तहक्षी™ Tehxi
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@yajnshri

3 Tweets 3 reads Feb 29, 2024
स्वर का नियम बनाये और चमत्कार देखे, बड़े से बड़े कार्य को सिद्ध करने ना रामबाण नियम एवं स्वर चिकित्सा
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स्वर-चिकित्सा
हमारी नाकमें श्वास लेनेके लिये दो छिद्र हैं एक दायीं तरफ तथा दूसरी बायीं तरफ। इन्हीं दो छिद्रोंद्वारा वायु शरीरमें प्रवेश करती है तथा बाहर निकलती है, इन्हें ही स्वर कहा जाता है।
स्वर तीन प्रकारके होते हैं-
(१) चन्द्रस्वर-इसमें बाँयीं नासिकाद्वारा वायु निकलती है।
(२) सूर्यस्वर-इसमें दाहिनी नासिकाद्वारा वायु निकलती है।
(३) सुषुम्णास्वर-इसमें दोनों नासिका छिद्रद्वारा वायु निकलती है।
हमारी नासिकासे कभी चन्द्रस्वर निकलता है,
कभी सूर्यस्वर निकलता है तथा बहुत कम समयके लिये सुषुम्णास्वर निकलता है। यदि हम इन्हें नियन्त्रण करना सीख लें तो अनेक रोगोंसे छुटकारा पा सकते हैं एवं स्वस्थ रह सकते हैं
(१) सुबह उठते ही देख लें कि कौन-सा स्वर चल रहा है तथा उसी तरफकी हथेलीका दर्शन करें एवं उसी तरफके गाल, आँख तथा मुँहका स्पर्श करें और उसी तरफका पाँव पहले जमीनपर रखकर आगे - बढ़ें तो दिन बहुत ही अच्छा गुजरता है।
(२) कभी भी किसी शुभ कार्यमें जायें तो जिस तरफका नाकमें स्वर चल रहा हो उस तरफका पाँव
पहले आगे बढ़ायें तो कार्य सिद्ध हो जाता है।
(३) भोजन करनेके बाद चित्त लेटकर श्वास लें, फिर दाहिने करवट लेटकर १६ श्वास लें तो भोजनक पाचन अच्छी प्रकार होता है।
(४) दर्द दूर करनेका उपाय- अचानक उठनेवाले दर्दको दूर करनेका सुगम उपाय यह है कि जो स्वर(श्वास) चल रहा है उसे बदल दें तत्काल राहत मिल जायगी।
स्वर चलानेका नियम-जिस तरफका स्वर चलाना हो, उसके उलटे करवट दो-चार मिनट लेटक सो जानेपर इच्छित स्वर चलना शुरू हो जाता है।
स्वर तालिका जानिए
सूर्यस्वर ( दाहिने नाकका)
(१) गरम स्वर होता है
(२) सर्दी, जुकाम, खाँसी, दमा, निमोनिया, अपच, गठिया, जोड़ोंके दर्द, निम्न रक्तचाप, पोलियो एवं पक्षाघातमें काम आता है।
(३) इसी स्वरको चलाकर भोजन करना चाहिये।
(४) दीर्घशंका (मल-विसर्जन) के वक्त इस स्वरको चलाकर जाना चाहिये।
(५) कठिन यात्रा, मेहनतके काम, व्यायाम, स्नान, शयनके वक्त इस स्वरको चला ले।
(६) ठंडे मौसम, बरसातमें इस स्वरको चला ले।
चन्द्रस्वर (बायें नाकका)
(१) ठंडा होता है
(२) गर्मी, पित्तजनित रोगोंमें, खुश्की, दिलकी धड़क या घबराहट, मूत्रमें जलन, उच्च रक्तचाप, थकाव अथवा शरीर गर्म होने, बुखार में काम आता है।
(३) जल या पेय पदार्थ इस स्वरको चलाकर पिये
(४) लघुशंका के वक्त इस स्वरक चलाना चाहिये।
(५) यात्रा, भजन, साधनके वक्त इस स्वरको चल ले।
(६) गर्मी की मौसम में इस स्वरको चला ले।
सुषुम्णा-स्वर
योग, भजन, ध्यान, जप, प्रार्थना इत्यादि सुषम्णा-स्वरके चलते समय करने चाहिये। यानी दोनों स्वर चलते हों तभी करनेसे सिद्ध होते हैं। अध्यात्म एवं योग क्रिया इस स्वर में करनी चाहिए

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