क्यूँ करे नाम जप?
13 प्रकार के नाम जाप के बारे जानिए..
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जय द्वारा आयुवृद्धि के लाभों की वैज्ञानिक व्याख्या भी विद्वानों ने की है। 24 घंटे में प्रत्येक स्वस्थ्य व्यक्ति 21600 बार श्वास लेता है अर्थात् मिनट में 15(लगभग )( कम अधिक हो सकता) है बार श्वास लेना स्वाभाविक है। यदि किसी उपाय से उन श्वासों की संख्या कम हो जाए तो आयु वृद्धि सुनिश्चित है। प्राणायाम ऐसी है योग की सशक्त क्रिया है, जिससे श्वास प्रश्वास क्रिया का नियमन किया जाता है। जप से ऐसा भी होता है। जय के समय श्वासों की संख्या स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है। यह एक मिनट में 15 के स्थान पर 7-8 रह जाती है। यदि साधक एक घण्टा प्रतिदिन जप करता है, तो लगभग 500 श्वासों की आयुवृद्धि हो गई।
13 प्रकार के नाम जाप के बारे जानिए..
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जय द्वारा आयुवृद्धि के लाभों की वैज्ञानिक व्याख्या भी विद्वानों ने की है। 24 घंटे में प्रत्येक स्वस्थ्य व्यक्ति 21600 बार श्वास लेता है अर्थात् मिनट में 15(लगभग )( कम अधिक हो सकता) है बार श्वास लेना स्वाभाविक है। यदि किसी उपाय से उन श्वासों की संख्या कम हो जाए तो आयु वृद्धि सुनिश्चित है। प्राणायाम ऐसी है योग की सशक्त क्रिया है, जिससे श्वास प्रश्वास क्रिया का नियमन किया जाता है। जप से ऐसा भी होता है। जय के समय श्वासों की संख्या स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है। यह एक मिनट में 15 के स्थान पर 7-8 रह जाती है। यदि साधक एक घण्टा प्रतिदिन जप करता है, तो लगभग 500 श्वासों की आयुवृद्धि हो गई।
1.नित्य जप- जैसे स्थूल शरीर के लिए बाह्य पवित्रता, - स्नान, व्यायाम, भोजन और नियमित मल-विसर्जन आवश्यक क्रियाएं हैं, उसी तरह सूक्ष्म शरीर के लिए नियमित रूप से उसके अनुरूप पवित्रता के साधन, उसके पोषण और विकास के लिए आध्यात्मिक व्यायाम, जप और मन पर चढ़े मल विक्षेपों को दूर करने के लिए नित्य अभ्यास आवश्यक है ताकि पुराने संस्कारों का शमन होता रहे और नए आसुरी आक्रमणों के मुकाबले की तैयारी होती रहे। अपने इष्टदेव जो रुचिकर और गुरु प्रदत्त मंत्र हो, उसका जप नित्य करना चाहिए। यह नित्य जप कहलाता है। नियमित रूप से करने के कारण इससे शीघ्र ही सूक्ष्म शक्ति का विकास होता है।
2. नैमित्तिक जप पितृ ऋण से उऋण होने के लिए हम - पितृ-श्राद्ध आदि कर्म करते हैं, जिससे पितर जहां भी हों, उनके सूक्ष्म शरीर को बल मिलता है और प्रसन्नता हो जाती वे आशीर्वाद देते हैं। देव पितरों के सम्बन्ध में जो जप किया जाता है, उसे नैमित्तिक जप की संज्ञा दी जाती है। यह पितृपक्ष में तो किया ही जाता है। इस जप से पितरों की सदगति होती है
