ण रहे।मुक्त छंद आधुनिक कृति हैं और छंद
के नियमों से परे हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को इसका शुभारम्भकर्ता माना जाता है। भक्ति या वैदिक काल में ऐसे छंदों की रचना नहीं होती थी।
-3-सोरठा; – दोहे के उलट, सोरठे में 2 सम चरण (13-13 मात्राएँ) और 2 विषम चरण (11-11 मात्राएँ) होते हैं। इसमें विषम चरण का अंत दीर्घ और सम चरण का अंत हृस्व मात्रा से होना अनिवार्य है।
2--वर्णिक छंद
इस छंद में इस्तेमाल वर्णों की संख्या निश्चित होती है। उदाहरण के लिए, घनाक्षरी वर्णिक छंद के प्रत्येक चरण में 31 (8, 8, 8, 7) वर्ण और विरामों का प्रयोग होता है। दूसरी ओर, दण्डक वर्णिक छंद में 26 से अधिक वर्ण होते हैं।
3-वर्णवृत छंद
इसमें छंद के चारों चरण समान रहते हैं और हृस्व-दीर्घ मात्राओं का क्रम निश्चित रहता है।
4-मुक्त छंद
मुक्त छंदों में मात्राओं या वर्णों की संख्या अनिश्चित रहती है। इनमें सिर्फ यति और गति का ध्यान रखा जाता है, जिससे रचना लयपूर्ण रहे।मुक्त छंद आधुनिक कृति हैं और छंद
के नियमों से परे हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को इसका शुभारम्भकर्ता माना जाता है। भक्ति या वैदिक काल में ऐसे छंदों की रचना नहीं होती थी।
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