शिव पूजन के बारे में गूढ़ भावार्थ जानिए
#thread 🧵
🔺भस्म एवं रुद्राक्ष का भावार्थ क्या है ?
🔺 शृंगदर्शन कैसे करें ? (नंदी के सींगों के मध्य से शिवलिंग के दर्शन)
🔺 शिवजी को बिल्वपत्र क्यों एवं कैसे चढाएं ?
🔺 महाशिवरात्रि के दिन शिवजी का नामजप क्यों करें ?
🔺 शिवपूजा के कुछ विधिनिषेध?
🔺 पिंडी की अर्धपरिक्रमा क्यों करें ?
🔺 'नमः शिवाय' मंत्र का आध्यात्मिक अर्थ क्या है ?
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🔺भस्म एवं रुद्राक्ष का भावार्थ क्या है ?
🔺 शृंगदर्शन कैसे करें ? (नंदी के सींगों के मध्य से शिवलिंग के दर्शन)
🔺 शिवजी को बिल्वपत्र क्यों एवं कैसे चढाएं ?
🔺 महाशिवरात्रि के दिन शिवजी का नामजप क्यों करें ?
🔺 शिवपूजा के कुछ विधिनिषेध?
🔺 पिंडी की अर्धपरिक्रमा क्यों करें ?
🔺 'नमः शिवाय' मंत्र का आध्यात्मिक अर्थ क्या है ?
शृंगदर्शन कैसे करें ? (नंदी के सींगों के मध्य से शिवलिंग के दर्शन)
शृंगदर्शन के समय नंदी के दाईं ओर उसके पिछले पैरों के निकट बैठकर अथवा खडे रहकर बायां हाथ नंदी के वृषण पर (अंडकोश पर) रखें। दाएं हाथ की तर्जनी एवं अंगूठे को नंदी के दोनों सींगों पर रखें। दोनों सींगों तथा उनपर रखी दो उंगलियों के बीच की रिक्ति से शिवलिंग के दर्शन करें।
शृंगदर्शन के समय नंदी के दाईं ओर उसके पिछले पैरों के निकट बैठकर अथवा खडे रहकर बायां हाथ नंदी के वृषण पर (अंडकोश पर) रखें। दाएं हाथ की तर्जनी एवं अंगूठे को नंदी के दोनों सींगों पर रखें। दोनों सींगों तथा उनपर रखी दो उंगलियों के बीच की रिक्ति से शिवलिंग के दर्शन करें।
शिवजी को बिल्वपत्र क्यों एवं कैसे चढाएं ?
बिल्वपत्र में शिवतत्त्व अधिकाधिक आकर्षित करने की क्षमता होती है, इसलिए शिवजी को बिल्वपत्र चढाते हैं। पिंडी पर त्रिदलीय बिल्वपत्र औंधे रखकर उसका डंठल देवता की ओर तथा अग्रभाग अपनी ओर कर शिवजी को चढाएं । शिवपिंडी पर बिल्वपत्र औंधा चढाने से उससे निर्गुण स्तरके स्पंदन अधिक मात्रा में प्रक्षेपित होते हैं तथा श्रद्धालुओं को अधिक लाभ मिलता है।
बिल्वपत्र में शिवतत्त्व अधिकाधिक आकर्षित करने की क्षमता होती है, इसलिए शिवजी को बिल्वपत्र चढाते हैं। पिंडी पर त्रिदलीय बिल्वपत्र औंधे रखकर उसका डंठल देवता की ओर तथा अग्रभाग अपनी ओर कर शिवजी को चढाएं । शिवपिंडी पर बिल्वपत्र औंधा चढाने से उससे निर्गुण स्तरके स्पंदन अधिक मात्रा में प्रक्षेपित होते हैं तथा श्रद्धालुओं को अधिक लाभ मिलता है।
शिवपूजा के कुछ विधिनिषेध
श्वेत अक्षत (धुले हुए अखंड चावल) एवं पुष्प चढाएं! अक्षत की ओर निर्गुण ईश्वरीय तत्त्व से संबंधित उच्च देवताओं की तरंगें आकर्षित होती हैं इसलिए अधिकाधिक निर्गुण से संबंधित शिवजी को उनके श्वेत रंग से समानता दर्शानेवाले श्वेत रंग की अक्षत चढाएं। साथ ही, अरघे पर निशिगंध, जाही, जूही, मोगरा समान श्वेत पुष्प, जिसका डंठल पिंडी की ओर कर १० अथवा १० गुना संख्या में चढाएं। अगरबत्ती एवं इत्र का प्रयोग करें!