3. काम्य जप पशु भाव के साधक को ईश्वराधन की ओर आकर्षित करने के लिए पहले भौतिक सिद्धियों की उपलब्धि में सहयोग दिया जाता है, जिससे उसके विश्वास में दृढ़ता हो और आत्मकल्याण की साधना की अगली सीढ़ी पर चढ़ने के लिए तैयार हो। किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए जो सकाम साधना की जाती है, वह काम्य जप कहलाता है। इससे देव शक्तियों को आकर्षित किया जाता है, जो अभीष्ट सिद्धि में सहायक होती हैं।
4. निषिद्ध जप- पवित्रता, संयम, ब्रह्मचर्य, मिताहार, यम नियमों का पालन, मनोनिग्रह जप साधना में आवश्यक बताए गए हैं। यदि किसी भी साधना के नियमों का पालन पूर्ण रीति से नहीं किया जाता है, तो देव- -कृपा संदिग्ध रहती है। अनधिकारी गुरु से दीक्षा लेकर अशुद्ध उच्चारण के साथ अपवित्र अवस्था में और निकृष्ट स्थान पर यदि अविधिपूर्वक जप किया जाए, तो वह निषिद्ध जप कहलाता है, जिसमें देवता और मंत्र में भी अनुकूलता न हो और श्रद्धा विश्वास का अभाव हो, ऐसी साधना से कोई लाभ नहीं होता। केवल निराशा ही हाथ लगती है।
5. प्रायश्चित जप - मानव शरीर धारण करने से पूर्व हमें 84 लाख योनियों से होकर आना पड़ता है, जिसमें विभिन्न प्रकार की पशु योनियां होती हैं। उनके संस्कार हमारे मानस पटल पर अंकित रहते हैं। छोटा-सा उत्तेजक कारण मिल जाने पर हमसे बड़े-बड़े दोष, अपराध मनोभूमि में दृढ़ता आती है और किस अथवा पाप हो जाते हैं, जिनके लिए बाद में मन में पश्चाताप साधना के लिए साहस बटोर सकता है।
प्रायश्चित जप प्रारब्ध कर्मों के योग अथवा अन्य साधनाओं द्वारा कम किया जाए और आगे सावधानी बरती जाए, यही ऋषियों का आदेश है। आचार्यों ने संचित व नित्य दोषों के प्रभाव को दूर करने के लिए अनेकों प्रकार के उपायों का दिग्दर्शन किया है, उनमें से एक प्रायश्चित जप है। इसका स्पष्ट अर्थ है अपने दोष और अपराध को स्वीकार करना । पाप की गांठ उसके स्वीकार करने से ही खुलती है। इसे स्वीकार न करने से वह और दृढ़ होती है। अतः जाने अनजाने पापों के परिमार्जन के लिए जो जप किया जाता है उसे प्रायश्चित जप कहा जाता है।
प्रायश्चित जप प्रारब्ध कर्मों के योग अथवा अन्य साधनाओं द्वारा कम किया जाए और आगे सावधानी बरती जाए, यही ऋषियों का आदेश है। आचार्यों ने संचित व नित्य दोषों के प्रभाव को दूर करने के लिए अनेकों प्रकार के उपायों का दिग्दर्शन किया है, उनमें से एक प्रायश्चित जप है। इसका स्पष्ट अर्थ है अपने दोष और अपराध को स्वीकार करना । पाप की गांठ उसके स्वीकार करने से ही खुलती है। इसे स्वीकार न करने से वह और दृढ़ होती है। अतः जाने अनजाने पापों के परिमार्जन के लिए जो जप किया जाता है उसे प्रायश्चित जप कहा जाता है।
