⚜️माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण, युधिष्ठिर और अन्य पांडवों ने महाभारत के युद्ध के बाद अपने सगे संबंधियों और जो युद्ध में मारे गए थे उनका श्राद्ध और पिंडदान पिहोवा (पृथुदक) तीर्थ में ही करवाया था।
क्योंकि यह देव भूमि युग युगांतरों से मृत आत्माओं की सदगति एवं शांति के लिए शास्त्रों व पुराणों में वर्णित रही है।
⚜️आज भी हजारों यात्री दूर-दूर से श्राद्ध पक्ष में अपने पितरों की तृप्ति के लिए इस तीर्थ पर श्राद्ध करने आते हैं।
⚜️आज भी हजारों यात्री दूर-दूर से श्राद्ध पक्ष में अपने पितरों की तृप्ति के लिए इस तीर्थ पर श्राद्ध करने आते हैं।
⚜️अपने पितरों के पिंडदान के लिए कई बड़ी हस्तियां पिहोवा तीर्थ पर पहुंच चुकी हैं। इनमें गुरुनानक देव जी के वंशज, गुरुगोबिंद सिंह जी के वंशज, गुरु अमरदास जी के वंशज, गुरु तेग बहादूर, गुरु हरगोबिंद, महाराजा रणजीत सिंह,
पटियाला के महाराजा के वंशज, हिमाचल से नूरपुर महाराजा के वंशज, स्वामी ज्ञानानंद की वंशावली सहित फिल्मी हस्तियां सुनील दत्त आदि शामिल हैं।
तीर्थ पुरोहित अनुसार श्राद्धों में पिहोवा तीर्थ पर (पृथुदक) पिंडदान करने का विशेष महत्व है।
तीर्थ पुरोहित अनुसार श्राद्धों में पिहोवा तीर्थ पर (पृथुदक) पिंडदान करने का विशेष महत्व है।
⚜️यदि कोई श्रद्धालु पिहोवा पिंडदान किए बिना गया जी चला जाता है तो उसे वहां भी पहले पृथुदक बेदी की पूजा करनी पड़ती है।
⚜️पंडितों के अनुसार श्राद्ध की महत्ता मत्स्य पुराण, यमस्मृति, भविष्य पुराण, ब्रह्म पुराण, आदित्य पुराण, कर्म पुराण, गरुड पुराण, स्कंद पुराण आदि में विस्तार से बताई गई है।
⚜️सदियों पहले ऋषि-मुनियों ने पृथुदक तीर्थ में तपस्या की थी। जिससे तीर्थ का महत्व काफी अधिक है। इसलिए यदि ऐसे तीर्थ पर श्राद्ध कर्म किया जाए तो उसका विशेष फल प्राप्त होता है।
जय सनातन 🙏🌺
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