अगरबत्ती एवं इत्र से प्रक्षेपित गंधतरंगों की ओर देवताओं की तरंगें शीघ्र आकर्षित होती हैं; इसलिए शिवपूजा में विहित केवडा, चमेली अथवा मेंहदी की सुगंध की अगरबत्ती एवं केवडे के इत्र का प्रयोग करें।
हलदी एवं कुमकुम न चढाएं! हलदी एवं कुमकुम उत्पत्ति के प्रतीक हैं इसलिए लय के देवता शिवजी को हलदी एवं कुमकुम न चढाएं।
श्वेत अक्षत (धुले हुए अखंड चावल) एवं पुष्प चढाएं! अक्षत की ओर निर्गुण ईश्वरीय तत्त्व से संबंधित उच्च देवताओं की तरंगें आकर्षित होती हैं इसलिए अधिकाधिक निर्गुण से संबंधित शिवजी को उनके श्वेत रंग से समानता दर्शानेवाले श्वेत रंग की अक्षत चढाएं। साथ ही, अरघे पर निशिगंध, जाही, जूही, मोगरा समान श्वेत पुष्प, जिसका डंठल पिंडी की ओर कर १० अथवा १० गुना संख्या में चढाएं। अगरबत्ती एवं इत्र का प्रयोग करें!
अगरबत्ती एवं इत्र से प्रक्षेपित गंधतरंगों की ओर देवताओं की तरंगें शीघ्र आकर्षित होती हैं; इसलिए शिवपूजा में विहित केवडा, चमेली अथवा मेंहदी की सुगंध की अगरबत्ती एवं केवडे के इत्र का प्रयोग करें।
हलदी एवं कुमकुम न चढाएं! हलदी एवं कुमकुम उत्पत्ति के प्रतीक हैं इसलिए लय के देवता शिवजी को हलदी एवं कुमकुम न चढाएं।
पिंडी की अर्धपरिक्रमा क्यों करें ?
परिक्रमा का मार्ग १ से ७ शिवपिंडी की परिक्रमा करते समय अभिषेक की जलप्रणालिका (अरघा का आगे निकला भाग) तक जाएं तथा उसे लांघे बिना पीछे मुडें । तदुपरांत पुनः प्रणालिका तक विपरीत दिशा में परिक्रमा करें। अरघे के स्रोत से शक्ति प्रक्षेपित होती है। उसे बार-बार लांघने से सर्वसाधारण श्रद्धालु को कष्ट हो सकता है; इसलिए अन्य देवताओं के समान पूर्ण परिक्रमा न कर, शिवपिंडी की अर्धपरिक्रमा ही करनी चाहिए । स्वयंभू अथवा घर में स्थापित शिवलिंग के लिए यह नियम लागू नहीं होता।
परिक्रमा का मार्ग १ से ७ शिवपिंडी की परिक्रमा करते समय अभिषेक की जलप्रणालिका (अरघा का आगे निकला भाग) तक जाएं तथा उसे लांघे बिना पीछे मुडें । तदुपरांत पुनः प्रणालिका तक विपरीत दिशा में परिक्रमा करें। अरघे के स्रोत से शक्ति प्रक्षेपित होती है। उसे बार-बार लांघने से सर्वसाधारण श्रद्धालु को कष्ट हो सकता है; इसलिए अन्य देवताओं के समान पूर्ण परिक्रमा न कर, शिवपिंडी की अर्धपरिक्रमा ही करनी चाहिए । स्वयंभू अथवा घर में स्थापित शिवलिंग के लिए यह नियम लागू नहीं होता।
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