7. चल जप -अन्य जप तो विधिपूर्वक आसन पर बैठकर - किए जाते हैं, परन्तु चल जप किसी भी परिस्थिति में किया जा सकता है। इसके लिए किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है। खाली मन को शैतान का घर कहा गया है। उसमें विभिन्न प्रकार के अनावश्यक विचार चक्कर लगाते रहते हैं। इससे बचने के लिए आवश्यक है कि मन में बुरे विचारों का आगमन न हो। यह तभी हो सकता है, जब मन खाली न हो और सदैव उसे व्यस्त रखा जाए। अपने इष्ट देवता के स्मरण के अतिरिक्त और कौन-सा श्रेष्ठ साधन हो सकता है? मंत्र जप की साधना हर समय चलती रहे, तो आसुरी वृत्तियों के पोषण, विकास का प्रश्न ही नहीं उठता, इस साधना में प्रदर्शन घातक सिद्ध होता है। प्रदर्शन के बिना यह साधना चलती रहे, तो इसमें अपूर्व सफलता मिलती है ।
8. वाचिक जप- जिस मंत्र उच्चारण को अन्य व्यक्ति भी - सुन सकें, उसे वाचिक जप कहते हैं। आरंभ में साधक के लिए यही ठीक रहता है क्योंकि अन्य जप अभ्यास साध्य हैं। यह जप निम्न कोटि का जाना जाता है। फिर भी शब्द विज्ञान की महत्ता स्वीकार करते हुए इसकी उपयोगिता को स्वीकार करना ही होगा । योगियों का कहना है कि इसके वाक्-सिद्धि होती है और षट्चक्रों में विद्यमान वर्ण बीज शक्तियां जाग्रत होती हैं।
9. उपांशु जप - मनुस्मृति के अनुसार उपांशु जप उसे कहते हैं कि मंत्र का उच्चारण होता रहे, होंठ हिलते रहें परंतु पास बैठा व्यक्ति भी उसे सुन न सके, जापक स्वयं हो उसे सुने। इस जप के प्रभाव से स्थूल से सूक्ष्म शरीर में प्रवेश होता है और बाह्य वृत्तियां अन्तर्मुख होने लगती हैं, एकाग्रता बढ़ने लगती हैं, एक अद्भुत मस्ती प्रतीत होती है, जो अनुभव की ही वस्तु है।
10.भ्रमर जप- भ्रमर के गुंजन की भांति गुनगुनाना इस जप की विशेषता है। इसमें होंठ और जिह्वा नहीं हिलानी पड़ती । जिस तरह वंशी बजाई जाती है उसी तरह प्राणवायु के सहयोग से मंत्रावृत्ति की जाती है। इस जप से यौगिक तन्द्रा की वृद्धि होती है और षटचक्रों का धीरे-धीरे जागरण होने लगता है, प्रकाश की अनुभूति होती है और आन्तरिक तेज र की वृद्धि होती है।
11. मानसिक जप मानसिक जप में होंठ और जिह्वा कुछ 1 भी नहीं हिलते। मंत्र के पद और अक्षरों के अर्थ पर मन में विचार किया जाता है ।
स्पष्ट बोलने से वाणी स्थूलता में रहती है और उसका प्रभाव भी सीमित स्थल में रहता है । पर मन के द्वारा मंत्र के उच्चारण से वह वाक् सूक्ष्म हो जाती पश्यन्ती, परा, मध्यमा यह तीन वाक् भी सूक्ष्म होती हैं। उनसे नाभि प्रदेश आदि में प्रयत्न होता है, उससे विद्युत प्रकट होती है, उसका प्रभाव अपेक्षित स्थूल पर स्थित वाक् की अपेक्षा अधिक अपेक्षा होती है इसका बहुत प्रभाव है
स्पष्ट बोलने से वाणी स्थूलता में रहती है और उसका प्रभाव भी सीमित स्थल में रहता है । पर मन के द्वारा मंत्र के उच्चारण से वह वाक् सूक्ष्म हो जाती पश्यन्ती, परा, मध्यमा यह तीन वाक् भी सूक्ष्म होती हैं। उनसे नाभि प्रदेश आदि में प्रयत्न होता है, उससे विद्युत प्रकट होती है, उसका प्रभाव अपेक्षित स्थूल पर स्थित वाक् की अपेक्षा अधिक अपेक्षा होती है इसका बहुत प्रभाव है
