अचिन्त्य मिश्रा (यूरेशिया के राष्ट्रपति)
अचिन्त्य मिश्रा (यूरेशिया के राष्ट्रपति)

@The_Pinakee

14 tweets 19 reads Nov 13, 2021
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लेकिन इनकी वीरता आपके अन्दर वीर रस का ऐसा उबाल भर देगी कि आपका रोम रोम पुलकित हो जायेगा और सीना दस गुना हो जायेगा गर्व से।ऐसे भी महान वीर हुये हैं जिनके त्याग की गाथायें भारत भूमि के किसी कोने में सिमट कर रह गयीं ये सोंचकर आप स्वयं को धिक्कारेॆगे
ढाता मंदिर सिर दियो,आता दल अवरंग।
इन बाता सूजो अमर,रायसलोत रंग।।
बात थी 8 मार्च 1679 की वह महान शख्स जिसके साथ दूसरी पालकी में उसकी नई नई शादी हुयी थी और जिसने अपनी धर्मपत्नी का मुख तक न देखा था वो था एवम् कुल मिलाकर 70 सैनिक जो अपने घर की ओर जा रहे थे विवाह सम्पन्न होने के बाद।
बारात रात्रि विश्राम के लिये रूकी हुयी थी कि अचानक घुंघरूओं की आवाज ने सबका ध्यान भंग कर दिया उस वीर ने सैनिकों से पूछा कि क्या माजरा है,
सैनिकों ने जवाब दिया कि हो सकता है कि जानवर घूम रहे हों लेकिन अचानक ये आवाज तेज हो गयी।
@pallavict
@aquaphobicaries
@PumpkinPandey
पता चलता है कि ये औरंगजेब की सेना है जो कि खंडेला आक्रमण हेतु आयी है व खंडेला के राजा बहादुर सिंह को सजा देने के उद्देश्य से आयी है जिसने औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीतियों का विरोध किया व एक और उद्देश्य खंडेला के कृष्ण मन्दिर को तोड़ना है।
@Subodh39704802
@QueenAT18AT
औरंगजेब की सेना का कमान्डर दारब खान था जिसकी सेना में सैनिक कुल 10,000 थे,राजा बहादुर सिंह ने खंडेला को खाली कर दिया था न स्वयं को गोरिल्ला युद्ध के लिये तैयार कर लिया था।
झिरमीर झिरमीर मेवा बरसे , मोरा छतरी छाई ! कुल मे है तो जाण सुजान, फोज देवरे आई !!
जैसे ही उस वीर के कानोॆ में आवाज पहुंची कि ये म्लेच्छ मोहन देव मन्दिर विध्वंस करने आये हैं,
अचानक प्रतिक्रिया हुयी कि जब तक सुजान सिंह के देह में प्राण हैं ये अधर्मी उस मन्दिर की परछाई तक को छू न सकते और न ही इन तुर्कों की परछाई मन्दिर को।
सुजान सिंह ने अपनी विवाहिता की पालकी को एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचवा दिया और उसके हाथों को ही अन्तिम बार देख सका इच्छा थी कि चेहरा देख सके लेकिन माता का कर्तव्य याद आ गया कि सुजान यदि धर्म रक्षा हेतु देहत्याग भी करना पड़े तो सहर्ष खड़े हो जाना व उसमें ही तेरा धर्म है।
तुरन्त सुजान सिंह ने मन्दिर रक्षा हेतु 50 घुडसवारों की फौज लेकर मन्दिर की रक्षा हेतु मन्दिर के चारों ओर डेरा डाल दिया व बकरों की उस फौज का इन्तजार करने लगे जैसे शेर बकरे का शिकार करने के लिये इन्तजार करता है,
सुबह गांव वाले भी मिल गये और ये 50 की फौज अब 300 की फौज हो गयी।
अगले दिन दराब खान ने 14 वर्षीय सुजान सिंह को सचेत करते हुये कहा कि "सुनो जवान तुम अभी बहुत छोटे हो तुमको समझ नहीं है तुम सोंचते हो कि इन 300 सैनिकों की सहायता से तुम ये मन्दिर बचा लोगे ना तो मन्दिर बचेगा और ना ही तुम्हारी जान"।
सुजान सिंह का जवाब था " तलवार से बात करो ना कि जीभ से ये मन्दिर तो बचेगा लेकिन तुम नहीं हमारी तलवारें तय करेंगी कि 300 सैनिक कैसे हजारों का जवाप देगी तुम अपनी चिन्ता करो मेरी नहीं"
युद्ध प्रारम्भ हुआ और कुछ ही क्षण बाद सुजान सिंह की गर्दन ने मुगल कमांडर की गर्दन को उ ड़ा दिया युद्ध में सुजान सिंह इस कदर कहर बनकर टूटे थे कि मानो वे नहीं स्वयं यमराज मुगलों पर टूटे थे 300 सैनिकों की सेना ने 7500 मुगलों को गाजर मूली की तरह हरेत दिया।
कहा जाता है कि इस युद्ध में सुजान सिंह के धड़ पर सर नहीं था परन्तु उनके हाथों में फिर भी गति थी और वो गति तभी समाप्त हुयी जब पूरी मुगल सेना भाग नहीं गयी,
अन्त में वीर सुजान सिंह वीरगति को प्राप्त हुये उनकी धर्मपत्नी सती हो गयीं।
उसी जगह खण्डेला की सीमा पर दो देवलिया बनी जो आज भी इस त्याग और बलिदान की साक्षी है ! उसी रात गुर्जरो और अहीरों के दल ने मुग़ल सेना के उस भाग पर हमला कर दिया जहाँ गायो को हलाल करने के लिए बाँध रखा था,सभी 100 गायो को मुक्त करवा लिया गया ।
आज भी झुंझार जी महाराज ओर सती माता की पूजा वहां की जाती है ओर वहाँ पूजा करने से मनोकामनाये पूर्ण भी होती है ! आप भी कभी वहाँ जाये तो उन वीर देव पुरुष ओर सती माता का आशिर्वाद जरूर लें।
🙏🙏

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