तहक्षी™ Tehxi
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@yajnshri

12 Tweets 6 reads Jul 09, 2024
दुर्गा सप्तशती के कुछ सिद्ध सम्पुट मन्त्र
दुर्गा सप्तशती का नित्य पाठ अथवा नवरात्र-पाठ बहुत आदर से किया जाता है । जब भी कोई संकट आता है अथवा किसी विशेष कार्य की सिद्धि अपेक्षित होती है, तो नवचण्डी, शतचण्डी और सहस्रचण्डी पाठ करवाये जाते है । इन पाठों में अधिक शक्ति लाने के लिए विभिन्न मन्त्रों, बीज मन्त्रों या श्लोक मन्त्रों के सम्पुट लगाकर पाठ करने-कराने का विधान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, अतः यहाँ कुछ मन्त्रों का संकेत दिया जाता है। इनका प्रयोग प्रति मन्त्र-पद्य के आदि-अन्त में पाठ करने से सम्पुट होता है। वैसे इनके आदि अन्त में ॐ ह्रीं अथवा केवल ह्रीं बीज जोड़कर जप भी किया जा सकता है ।
(१) सर्वविध मंगल-प्राप्ति के लिए -
सर्वमङ्गलमांगल्ये, शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
(२) शक्ति-प्राप्ति के लिए -
सृष्टिस्थिति विनाशानां शक्तिभूते सनातनि । गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोस्तु ते ।।
(३) विपत्ति नाश के लिए -
शरणागत-दीनार्त-परित्राणपरायणे ।
सर्वस्यातिहरे देवि, नारायणि नमोऽस्तु ते ।।
(४) बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए-
सर्वाबाधा-विनिर्मुक्तो, धनधान्यसमन्वितः ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन, भविष्यति न संशयः ॥
(५) भयनाश के लिए -
(क) सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति-समस्न्विते । भयेभ्यस्त्राहि नो देवि ! दुर्ग देवि नमोऽस्तु ते ॥
(ख) एवत्ते वदन सौम्यं लोचनायभूषितम् ।
पातु नः सर्व भूतेभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥
(६) रक्षा पाने के लिए -
शूलेन पाहि नो देवि ! पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि, चापज्यानिःस्वनेन च ॥
७) महामारी विनाश के लिए -
जयन्ती मंगला काली, भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥
(८) आरोग्य और सौभाग्य प्राप्ति के लिए -
देहि सौभाग्यमाराोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि, यशो देहि द्विषो जहि ।।
९. पाप नाश के लिए-
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।
सा घण्टा पातु नो देवि ! पापेभ्यो नः सुतानिव ।।
१०) मुक्ति-मुक्ति प्राप्ति के लिए -
विधेहि देवि कल्याणं, विधेहि परमां श्रियम् ।
रूपं देहि जयं देहि, यशो देहि द्विषो जहि ॥
११.अधिकारी आदि को अनुकूल बनाने के लिए -
ॐक्ली - ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ क्ली ॐ
(१२) स्वर्ग और मुक्ति प्राप्ति के लिए -
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते ।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

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