12. अखण्ड जप हर समय जप करना सम्भव नहीं है । थकावट भी होती है और मन भी उचटता है। परिवर्तन से मन लगता है, इसलिए गुरुजनों ने यह आदेश दिया है कि जब जप से मन उचट जाए, तो ध्यान करना चाहिए। ध्यान की भी एक सीमा होती है। जब ध्यान से मन उचटने लगे, तो आत्मचिंतन करना चाहिए, आर्य ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। इस तरह से मन को हर समय लगाए ही रहना चाहिए, उसे एक क्षण के लिए भी स्वतंत्र न छोड़ना अखण्डता की परिभाषा में आता है। शास्त्र का भी यही आदेश है
जापाच्छान्तः पुनर्ध्यायेद् ध्यानाच्छान्तः पुनर्जपेत् जपध्यानपरिश्रान्त आत्मांन च विचारयेत्
जप करते-करते जब थकें तो ध्यान करना चाहिए, ध्यान से थकें, तो पुनः जप करें। इन दोनों से जब थकें तो आत्म- तत्व का चिंतन करें
12 वर्ष की अखण्ड साधना को तप की संज्ञा दी गई है। के इससे महासिद्धि की उपलब्धि होती है।
जापाच्छान्तः पुनर्ध्यायेद् ध्यानाच्छान्तः पुनर्जपेत् जपध्यानपरिश्रान्त आत्मांन च विचारयेत्
जप करते-करते जब थकें तो ध्यान करना चाहिए, ध्यान से थकें, तो पुनः जप करें। इन दोनों से जब थकें तो आत्म- तत्व का चिंतन करें
12 वर्ष की अखण्ड साधना को तप की संज्ञा दी गई है। के इससे महासिद्धि की उपलब्धि होती है।
13.अजपा जप यह जप माला के बिना ही होता है। श्वासोच्छवास की क्रिया हमारे शरीर में बराबर स्वाभाविक रूप से होती रहती है, जो एक अहोरात्र में 21600 की संख्या में होती है। जो श्वास बाहर निकलता है, उसकी ध्वनि 'हम्' की तरह होती है और जो अंदर आता है उसकी ध्वनि 'सः' की तरह होती है। (सोऽहं ) इस तरह से 'हंस' मंत्र जप हमारे शरीर में अपने आप होता रहता है। इसे अजपा गायत्री भी कहते हैं । श्वासोच्छवास के साथ मंत्रावृत्ति अजपा जप कहलाती है । इस जप की यही विशेषता है कि यह अपने आप होता रहता है, इसके लिए कुछ करना नहीं पड़ता । केवल दृष्टा रूप में इसकी स्वाभाविक क्रिया को देखता होता है ।
हंसोपनिषद् में हंस मंत्र की स्वाभाविक क्रिया का वर्णन करते हुए कहा है
सर्वेषु देवेषु व्याप्त वर्तते यथा ह्यग्निः काष्ठेषु तिलेषु तैलमिव । दिवित्वा नमृत्युमेति ।।
'समस्त देहों में यह जीवन हंस-हंस जपता हुआ व्याप् रहता है उसी प्रकार, जैसे काठ में अग्नि रहती है और तिलों में तेल रहता है। इसे जान लेने वाला मृत्यु का उल्लंघन कर जाता है ।
हंसोपनिषद् में हंस मंत्र की स्वाभाविक क्रिया का वर्णन करते हुए कहा है
सर्वेषु देवेषु व्याप्त वर्तते यथा ह्यग्निः काष्ठेषु तिलेषु तैलमिव । दिवित्वा नमृत्युमेति ।।
'समस्त देहों में यह जीवन हंस-हंस जपता हुआ व्याप् रहता है उसी प्रकार, जैसे काठ में अग्नि रहती है और तिलों में तेल रहता है। इसे जान लेने वाला मृत्यु का उल्लंघन कर जाता है ।
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